Monday, February 7, 2011

हम इश्क़ के मारों को दो दिल जो दिए होते....एक और खूबसूरत ख्याल सुर्रैय्या की खनकती आवाज़ में



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 587/2010/287

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनों हम आप तक पहुँचा रहे हैं फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध सिंगिंग् स्टार सुरैया पर केन्द्रित लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा'। दोस्तों, हमने इस शृंखला में आपको बताया था कि सुरैया ने फ़िल्मों में बाल कलाकार के रूप में क़दम रख था। बतौर बालकलाकार उनकी पहली फ़िल्म थी 'उसने क्या सोचा', जो बनी थी १९३७ में। जब वो १२ साल की थीं, उन्होंने फ़िल्म 'ताज महल' में अभिनय किया था जिसका श्रेय उनके मामाजी को जाता है। आइए आज इसी वाक्या के बारे में जान लेते हैं सुरैया के जुबाँ से जो उन्होंने शमिम अब्बास के उसी इंटरव्यु में कहा था। "इसमें भी एक इत्तफ़ाक़ है, मेरा कोई इरादा नहीं था फ़िल्म जॊयन करने का। लेकिन मेरे एक अंकल हैं जो फ़िल्मों में काम किया करते थे, 'ऐज़ ए विलन'। He was a very popular actor of his time। तो मैं स्कूल में पढ़ा करती थी, उस वक़्त छुट्टियाँ थी, वकेशन था, तो मैं उनके साथ शूटिंग् देखने चली गई। तो मोहन स्टुडियो में उनकी शूटिंग् थी। वहाँ एक डिरेक्टर थे नानुभाई वकील। तो वो उस वक़्त एक ऐतिहासिक फ़िल्म बना रहे थे जिसका नाम था 'ताज महल'। उन्हें एक छोटी बच्ची की ज़रूरत थी जो मुमताज़ महल के बचपन का रोल कर सके। तो उन्होंने मुझे देखा तो अंकल से मेरे बारे में पूछने लगे। मेरी आँखें क्योंकि मुग़लीयात जैसे हैं, उनको पसंद आईं, वो कहने लगे कि छोटा रोल है, कुछ ही दिनों की बात है, कर लो। मैं तो नर्वस हो गई। हालाँकि मुझे फ़िल्में देखने का बड़ा शौक था, बचपन से ही हर एक फ़िल्म देखा करती थी, लेकिन जब मुझसे यह पूछा गया कि तुम काम करो, तो मैं नर्वस हो गई। फिर एक टेम्प्टेशन भी हुआ, छुट्टियाँ भी है स्कूल में, तो कर लिया जाए, it will be fun। तो मैंने फ़िल्म की, सब ने फ़िल्म देखी, प्रकाश पिक्चर्स के विजय भट्ट और शंकर भट्ट ने भी फ़िल्म देखी, पूछा कि कौन है यह लड़की, ज़बान बहुत अच्छी है इसकी, उनको भी चाइल्ड रोल के लिए एक बच्ची की ज़रूरत थी, इस तरह से सिलसिला शुरु हो गया।"

सुरैया की जिस फ़िल्म का गीत आज हम आपको सुनवाने के लिए लाये हैं, वह है 'बिल्वामंगल' का। १९५४ की यह फ़िल्म थी जिसमें सुरैया के नायक बने थे सी. एच. आत्मा। डी. एन. मधोक के गीत और बुलो. सी. रानी का संगीत था। इस फ़िल्म में सुरैया के दो गीत बहुत मशहूर हुए थे, जिनमें एक था "परवानों से प्रीत दीख ली शमा से सीखा जल जाना, फिर दुनिया को याद रहेगा तेरा मेरा अफ़साना", और दूसरा गाना था "हम इश्क़ के मारों को दो दिल जो दिए होते, हमने ना कभी उनके अहसान लिए होते", और यही गीत आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की शान है। क्या ग़ज़ब का मुखड़ा है साहब कि सुन कर दिल कह उठता है 'वाह!' इस ग़ज़ल के दो और शेर ये रहे...

"एक दिल जो कभी रोता दूजे से बहल जाते,
आहें ना भरी होती, शिकवे ना किए होते।"

"आते कि ना आते परवाह किसे होती,
उल्फ़त में किसी की ना मर मर के जिए जाते।"

फ़िल्म 'बिल्वामंगल' के साथ सुरैया की एक ख़ास याद जुड़ी हुई है, आइए उसी के बारे में जान लेते हैं 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम के माध्यम से। "सन् १९५२ के फ़िल्म फ़ेस्टिवल में हॊलीवूड के डिरेक्टर फ़्रैंक काप्रा आये थे। बातचीत के दौरान मैंने उनसे कहा ग्रेगरी पेक की फ़िल्में मुझे बहुत पसंद है और आप उनसे यह ज़रूर कह दीजिएगा। और फिर जब मिस्टर काप्रा ने मेरा फ़ोटो और पता ले जाकर ग्रेगरी पेक को दिया तो उन्होंने मुझे एक ख़त लिखा कि अगर मौका हुआ हिंदुस्तान आकर आपसे ज़रूर मुलाक़ात करूँगा। मैं तो यह समझी थी कि वो क्या आयेंगे और क्या मुलाक़ात करेंगे! फिर दो साल बाद एक दिन मैं फ़िल्म 'बिल्वामंगल' की शूटिंग् से थकी-हारी घर आई और सो गई। रात के करीब १२ बजे मम्मी मुझे जगाने लगी कि 'उठो उठो, देखो बाहर कौन आया है, ग्रेगरी पेक तुमसे मिलने आये हैं'। पहले मैं ख़्वाब समझी, मगर जब नींद टूटी तो यह हक़ीक़त थी। ख़ैर दूसरे दिन जब यह बात अख़बारों में छपी तो मैं 'बिल्वामंगल' का ही गीत पिक्चराइज़ कर रही थी।" तो लीजिए दोस्तों, सुनिए सुरैया की आवाज़ में 'बिल्वामंगल' की एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल को।



क्या आप जानते हैं...
कि सुरैया ने अपने छोटे से फ़िल्मी सफ़र में क़रीब ७१ फ़िल्मों में काम किया, और इस दौरान उस दौड़ के लगभग सभी जानेमाने संगीतकारों के लिए गानें गाये और अलग अलग मूड्स के गीत गाकर अपने फ़न के जोहर दिखाये।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद मशहूर गीत.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
ये मुकाबला तो लगता है आखिरी सिरे तक जाएगा....अमित जी और अंजना जी जबरदस्त मुकाबला कर रहे हैं....विजय जी और अवध जी आपने भी सही पहचाना

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, February 6, 2011

मनमोर हुआ मतवाला किसने जादू डाला....सुर्रैया के लिए प्रेम वो जादू था जो मन से कभी नहीं उतरा



