Monday, February 21, 2011

गीत गाता हूँ मैं, गुनगुनाता हूँ मैं....एक दर्द में डूबी शाम, किशोर दा की आवाज़ और पियानो का साथ



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 597/2010/297

'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' शृंखला की सातवीं कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के महफ़िल की शमा जलाने को। कल की कड़ी में हमने दुनिया भर से पाँच बेहद नामचीन पियानिस्ट्स का ज़िक्र किया था और आप से यह वादा भी किया था कि आगे किसी अंक में और पाँच नामों को शामिल करेंगे। हम अपने वादे पे ज़रूर कायम हैं, लेकिन वह अंक आज का अंक नहीं है। आज के अंक में तो हम एक फ़िल्मी पियानिस्ट की बात करेंगे जिन्होंने संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के लिए बेशुमार गीतों में पियानो बजाया है। हम जिस पियानिस्ट की बात कर रहे हैं, उनका नाम है रॊबर्ट कोर्रिया (Robert Correa)| दोस्तों, जैसे ही मुझे अपने किसी मित्र से यह पता चला कि रॊबर्ट कोर्रिया एस.जे. के लिए बजाते थे, तो मैं इस म्युज़िशियन के बारे में जानकारी इकट्ठा करने की कोशिश में जुट गया। और इसी खोजबीन के दौरान मुझे रॊबर्ट कोरीया के बेटे युजीन कोर्रिया के बारे में पता चला किसी ब्लॊग में लिखे उनकी टिप्पणी के ज़रिए। दरअसल उस ब्लॊग में शंकर जयकिशन पर एक लेख पोस्ट हुआ था, और उसकी टिप्पणी में युजीन कोरीया ने यह लिखा - "Thank you for your wonderful appreciation of the music directors Shankar-Jaikishan. I would like to mention that my father, Mr. Robert Correa use to play the piano for the music directors. Thanks. Eugene Correa/Canada." आगे फिर किसी के पूछने पर उन्होंने बताया कि मेरे स्वर्गीय पिता ने शंकर-जयकिशन की सभी फ़िल्मों में पियानो बजाया, बस उनकी पहली फ़िल्म 'बरसात' को छोड़ कर। वह इसलिए कि वो उस वक़्त बम्बई में नहीं थे। उस ज़माने में वो कलकत्ते में रहा करते थे और वहाँ के प्रसिद्ध होटल 'दि ग्रेट ईस्टर्ण होटल' में पियानिस्ट थे। एक और उल्लेखनीय बात यह कि राज कपूर की फ़िल्म 'संगम' के थीम म्युज़िक में जो एक नहीं बल्कि दो दो पियानो की आवाज़ें सुनाई देती हैं, उनमें एक तो रॊबर्ट कोर्रिया ने ही बजाया था, दूसरा पता है किन्होंने बजाया था? खुद शंकर साहब ने। ओ. पी. नय्यर साहब की धुन पर "आपके हसीं रुख़ पे आज नया नूर है" गीत में भी जो असाधारण पियानो बजा है, उसे भी रॊबर्ट कोर्रिया ने ही बजाया था। दोस्तों, आज जब एस.जे. की जोड़ी की बात चल ही पड़ी है, तो क्यों ना उन्हीं का एक गीत हो जाये!