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 586/2010/286

मस्कार! रविवार की शाम और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर एक नई सप्ताह का आग़ाज़। दोस्तों नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है इस महफ़िल में। इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल रोशन है उस गायिका-अभिनेत्री के गाये हुए गीतों से जिन्हें हम जानते हैं सुरैया के नाम से। इस शृंखला के पहले हिस्से में पाँच गानें ४० के दशक के सुनने के बाद, आइए आज क़दम रखते हैं ५० के दशक में। सुरैया की ज़िंदगी का एक अध्याय रहे हैं अभिनेता देव आनंद। सुरैया और देव साहब का प्रेम-संबंध इण्डस्ट्री में चर्चा का विषय बन गया था। सुरैया पर केन्द्रित कोई भी चर्चा देव साहब के ज़िक्र के बिना समाप्त नहीं हो सकती। क्या हुआ था कि वे दोनों मिल ना सके, एक दूजे का हमसफ़र बन ना सके। आइए आज देव साहब की किताब 'रोमांसिंग् विद् लाइफ़' से कुछ अंश यहाँ पेश करें। देव साहब कहते हैं, "मैं सातवें आसमान पर उड़ रहा था क्योंकि हम दोनों अब एन्गेज हो चुके थे। मैं उसे पाना चाहता था, ज़्यादा, और भी ज़्यादा, लेकिन फिर मुझे उसकी तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं आई। हमारी फ़िल्मों की शूटिंग् भी ख़त्म हो गई, और अब तो एक दूसरे से मिलने का कोई बहाना ही नहीं बचा था। दिन सप्ताह में बदल गये, लेकिन उसकी कोई ख़बर मुझ तक नहीं पहुँची। न कोई चिट्ठी, न कोई फ़ोन, न तार। मैंने दिवेचा से सम्पर्क किया और उसने वादा किया कि उसका हालचाल लेकर मुझे बताएगा। लेकिन इस बार तो उसे भी उसके (सुरैया के) घर घुसने की इजाज़त नहीं मिली। सुरैया की दादी ने उसके मुंह पर ही दरवाज़ा बंद कर दिया यह कहते हुए कि इन दिनों हम अपने करीबी दोस्तों का भी स्वागत नहीं कर रहे जिसके पीछे कुछ ऐसे कारण हैं जिसे हम बताना नहीं चाहते। फिर भी दिवेचा ने यह पता लगा ही लिया कि सुरैया के घर में बहुत अशांति का माहौल बना हुआ है- उसके और मेरे रिश्ते को लेकर। कोई इस रिश्ते को स्वीकार नहीं रहा सिवाय उसकी माँ के। सुरैया की माँ को बाकी घरवालों ने यह कहकर डराया कि अगर वो इस रिश्ते का समर्थन करेगी तो या तो उसे ही घर से निकल जाना पड़ेगा या फिर उसकी दादी आत्महत्या कर लेंगी। इस तरह से सुरैया पर दबाव बढ़ता गया और उसके लिए आँसू बहाने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था। और सुरैया ने एक दिन निर्णय ले लिया कि वो मुझे अपने दिमाग से निकाल देगी। एक दिन सुरैया ने अपनी उस अंगूठी को, जो मैंने उसे दी थी, समुंदर के किनारे जाकर, उसे अंतिम बार देख कर, दूर समुंदर में फेंक दिया। मेरा दिल टूट गया, लगा जैसे मेरी दुनिया ही उजड़ गई है। उसके बिना मुझे अपनी ज़िंदगी बेमानी लगने लगी। लेकिन अपने आप को मार कर भी तो कुछ साबित नहीं होता, सिवाय अपने आप को कायर ठहराने के। आख़िरकार मैं अपने भाई चेतन के कंधे पर सर रख कर ख़ूब रोया, क्योंकि चेतन को ही पता था कि मैं सुरैया से कितना प्यार करता था। उन्होंने मुझे सांत्वना देते हुए कहा था कि तुम्हारे जीवन का यह अध्याय तुम्हें आगे जीवन में और ज़्यादा मज़बूत बना देगा इससे भी बड़ी मुसीबतों और लड़ाइयों को लड़ने के लिए।" उधर दोस्तों, सुरैया ने भी आजीवन शादी नहीं की और देव आनंद के लिए अपने प्यार को बिकने नहीं दिया, मिटने नहीं दिया, मरने नहीं दिया। सुरैया के इस निष्पाप प्रेम में इतनी शक्ति और सच्चाई थी कि किसी भी फ़िल्मकार की आज तक हिम्मत नहीं हुई उनके जीवन की इस कहानी पर फ़िल्म बनाने की। सुरैया ने जैसे अपने ही गाये हुए उस गीत को सच साबित कर दिया कि "परवानों से प्रीत सीख ली शमा से सीखा जल जाना, फिर दुनिया को याद रहेगा तेरा मेरा अफ़साना"।

दोस्तों, आज के इस अंक के लिए देव आनंद और सुरैया की जिस फ़िल्म का गीत हमने चुना है, वह है 'अफ़सर'। इस फ़िल्म का एक बहुत ही ख़ूबसूरत गीत "मनमोर हुआ मतवाला, किसने जादू डाला"। इस गीत के ज़रिये सुरैया के दिल में यादें जुड़ी थीं सचिन देव बर्मन की। तभी तो उन्होंने उस 'जयमाला' कार्यक्रम में इस गीत को और बर्मन दादा को याद किया था इन शब्दों में - "फ़ौजी भाइयों, आज तक मैंने करीब सौ फ़िल्मों में काम किया है और इसी हिसाब से कई सौ गानें भी गाये होंगे! मगर गाना मैंने बाक़ायदा किसी से सीखा नहीं, इसे ख़ुदा की ही देन कह लीजिए कि म्युज़िक डिरेक्टर्स मुझे जैसा रिहर्स करा देते थे, मैं वैसा ही गा देती थी। देव आनंद की फ़िल्म 'अफ़सर' जब बन रही थी तो बर्मन दादा ने मेरे लिए एक गीत तैयार किया। बर्मन दादा इस गीत को इतना गाते थे कि मैंने देव आनंद से कहा कि क्यों ना सिचुएशन बदल दी जाये और इस गीत को बर्मन दादा ही गाये! लेकिन बर्मन दादा नहीं राज़ी हुए, कहने लगे कि यह गीत ख़ास तौर से तुम्हारे लिए बनाया है, इसलिए तुम्हे ही गाना होगा। ख़ैर, मैंने ही वह गीत गाया"। और दोस्तों, आप भी अब उस गीत का आनंद लीजिए जिसे पंडित नरेन्द्र शर्मा ने लिखा है।



क्या आप जानते हैं...
कि देव आनंद के साथ सुरैया ने कुल ६ फ़िल्मों में काम किया। ये फ़िल्में हैं 'विद्या', 'जीत', 'शायर', 'नीलू', 'दो सितारे' और 'अफ़सर'।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -इस फिल्म में सुर्रैया के नायक थे सी एच आत्मा.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अरे एक बार फिर वही कहानी...सच है इससे रोचक मुकाबला आज तक नहीं हुआ है...अनजाना जी और अमित जी बधाई के पात्र हैं और बधाई प्रतिभा जी और किशोर संपत जी को भी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सुर संगम में आज - उस्ताद हबीब ख़ान का बजाया विचित्र वीणा वादन



सुर संगम - 06

विचित्र वीणा का रेंज पाँच ऒक्टेव का होता है। सितार की तरह विचित्र वीणा भी उंगलियों में मिज़राब (plectrums) पहनकर बजाया जाता है, तथा मेलडी के लिए शीशे का एक बट्टा मुख्य तारों पर फेरा जाता है। दो नोट्स के बीच दो इंच का फ़ासला हो सकता है।


सुप्रभात! 'सुर-संगम' में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। दोस्तों, हमारे देश में प्राचीण काल से जितने भी साज़ हुए हैं, उनमें से कुछ साज़ आज विलुप्त प्राय हो गये हैं, यानी कि जिनका आज इस्तमाल ना के बराबर हो गये हैं। रुद्र-वीणा और सुरशृंगार की तरह विचित्र-वीणा एक ऐसा ही साज़ है। प्राचीन काल में एकतंत्री वीणा नाम का एक साज़ हुआ करता था; विचित्र वीणा उसी साज़ का आधुनिक रूप है। इस वीणा में तीन फ़ीट लम्बा और ६ इंच चौड़ा एक डंड होता है, और दोनों तरफ़ दो तुम्बे होते हैं कद्दु के आकार के जिन्हें हम रेज़ोनेटर भी कह सकते हैं। डंड के दोनों छोर पर मोर के सर की आकृति बनी होती है। विचित्र वीणा वादक वीणा को अपने सामने ज़मीन पर रख कर अपनी उंगलियाँ तारों पर फेरता है।

विचित्र वीणा में मौजूद तारों (स्ट्रिंग्स) की बात करें तो इसमें चार मुख्य 'प्लेयिंग् स्ट्रिंग्स' होते हैं और पाँच 'सेकण्डरी स्ट्रिंग्स' होते हैं जिन्हें चिलकारी कहा जाता है, और जिन्हें छोटी उंगली से बजाया जाता है एक ड्रोन-ईफ़ेक्ट के लिए। इन तारों के नीचे १३ 'सीम्पैथेटिक स्ट्रिंग्स' होते हैं जिनका इस्तमाल किसी राग के सुरों को ट्युन करने के लिए किया जाता है। विचित्र वीणा का रेंज पाँच ऒक्टेव का होता है। सितार की तरह विचित्र वीणा भी उंगलियों में मिज़राब (plectrums) पहनकर बजाया जाता है, तथा मेलडी के लिए शीशे का एक बट्टा मुख्य तारों पर फेरा जाता है। दो नोट्स के बीच दो इंच का फ़ासला हो सकता है। बट्टे के फ़्रिक्शन को दूर करने के लिए स्ट्रिंग्स पर नारियल का तेल लगाया जाता है।

विचित्र वीणा का प्रयोग मुख्यत: ध्रुपद शैली के गायन के संगीत में किया जाता है। विचित्र वीणा बहुत ज़्यादा स्पष्ट सुर नहीं जगा पाता, इसलिए इसे एक संगत साज़ के तौर पर ही ज़्यादा इस्तमाल किया जाता है; वैसे एकल रूप में भी विचित्र वीणा बहुत से कलाकारों ने बजाया है। इस साज़ को गुमनामी से बाहर निकाला था डॊ. लालमणि मिश्र ने, जिन्होंने विचित्र वीणा पर मिश्रवाणी कम्पोज़िशन्स का निर्माण किया। उन्हीं के सुपुत्र डॊ. गोपाल शंकर मिश्र ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया और दूर दूर तक फैलाया। विचित्र वीणा के प्रचार प्रसार में जो नाम उल्लेखनीय हैं, वो इस प्रकार हैं:

१. जेसिंहभाई, जिन्हे विचित्र वीणा के आधुनिक रूप के जन्मदाता होने का श्रेय दिया जाता है। उस समय इस साज़ को बट्टा-बीन कहा जाता था।

२. पंडित गोस्वामी गोकुलनाथ, जो बट्टा-बीन के प्राचीनतम उपासकों में से एक थे और जो पुश्टि सम्प्रदाय के बम्बई शाखा से ताल्लुख रखते थे।

३. उस्ताद जमालुद्दिन ख़ान, जो उस्ताद अब्दुल अज़ीज़ ख़ान के गुरु थे और वे ताल्लुख रखते थे जयपुर घराने से।

४. उस्ताद अब्दुल अज़ीज़ ख़ान, जो पहले बम्बई के एक सारंगी वादक थे, और विचित्र वीणा पर ख़याल और ठुमरी बजाने वाले पहले वादक थे। लाहौर के गंधर्व महाविद्यालय के वार्षिक संगीत सम्मेलन में पहली बार वादन प्रस्तुत करने के बाद उन्हें फिर कभी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। संगत के तौर पर वो पखावज से ज़्यादा तबला पसंद करते थे। पटियाला के महाराजा के दरबार के वो संगीतज्ञ थे।

५. उस्ताद हबीब ख़ान, जो उस्ताद अब्दुल अज़ीज़ ख़ान के भाई व छात्र थे। (आज इन्हीं का बजाया हुआ विचित्र वीणा हम सुनेंगे)

कुछ और नाम हैं मोहम्मद शरीफ़ ख़ान पूँचावाले, पंडित गोपाल कृष्ण शर्मा, पंडित श्रीकृष्णन शर्मा, उस्ताद अहमद रज़ा ख़ान, पंडित गोपाल शंकर मिश्र (पंडित लालमणि मिश्र के सुपुत्र), डॊ. मुस्तफ़ा रज़ा, पंडित अजीत सिंह पंडित शिव दयाल बातिश, फ़तेह अली ख़ान, गियानी रिचिज़ी, विजय वेण्कट, पद्मजा विश्वरूप, डॊ. राधिका उम्देकर बुधकर आदि।

आइए आपको आज एक बेहद दुर्लभ रेकॊर्डिंग् सुनाते और दिखाते हैं (यू-ट्युब के सौजन्य से)। यह सन् १९३८ में रेकॊर्ड की हुई एक शॊर्ट फ़िल्म है जिसमें उस्ताद हबीब ख़ान नज़र आ रहे हैं विचित्र वीणा बजाते हुए। तबले पर उनका संगत कर रहे हैं उस्ताद अहमदजान थिरकवा। राग है सोहनी।

विचित्र वीणा वादन - उस्ताद हबीब ख़ान (१९३८)
न सिर्फ सुनिए मगर देखिये भी


आशा है इस दुर्लभ रेकॊर्डिंग को देख कर व सुन कर अच्छा लगा होगा। राग सोहनी की अब बात करते हैं। यह हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के मारवा ठाट का राग है। इसमेम पाँच स्वर लगते हैं आरोहन में और छह स्वर अवरोहन में। रिशभ (रे) कोमल है और मध्यम (मा) तीव्र है; बाकी सभी स्वर शुद्ध लगते हैं। पंचम (पा) का प्रयोग इस राग में नहीं होता है। वादी स्वर धा होता है तथा समवादी स्वर गा। यह एक उत्तरांग प्रधान राग है, जिसके ऊँचे सुर सप्तक तक पहूँचते हैं। राग सोहनी रात के आख़िरी या आठवें प्रहर में गाया जाता है, यानी कि सुबह ३ से ६ बजे के बीच। सोहनी राग मारवा और पूरिया रागों से मिलता जुलता राग है मारवा ठाट में ही, और पूर्वी ठाट के राग बसंत से भी मेल खाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस राग का सब से पुराना रेकॊर्डिंग् अब्दुल करीम ख़ान साहब का है जो १९०५ में रेकॊर्ड हुई थी। लेकिन हम यहाँ पर सुनेंगे राग सोहनी पर आधारित फ़िल्म 'संगीत सम्राट तानसेन' का मुकेश का गाया "झूमती चली हवा याद आ गया कोई"। एस. एन. त्रिपाठी का संगीत है। इस गीत को हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर भी बजा चुके हैं, लेकिन ऐसे मीठे सुरीले गीतों का आनंद तो हर रोज़ ही लिया जा सकता है, है न? .