जहाँ तक पियानो आधारित फ़िल्मी गीतों की बात है, हमने इस शृंखला में अब तक ३० और ४० के दशकों से एक एक गीत तथा ५० व ६० के दशकों से दो दो गीत सुन चुके हैं। आज हम क़दम रखते हैं ७० के दशक में। इस दशक का बस एक ही गीत हम सुनेंगे और इस दशक के पियानो गीतों का प्रतिनिधित्व करने के लिए जिस गीत को चुना है, वह है किशोर कुमार का गाया १९७१ की फ़िल्म 'लाल पत्थर' का सदाबहार गीत "गीत गाता हूँ मैं, गुनगुनाता हूँ मैं, मैंने हँसने का वादा किया था कभी, इसलिए अब सदा मुस्कुरता हूँ मैं"। गीत के बोलों से ही पता चलता है कि किस तरह का विरोधाभास छुपा हुआ है गाने में। भले ही शब्द आशावादी प्रतीत हो रहे हैं, लेकिन मूड, सिचुएशन और कम्पोज़िशन से साफ़ ज़ाहिर है कि एक टूटे हुए दिल की पुकार है यह गीत, जिसे किशोर दा ने क्या ख़ूब अंजाम दिया है। फ़िल्म में यह गीत विनोद मेहरा पर फ़िल्माया गया है और कैमरे के रेंज में राज कुमार, राखी और हेमा मालिनी को भी देखा जा सकता है। 'लाल पत्थर' का एक गीत "रे मन सुर में गा" हमने आशा भोसले के युगल गीतों से सजी लघु शृंखला 'दस गायक और एक आपकी आशा' में सुनवाया था। आज के प्रस्तुत गीत को लिखा है देव कोहली साहब ने और यह उनका लिखा हुआ पहला फ़िल्मी गीत है। देव साहब ने विविध भारती के किसी इंटरव्यु में इसके बारे में कहा था - "ज़िंदगी है तो घटनाएँ भी यकीनन होंगी। मेरे जीवन की भी कुछ मुक्तलिफ़ घटनाएँ हैं, क़िस्से हैं। एक अहम क़िस्सा सुनाता हूँ। जब मैं नया नया गीतकार बनने यहाँ पर आया था, तो एक बार शंकर-जयकिशन, जो उस समय बहुत ही कामयाब और महान संगीतकारों में से थे, उन्होंने मुझे बुलाया और एक फ़िल्म के लिए सिचुएशन बता दी, और कहा कि आपको इस पर एक गीत लिखना है। मैंने युंही गीत लिख दिया, वह गीत इतना हिट हुआ कि मैंने सोचा भी न था। मैंने यह महसूस किया कि इतनी दाद का मैं हक़दार नहीं हूँ। इस गीत ने मेरे अंदर एक कैफ़ीयत पैदा की, ऐसी कौन सी शक्ति थी जिसने मुझसे यह गीत लिखवाया? वो अल्फ़ाज़ कहाँ से आये? फिर मुझे ऐसा लगा कि यह हो जाता है। उसके बाद से मैं आध्यात्मिक्ता की तरफ़ झुका और आध्यात्म की किताबें पढ़ने लगा। यह मेरा पहला गीत था फ़िल्म 'लाल पत्थर' का, गीत गाता हूँ मैं गुनगुनाता हूँ मैं।" तो लीजिए देव कोहली साहब का लिखा पहला गाना सुनते हैं किशोर दा की पुर-असर आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि पियानो के एक स्टैण्डर्ड की-बोर्ड में कुल ८८ कीज़ होते हैं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अंजाना जी लंबी छलांग लगा कर आगे निकल आये हैं...वाह क्या मुकाबला है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

फेसबुक-श्रोता यहाँ टिप्पणी करें
अन्य पाठक नीचे के लिंक से टिप्पणी करें-

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

3 श्रोताओं का कहना है :

अमित तिवारी का कहना है कि -

निर्देशक-भप्पी सोनी

Anjaana का कहना है कि -

Director: Bhappi Sonie

हिन्दुस्तानी का कहना है कि -

गीतकार-मजरूह सुल्तानपुरी

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

संग्रहालय

25 नई सुरांगिनियाँ

ओल्ड इज़ गोल्ड शृंखला

महफ़िल-ए-ग़ज़लः नई शृंखला की शुरूआत

भेंट-मुलाक़ात-Interviews

संडे स्पेशल

ताजा कहानी-पॉडकास्ट

ताज़ा पॉडकास्ट कवि सम्मेलन