गीत: झूमती चली हवा याद आ गया कोई (संगीत सम्राट तान्सेन)


इसी के साथ 'सुर-संगम' से आज हमें इजाज़त दीजिए, शाम ६:३० बजे सुरैया जी के गाये एक बेहद सुरीले नग़मे के साथ पुन: वापस आयेंगे, बने रहिए 'आवाज़' के साथ। नमस्कार

प्रस्तुति-सुजॉय चटर्जी



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Saturday, February 5, 2011

ई मेल के बहाने यादों के खजाने - हमारी ही मुठ्ठी में आकाश सारा...फिर क्यों ये नन्हीं जानें भटकने को मजबूर हैं बेसहारा



नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। इस साप्ताहिक विशेषांक को हम सजाते हैं या तो आप ही के भेजे हुए प्यारे प्यारे ईमेल से 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' के रूप में, या किसी कलाकार से आपको मिलवाया जाता है, या फिर कोई विशेषालेख पेश होता है। आज बारी है 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' की। आज एक ऐसा ईमेल पेश हो रहा है जिसे पढ़ कर हम सब थोड़ा सोचने पर भी मजबूर हो जाएँगे, थोड़ी सी उदासी भी छायेगी, और थोड़ा सा आशावादी स्वर भी गूंजेगा। लीजिए पहले ईमेल पढ़िए जिसे लिख भेजा है मेरे प्रिय दोस्त सुमित चक्रवर्ती ने चण्डीगढ़ से। यह उनका भेजा हुआ दूसरा ईमेल है जिसे हम शामिल कर रहे हैं।

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प्रिय सुजॊय दा

'ई-मेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में मेरे पिछ्ले ई-मेल को शामिल करने का शुक्रिया। आज मैं आपको अपने एक अनोखे अनुभव के बारे में बताने जा रहा हूँ।

किसी ने सच ही कहा है कि बच्चे ईश्वर का रूप होते हैं| एक नन्हे सदस्य के आते ही पूरे घर का माहौल बदल जाता है| उनकी नन्ही-नन्ही किलकारियाँ और नटखट अटखेलियाँ घर-आँगन में गूंजने लगती हैं| वह घर के सभी सदस्यों की आँखों का तारा बन जाता है| बच्चे के अभिभावक तभी से उसके भविष्य के लिए सोचने में जुट जाते हैं| उसे पौष्टिक आहार दिया जाता है, अच्छी शिक्षा दी जाती है ताकि वह बड़ा होने पर अपने पैरों पर खड़ा हो सके और एक ज़िम्मेदार नागरिक बनकर अपने माता-पिता का नाम रौशन करे| हमारे समाज तथा गृह-व्यवस्था की ये छवि कितनी सुखद लगती है| परंतु इसके ठीक विपरीत हमारे समाज की एक सच्चाई ऐसी भी ही है जो हमें सोचने पर विवश कर देता है| मैं उस स्थिति की बात कर रहा हूँ जिसमे एक नन्ही सी जान को पैदा होते ही ठुकरा दिया जाता है केवल इसलिए की उसने एक कन्या के रूप में जन्म लिया, या फिर वह स्थिति जिसमें बच्चों को पूर्ण पोषण नहीं मिलता, भूख व गरिबी के कारण उन्हें बाल-मज़दूरी की ओर धकेल दिया जाता है - उनका शोषण किया जाता है|

आप भी सोच रहे होंगे की मैं अचानक इतनी गहरी व मर्मशील बातें क्यूँ कर रहा हूँ? ऐसा इसलिए कि हाल ही में मैं कुछ ऐसे ही बच्चों से रू-ब-रू हुआ जिन्हें हमारे समाज ने नहीं अपनाया| ये मौका मुझे मिला जब मैं अपने कुछ दोस्तों तथा सहकर्मियों के साथ मदर टेरेसा द्वारा स्थापित संस्था "मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी" गया| चंडीगढ़ में कुछ एन.जी.ओ'ज़ से ज़ुड़े होने के कारण हम कई ऐसी संस्थाओं में जाते रहते हैं| वहाँ बुज़ुर्गों से बातें करते हैं, बच्चों के साथ खेलते हैं और कई बार संगीत व नृत्य का रंगारंग कार्यक्रम आयोजित करते हैं| पिछली बार 'मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी' का अनुभव बेहद अनूठा रहा| अब इसे संयोग ही कहिए की जिस दिन हम वहाँ गये, उस दिन महान गायक मन्ना डे साहब का जन्मदिन था, यानि १ मई| अब मज़े की बात ये थी कि मिशनरीज़ के बच्चों ने भी उस दिन एक संगीत का कार्यक्रम मन्ना दा के सम्मान में प्रस्तुत किया| उनकी जो प्रस्तुति मुझे सबसे अधिक छू गयी वह थी तीन नेत्रहीन बालिकाओं द्वारा गाया वह गीत जिसे फिल्म "प्रहार" में मन्ना दा और कुछ बच्चों ने गाया था| गीत है - "हमारी ही मुठ्ठी में आकाश सारा, जब भी खुलेगी चमकेगा तारा"। सच मानिये उनके इस गीत को सुनकर हम अपने आँसू रोक न सके। उन बच्चों के साथ समय बिता कर जो संतुष्टि हमारे मन को मिली उसे शब्दों में व्यक्त करना शायद मुश्किल होगा। ये बच्चे भी अपने पांव पर खड़ा होना चाहते हैं और उन्हें पूरा हक़ भी है। ज़रूरत है उन्हें तो सिर्फ़ हमारे सहयोग की, थोड़े प्यार की, जिससे वे वंचित रह गये। आशा करता हूं कि हिन्द-युग्म जैसे प्रबल मंच द्वारा मेरा यह लेख शायद जागृति का दिया जला सके ताकि ये बच्चे भी हमारे देश का नाम रौशन करें।

धन्यवाद।
आपक प्रिय अनुज

सुमित

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सचमुच आँखें नम हो गईं। हम अक्सर अनाथ बच्चों के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त करते हैं, लेकिन बहुत से बच्चे ऐसे भी हैं जो माता पिता के होते हुए भी अनाथ होने के बराबर हैं। इससे शर्मनाक और दुखदायी बात और क्या हो सकती है। इस मंच के सभी पाठकों से बस यही निवेदन कर सकते हैं कि "आइए हाथ बढ़ाएँ हम भी!!!"

मन्ना डे और बच्चों द्वारा गाये फ़िल्म 'प्रहार' के इस आशावादी रचना को सुनते हैं, जिसे लिखा है मंगेश कुल्कर्णी नें और संगीत है लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का। वैसे तो यह एक प्रार्थना के रूप में गाया गया है, लेकिन पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष, केवल आशावादी।

गीत - हमारी ही मुट्ठी में आकाश सारा (प्रहार - मन्ना डे, साथी)


इन्हीं आवाज़ों में सुनते हैं इस गीत का सैड वर्ज़न भी।

गीत - हमारी ही मुट्ठी में आकाश सारा - सैड (प्रहार - मन्ना डे, साथी)


इस गीत को कविता कृष्णमूर्ती और बच्चों ने भी गाया था जिसे बहुत ज़्यादा नहीं सुना गया। आज जब कि हम ख़ास इस गीत की चर्चा कर रहे हैं, तो आइए कविता जी की आवाज़ में भी इस गीत का आनंद लें।

गीत - हमारी ही मुट्ठी में आकाश सारा (प्रहार - कविता कृष्णमूर्ती, साथी)


और अब इस गीत की धुन भी सुनिए माउथ ऒर्गैन पर बजाया हुआ।

गीत - हमारी ही मुट्ठी में आकाश सारा (प्रहार - इन्स्ट्रुमेण्टल)


तो ये था इस सप्ताह का 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष'। आशा है आपको अच्छा लगा होगा। सुमित की तरह आप भी अपने जीवन के यादगार लम्हों को हमारे साथ बाँट सकते हैं हमें oig@hindyugm.com के पते पर ईमेल भेज कर। किसी यादगार घटना या संस्मरण को हमारे साथ बाँटिए 'आवाज़' के उस स्तंभ के ज़रिए जिसका नाम है 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। आज बस इतना ही, फिर मुलाक़ात होगी कल सुबह 'सुर संगम' में। नमस्कार, शुभ रात्री।

Thursday, February 3, 2011

तेरे नैनों ने चोरी किया....सुर्रैया का नटखट अंदाज़ इस मधुर और सदाबहार गीत में



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 585/2010/285

सुरैया के गाये गीतों से सजी लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' लेकर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में हम फिर उपस्थित हैं। आज इस शृंखला की पाँचवी कड़ी है। जैसा कि कल हमने बताया था कि सुरैया जी ने संगीत की कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली थी; लेकिन सुर को, लय को, बहुत आसान दक्षता से पकड़ लिया करती थीं। उन्होंने नूरजहाँ, ख़ुरशीद, ज़ोहराबाई, अमीरबाई जैसी उस दौर की गायिकाओं के बीच अपनी ख़ास जगह और पहचान बनाई। उनकी मधुर आवाज़ को दुनिया के सामने लाये थे नौशाद, लेकिन बाद में पंडित हुस्नलाल-भगतराम ने उनसे एक से बढ़कर एक गीत गवाया। ४० से लेकर ५० के दशक के बीच उनका फ़िल्मी सफ़र बुलंदियों पर था। उनकी अदाकारी और गायकी परवान चढ़ती गई। हुस्नलाल भगतराम के ज़िक्र से याद आया कि १९४८ में एक फ़िल्म आयी थी 'प्यार की जीत'। 'बड़ी बहन' की तरह इस फ़िल्म के गीतों ने भी अपार कामयाबी हासिल की। इस फ़िल्म को याद करते हुए सुरैया ने 'जयमाला' में कहा था - "फ़ौजी भाइयों, फ़िल्म 'प्यार की जीत' आप लोगों में से बहुतों ने देखी होगी, और इस फ़िल्म का वह गीत भी याद होगा, "एक दिल के टुकड़े हज़ार हुए, कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा" (हँसते हुए)। मुझे और रहमान साहब को इस गीत के बोलों पर बड़ी हँसी आती थी। ख़ैर, रहमान साहब की तो बात ही निराली थी, बड़े पुर-मज़ाक हैं वो, ख़ास कर सीरियस सीन से पहले तो मुझे ज़रूर हँसाते थे। अच्छा, सुनिए उसी फ़िल्म का एक गीत"। और दोस्तों, उस दिन सुरैया जी ने बजाया था "कोई दुनिया में हमारी तरह बरबाद ना हो, दिल तो रोता है मगर होठों पे फ़रियाद ना हो"। लेकिन आज हम यह ग़मज़दा गीत नहीं सुनेंगे, बल्कि इसी फ़िल्म का एक ख़ुशरंग गीत, "तेरे नैनों ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया, परदेसिया"। अपने ज़माने का एक बेहद लोकप्रिय गीत, जो आज भी बेहद चाव से सुना जाता है।

पंडित हुस्नलाल-भगतराम का संगीत १९४७ में नज़रंदाज़ ही रहा। 'मोहन', 'रोमियो ऐण्ड जुलियट' जैसी फ़िल्में असफल रही थी। १९४८ में 'आज की रात' फ़िल्म में सुरैया ने हुस्नलाल-भगतराम के लिए कुछ गीत गाये थे फिर इन गीतों को भी ज़्यादा मक़बूलीयत हासिल नहीं हुई। और यही हाल मीना कपूर के गाये गीतों वाली १९४८ की फ़िल्म 'लखपति' का भी हुआ। लेकिन इसी साल 'प्यार की जीत' में सुरैया के गाये लाजवाब गीतों ने असफलता के इस क्रम को तोड़ा और हुस्नलाल-भगतराम लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच गये। आइए इस फ़िल्म के गीतों की थोड़ी चर्चा करें। "कोई दुनिया में हमारी तरह बर्बाद न हो" और आज का गीत "तेरे नैनों ने चोरी किया" तो लिस्ट में सब से उपर हैं ही, इनके अलावा राग पीलू पर आधारित "ओ दूर जाने वाले, वादा ना भूल जाना" भी एक लाजवाब गीत रहा है। इस फ़िल्म में सुरैया ने मीना कपूर, सुरिंदर कौर और साथियों के साथ मिलकर एक दुर्लभ गीत गाया था "इतने दूर हैं हुज़ूर"। गीतकार थे राजेन्द्र कृष्ण और कमर जलालाबादी. आज के प्रस्तुत गीत के बारे में यही कह सकते हैं कि "तेरे नैनों ने" के बाद का हल्का अंतराल तथा ढोलक-तबले के ठेकों ने गीत की सुंदरता में चार चाँद लगाये। और इस ट्रेण्ड को हुस्नलाल भगतराम ने फिर अपनी आगे की फ़िल्मों में भी किया। तो आइए सुनते हैं यह गीत.



क्या आप जानते हैं...
कि अभिनेता धर्मेन्द्र सुरैया के ज़बरदस्त फ़ैन थे। वो उन दिनों मीलों का फ़ासला तय करके सुरैया की फ़िल्में देखने जाया करते थे। 'दिल्लगी' उन्होंने कुछ ४० बार देखी थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 06/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद आसान.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह एक बार फिर अमित जी और अंजाना जी एक साथ...प्रतिभा जी और किश संपत जी से बहुत दिनों बाद मुलाकात हुई स्वागत है....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, February 2, 2011

एक तुम हो एक मैं हूँ, और नदी का किनारा है....जब सुर्रैया ने याद किया अपने शुरूआती रेडियो के दिनों को



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 584/2010/284

ल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' लघु शृंखला की चौथी कड़ी में आज हम फिर एक बार सुरैया के बचपन के दिनों में चलना चाहेंगे, जब वो रेडियो से जुड़ी हुई थीं। दोस्तों, १९७१ में 'विशेष जयमाला' के अलावा भी १९७५ में सुरैया जी को विविध भारती के स्टुडिओज़ में आमंत्रित किया गया था एक इंटरव्यु के लिए। उसी इंटरव्यु से चुनकर एक अंश यहाँ हम पेश कर रहे हैं। सुरैया से बातचीत कर रहे हैं शमीम अब्बास।

शमीम: सुरैया जी, आदाब!

सुरैया: आदाब!

शमीम: सुरैया जी, मुझे आप बता सकती हैं कि कितने दिनों के बाद विविध भारती के स्टुडियो में आप फिर आयी हैं?

सुरैया: देखिए अब्बास साहब, मेरे ख़याल से, वैसे तो मैं सालों के बाद आयी हूँ, लेकिन आपको मैं एक बात बताऊँगी कि मैं पाँच की उम्र से रेडियो स्टेशन में आ गई थी और मेरे लिए यह कोई नयी जगह नहीं है। मैं कैसे आयी यह आपको ज़रूर बताऊँगी। संगीतकार मदन मोहन जी मेरे पड़ोसी हुआ करते थे, और वो बच्चों के कार्यक्रम में हमेशा हिस्सा लिया करते थे। तो वे मुझे खींचकर यहाँ ले आये।

शमीम: विविध भारती तो नहीं था उस वक़्त?

सुरैया: ना! विविध भारती नहीं था, ज़ेड. ए. बुख़ारी साहब स्टेशन डिरेक्टर हुआ करते थे रेडिओ स्टेशन के, और तब से मैं कई साल, हर सण्डे को वह प्रोग्राम हुआ करता था।

शमीम: किस तरह के प्रोग्राम? गानें या ड्रामे?

सुरैया: नहीं, हम तो, मैं, मदन मोहन, राज कपूर, हम सब हिस्सा लिया करते थे और फ़िल्मों के गानें कॊपी करके गाया करते थे।

शमीम: आज भी कुछ गानें कॊपी किए जाते हैं!

सुरैया: (ज़ोर से हँसती हैं)

शमीम: तो आपकी शुरुआत रेडिओ से ही हुई?

सुरैया: जी हाँ! सिंगिंग् करीयर रेडिओ से ही शुरु हुआ था।

शमीम: आपने एक बार किसी रेडिओ प्रोग्राम में कहा था कि आप ने बाक़ायदा गाना किसी से सीखा नहीं, क्या यह सच है?

सुरैया: जी हाँ! सही बात है। मैंने कोई तालीम नहीं ली।

शमीम: जिस वक़्त आपने गाना शुरु किया था, उस वक़्त तो प्लेबैक नहीं था या नया नया शुरु हुआ था!

सुरैया: प्लेबैक सिस्टम तो था लेकिन ज़्यादातर जो काम करते थे वो ख़ुद ही गाते थे।

शमीम: आपने भी कभी किसी का प्लेबैक दिया है?

सुरैया: जी हाँ, नौशाद साहब की एक दो फ़िल्में थीं - 'शारदा', 'कानून' और 'स्कूल मास्टर'। ये तीन फ़िल्में थीं जिनमें मैंने प्लेबैक दिया था।

दोस्तों, इन तीन फ़िल्मों में से फ़िल्म 'शारदा' का गीत हमने पहले अंक में सुना था। आइए आज इन्हीं में से फ़िल्म 'कानून' का एक मशहूर गीत सुनते हैं। "एक तुम हो एक मैं हूँ, और नदी का किनारा हो, समा प्यारा प्यारा हो"। 'कानून' १९४३ की फ़िल्म थी ए. आर. कारदार की। इस फ़िल्म में निर्मला और सुरैया के गाये गीत छाये रहे। आपको बता दें कि ये वही निर्मला देवी हैं जो अभिनेता गोविंदा की माँ हैं और प्रसिद्ध ठुमरी गायिका भी। निर्मला जी ने 'कानून' में "सैंया खड़े मोरे द्वार में" और "आ मोरे सैंया" गाया था तो सुरैया ने आज का पोरस्तुत गीत गाकर ख़ूब लोकप्रियता बटोरी थी। इसी फ़िल्म में सुरैया ने श्याम के साथ "आए जवानी" गीत भी गाया था। बरसों बाद नौशाद साहब ने ही सुरैया और श्याम से फिर एक बार एक युगल गीत गवाया था फ़िल्म 'दिल्लगी' में जो बहुत बहुत हिट हुआ था, गीत था "तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी"। १९४३ में सुरैया ने कारदार साहब के कुछ और फ़िल्मों में गीत गाये जैसे कि 'संजोग' और 'नाटक'। तो लीजिए सुनिए फ़िल्म 'कानून' का यह गीत, गीतकार हैं ......



क्या आप जानते हैं...
कि १९४२ की फ़िल्म 'तमन्ना' में गायक मन्ना डे ने पहली बार गीत गाया था और वह भी सुरैया के साथ गाया हुआ एक युगल-गीत

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 05/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद आसान.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह क्या मुकाबला है, अंजाना जी बधाई....अमित जी और अवध जी तत्पर मिले

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, February 1, 2011

मिलने के दिन आ गए....सुर्रैया और सहगल की युगल आवाजों में एक यादगार गीत



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 583/2010/283

फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध गायिका-अभिनेत्री सुरैया पर केन्द्रित लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' की तीसरी कड़ी लेकर हम हाज़िर हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के महफ़िल की शमा जलाने के लिए। ३० और ४० के दशकों में कुंदन लाल सहगल का कुछ इस क़दर असर था कि उस ज़माने के सभी कलाकार उनके साथ काम करने के लिए एक पाँव पर खड़े रहते थे। और अगर किसी नए कलाकार को यह सौभाग्य प्राप्त हो जाए तो उसके लिए यह बहुत बड़ी बात होती थी। ऐसा ही मौका सुरैया जी को भी मिला जब १९४५ में फ़िल्म 'तदबीर' में उन्हें सहगल साहब के साथ न केवल अभिनय करने का मौका मिला, बल्कि उनके साथ युगल गीत गाने का भी मौका मिला। और क्योंकि सुरैया जी ख़ुद यह मानती थी कि यह उनके लिए एक बहुत बड़ी बात थी, इसलिए हमने सोचा कि सुरैया और सहगल साहब का गाया उसी फ़िल्म का एक युगल गीत इस शृंखला में बजाया जाए। गीत के बोल हैं "मिलने के दिन आ गये"। इस फ़िल्म में संगीत था कमचर्चित संगीतकार लाल मोहम्मद का। उनके बारे में अभी आपको बताएँगे, लेकिन उससे पहले सुनिए सुरैया के शब्दों में सहगल साहब के बारे में, उसी 'जयमाला' कार्यक्रम से - "एक ज़माना था जब मैं फ़िल्मी दुनिया में नहीं आयी थी और उस वक़्त सहगल साहब की फ़िल्मों को बड़े शौक से देखती थी। उनके गानों ने मुझ पर जादू की तरह असर किया था और मैं अकेले में उन्हीं के गीत गाती रहती थी। ये कभी सोचा भी ना था कि उनके साथ मेरी फ़िल्में भी बनेंगी। लेकिन सहगल साहब के साथ मेरी तीन फ़िल्में बनीं - 'तदबीर', 'उमर ख़य्याम', और 'परवाना'। मुझे फ़क्र है कि मैंने उनके साथ काम किया और बहुत कुछ सीखा। एक बार मैंने उनसे पूछा, "सहगल साहब, आप इतना अच्छा कैसे गा लेते हैं?" तो सहगल साहब ने जवाब दिया, "हम जिस गाने को गाते हैं, पहले उसके जज़्बात को समझते हैं, उसकी भावनाओं में डूब जाते हैं और तभी वही भावनाएँ सुरों में ढलकर निकलती हैं"।

और अब कुछ बातें संगीतकार लाल मोहम्मद की। ये बातें हमने बटोरी पंकज राग लिखित किताब 'धुनों की यात्रा' से। लाल मोहम्मद तबले के उस्ताद माने जाते थे और मास्टर ग़ुलाम के भी सहायक रहे थे। जयंत देसाई प्रोडक्शन की सहगल-सुरैया अभिनीत मशहूर फ़िल्म 'तदबीर' का संगीत ख़ूब लोकप्रिय हुआ था और लाल मोहम्मद की सफलतम फ़िल्मों में से एक है। सहगल साहब के गाये इस फ़िल्म के गीतों में "जनम-जनम का दुखिया प्राणी आया शरण तिहारी", "मैं पंछी आज़ाद मेरा कहीं दूर ठिकाना रे", "चाहे तू मिटा दे, चाहे तू बचा ले" और इन सब से बढ़कर राग भीमपलासी पर आधारित 'हसरतें ख़ामोश हैं" तथा बनारसी अंग लिए हुए सम्भवत: राग जौनपुरी पर आधारित "मैं किस्मत का मारा भगवान" ने ख़ूब धूम मचाई थी। सुरैया का "जाग ओ सोने वाले, कोई जगाने आया" और "उड़ने वाले पंछी" भी अच्छे चले थे। इसी फ़िल्म में सुरैया को सहगल के साथ 'रानी खोल दे अपने द्वार' जैसा लोकप्रिय गाना भी गाने का यादगार अवसर मिला था। यह गीत राग देस पर आधारित था। तो आइए, सुनते हैं गुज़रे ज़माने की दो यादगार आवाज़ें, फ़िल्म 'तदबीर' के इस गीत में। गीतकार हैं स्वामी रामानंद।



क्या आप जानते हैं...
कि एक बार जयंत देसाई की फ़िल्म 'सम्राट चन्द्रगुप्त' के एक गीत की रेकॊर्डिंग् में सहगल साहब ने सुरैया को गाते हुए सुना, और अपनी अगली फ़िल्म 'तदबीर' के लिए उन्हें अभिनेत्री चुनने का सुझाव दिया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - इस फिल्म के निर्देशक थे ए आर कारदार.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - एक प्रसिद्ध ठुमरी गायिका ने भी इस फिल्म में प्ले बैक किया था जो आज के दौर के एक मशहूर अभिनेता की माँ भी थी, जानते हैं क्या उनका नाम - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अंजाना जी आपको २ अंक मिलते अगर आप दूसरी बार जवाब नहीं देते, अगर आप दूसरे जवाब को डिलीट भी कर देते तो भी ठीक था, पर वास्तव में दो जवाब देकर आपने किसी और का एक अंक छीन लिया, और नियम तो नियम है उसका पालन हमें करना पड़ेगा बेहद दुःख के साथ. चलिए आगे से आपको याद रहेगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

तेरे लिए किशमिश चुनें, पिस्ते चुनें: ऐसे मासूम बोल पर सात क्या सत्तर खून माफ़! गुलज़ार और विशाल का कमाल!



Taaza Sur Taal (TST) - 04/2011 - SAAT KHOON MAAF

एक गीतकार जो सीधे-सीधे यीशु से सवाल पूछता है कि तुम अपने चाहने वालों को कैसे चुनते हो, एक गीतकार जो अपनी प्रेमिका के लिए परिंदों से बागों का सौदा कर लेता है ताकि उसके लिए किशमिश और पिस्ते चुन सके, एक गीतकार जो प्रेमिका की तारीफ़ के लिए "म्याउ-सी लड़की" जैसे संबोधन और उपमाओं की पोटली उड़ेल देता है, एक गीतकार जो आँखों से आँखें चार करने की जिद्द तो करता है, लेकिन मुआफ़ी भी माँगता है कि "सॉरी तुझे संडे के दिन ज़हमत हुई", एक गीतकार जो ओठों से ओठों की छुअन को "ऒठ तले चोट चलने" की संज्ञा देता है, एक गीतकार जो सूखे पत्तों को आवारा बताकर ज़िंदगी की ऐसी सच्चाई बयां करता है कि सीधी-सादी बात भी सूफ़ियाना लगने लाती है .. यह एक ऐसे गीतकार की कहानी है जो शब्दों से ज्यादा भाव को अहमियत देता है और इसलिए शब्दों के गुलेल लेकर भावों के बगीचे में नहीं घुमता, बल्कि भावों के खेत में खड़े होकर शब्दों की चिड़ियों को प्यार से अपने दिल के मटर मुहैया कराता है और फिर उन चिड़ियों को छोड़ देता है खुले आसमान में परवाज़ भरने के लिए, फिर जो भी बहेलिया उन चिड़ियों को अपनी समझ के गुलेल से बस में करने की कोशिश करता है, उसे उन "परिंदों" के पर हीं नसीब होते है, लेकिन जिसे खुले आसमान से प्यार है, वह उन "पाखियों" की हरेक उड़ान का मर्म जान लेता है और न जानते हुए भी जुड़ जाता है उस जादूगर से जिसके पास बार-बार लौटकर ये पंछी जाया करते हैं। यह एक ऐसे गीतकार की कहानी है, जिसे यूँ हीं "गुलज़ार" नहीं कहा जाता।

अब खैर तो नहीं,
कोई बैर तो नहीं,
दुश्मन जिये मेरा,
वो भी गैर तो नहीं..
(ओ मामा)

अपने दिल को इतने प्यार से शायद हीं किसी ने दुश्मन कहा होगा, वैसे भी गुलज़ार साहब दिल और चाँद से खेलने में माहिर है.. आखिर इन्होंने हीं "दिल को पड़ोसी" कहा था और "चाँद को थाली में परोस" दिया था.. शायद हीं ऐसी कोई नज़्म या ग़ज़ल होती है, जिसमें ये चाँद का ज़िक्र नहीं करते। संभव है कि किसी नज़्म या ग़ज़ल में ये चाँद का ज़िक्र करना भूल गए हों लेकिन "एलबम" या "फिल्म" के किसी न किसी गीत में चाँद की बात निकल हीं आती है, लेकिन यह क्या... मेरे हिसाब से "सात खून माफ़" अकेली या पहली फिल्म होगी जिसमें चाँद नदारद है.. हाँ तारे हैं, गुलज़ार साहब तारों को नहीं भूलते और इसलिए कहते हैं कि "तेरे लिए मैं सीसे का आसमान बुन दूँगा, ताकि पैर में तारों की किरचियाँ न चुभें" ("तेरे लिए")। सुरेश वाडेकर साहब ने इस गाने में क्या मिसरी घोली है, उसका बयान शब्दों में नहीं किया जा सकता। "तेरे लिए किशमिश चुनें, पिस्ते चुनें".. इन लफ़्ज़ों को सुनते हीं कश्मीर की वादी आँखों के सामने आ जाती है। वाडेकर साहब से विशाल ने इस गाने में वही तिलिस्म बुनवाया है, जो ओंकारा के "जाग जा" में नज़र आया था।

गुलज़ार साहब "तू" से "आप" का सफ़र बड़ी हीं ईमानदारी और बड़े हीं प्यार से पूरा करते हैं। मुझसे अगर एक गीतकार की हैसियत से पूछा जाए तो मुझे "तू" और "आप" दोनों हीं प्यारे हैं, लेकिन "तू" कुछ ज्यादा प्यारा है। किसी को "आप" कहकर "दिल" उड़ेल देना मुझे थोड़ा मुश्किल का काम लगता आया है, लेकिन "बेकरां" में जिस तरह से गुलज़ार साहब ने अपने नायक से "एक ज़रा चेहरा उधर कीजै इनायत होगी.......... लिल्लाह!!!" कहवा दिया है, उसके बाद तो मेरे सारे शक़-ओ-शुबहा दूर हो गए। हाँ ,अपनी प्रेयसी को "आप" कहकर भी उससे(उनसे) इश्क़ जताया जा सकता है और वो भी बड़े हीं लाजवाब तरीके से। "आँख कुछ लाल-सी है, रात जागे तो नही, रात जब बिजली गई, डर के भागे तो नही".. वाह! क्या मासूमियत है इन शब्दों में.. इस गीत को विशाल से अच्छी कोई आवाज़ नहीं मिल सकती थी.. "ओंकारा" के "ओ साथी रे" के बाद विशाल ने अपनी आवाज़ का मखमलीपन इसी गीत के लिये बचाकर रखा था मानो!

बरसों पहले जब गुलज़ार साहब ने एक नज़्म के माध्यम से भगवान शंकर से प्रश्न किया था कि "इतने सारे लोग तुम्हें दूध से नहवाते है, चिपचिपा कर देते हैं तुम्हें, धूप और अगरू के धुएँ से तुम्हारी नाक में दम कर देते हैं, फिर भी तुम हिलते-डुलते नहीं, ना हीं अपनी परेशानी बयां करते हो और ना दूसरों की परेशानी हीं सुनते हो"... "एक ज़रा छींक हीं दो तुम कि यकीं आए कि सब देख रहे हो" तभी मालूम पड़ गया था कि यह शायर ऊपर वाले से आँख में आँख डालकर सवाल पूछने की कुव्वत रखता है... तभी तो जब "यीशु" गाने में ये कहते हैं कि "गिरज़े का गज़र सुनते हो? फिर भी क्यूँ चुप रहते हो?" "क्या जिस्म ये बेमानी है, क्या रूह गरीब होती है, तुम प्यार हीं प्यार हो लेकिन, क्या प्यार सलीब होती है?" तो उस सर्वशक्तिमान की सत्ता भी कांपने लगती है। भला किसमें इतनी हिम्मत होगी जो यीशु से यह पूछे कि "रूई की तरह इस जिस्म को तुम कैसे धुनते हो?" जिस्म और रूह के अस्तित्व और अहमियत के ऐसे सवाल हमेशा-से हीं यक्ष-प्रश्न रहे हैं, काश कभी इसका जवाब मिल जाए! रेखा भारद्वाज जिस तरह से रूह में रूई डुबोकर यीशु के सलीब के सामने सवालों की एक सूची तैयार करती हैं, उससे नामुमकिन है कि "यीशु" ज्यादा देर तक चुप रह पाएँगे। सुनने वाले तो कतई नहीं रह सकते.. उनके दिलों से वाह और आह तो निकल हीं आएगी।

"खादिम को दिल पर तो इख्तियार करने दो" हो या फिर "खादिम हूँ, शहजादी को तैयार करने दो" यानि कि "डार्लिंग" हो या फिर "दूसरी डार्लिंग".. दोनों हीं मामलों में "रसियन धुन" पर थिरकती बावली को खुद के खादिम होने पर बड़ा ही गुमान है। खुद को अपने प्रेमी पर निछावर करने की ऐसी तड़प है कि वह "उसके मिलने" को "वस्ल-ए-ख़ुदा" (ख़ुदा से मिलना) मान बैठी है और इस बात से वह कतई भी शर्मिंदा नहीं है तभी तो कहती है कि "पब्लिक में सनसनी एक बार करने दो"। इस गीत में उषा उत्थुप की मर्दानी आवाज़ (जिसमें डार्लिंग की लंबी तान एक गूंज बनकर कानों में उतरती है) और रेखा भारद्वाज का "हस्कीनेस" एक दूसरे के पूरक बनकर सामने आते हैं। यहाँ पर कौन श्रेष्ठ है का निर्णय करना जितना मुश्किल है, उतना हीं फिजूल भी। "दूसरी डार्लिंग" में उषा उत्थुप पार्श्व में चली गई हैं जहाँ पर पहले से क्लिंटन सेरेजो और फ़्रैक्वाईस कैस्टेलिनों मौजूद हैं। इस गाने की धुन एक रसियन "लोक-गीत" की धुन पर आधारित है। उस रसियन गीत को यहाँ और यहाँ सुना जा सकता है।

अगले गीत की बात करूँ उससे पहले मैं उस गीत (आवारा) के बोलों की तरफ़ सबका ध्यान आकृष्ट कराना चाहूँगा:

आवारा आवारा
हवा पे रखे सूखे पत्ते आवारा
पाँव जमीं पे लगते ही उड़ लेते हैं दुबारा
ना शाख जुड़े ना जड़ पकड़े
मौसम मौसम बंजारा

झोंका झोंका ये हवा
रोज़ उड़ाये रे
जाकी डा्ल गयी वो तो बीत गया
जाकी माटी गयी वो का मीत गया
कोई न बुलाये रे
रुत रंग लिये आई भी गई
मुठ्ठियाँ ना खुली बेरंग रही
सूखा पत्ता बंजारा


पेड़ से उतर चुके सूखे पत्तों की मिसाल देकर गुलज़ार साहब रूह से उतर चुकी जिस्म या फिर दो इंसानों के बीच खत्म चुके संबंध की कहानी कहते हैं। एक बार जो जिस्म उतर जाए वह फिर से रूह से जुड़ नहीं पाता, एक बार रिश्ते की जो डोर टूट जाए वह फिर से अपने असल रूप में आ नहीं पाती। पल भर को पत्ते जमीं पर पड़े रहें तो इसका मतलब यह नहीं होता कि उसे जड़ नसीब होने वाला है, क्योंकि अगले हीं पल उसे हवा उड़ाकर कहीं और जा पटकती है। जो एक बार डाल छोड़ दे, वह उस डाल के लिए अतीत हो जाता है, जो एक बार माटी छोड़ दे, वह अपनी ज़िंदगी हीं गंवा बैठता है, फिर चाहे कितने भी मौसम आएँ और जाएँ उस पत्ते के लिए मौसम की मुट्ठी में कोई भी पैगाम, कोई भी खुशखबरी नहीं होती। और इस तरह वह सूखा पत्ता आवारा और बंजारा बनकर रह जाता है। इस लिए यही कोशिश होनी चाहिए कि "वह डोर कभी न टूटे".. आखिर रहीम ने भी तो कहा है:

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय,
टूटे तो फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ि जाय
...

रहींम तो इस बात का यकीन दिलाते हैं कि जुड़ना संभव है, लेकिन गुलज़ार साहब की नज़रों में "एक बार नज़र से गिरे तो फिर नज़र में चढने की कोई संभावना नहीं है।" इस गीत को पढने के बाद ऐसा लगता है कि राहत फ़तेह अली ख़ान साहब हीं इसके साथ सही न्याय कर सकते हैं, लेकिन विशाल ने इस बार एक नए गायक "मास्टर सलीम" में अपना यकीन दिखाया है और यकीनन सलीम साहब इसे निबाहने में खरे उतरते हैं।

अगले दो गाने "ओ मामा" और "दिल दिल है" रॉक शैली के हैं। "ओ मामा" में के के की आवाज़ है तो "दिल दिल है" में "सूरज जगन" की। "के के" लगभग दस साल बाद विशाल के साथ लौटे हैं। "अनुराग कश्यप" की "अनरीलिज़्ड फिल्म" "पाँच" में "के के" के गाए गीत "सर झुका ख़ुदा हूँ मैं" को बहुत सारी प्रशंसा हासिल हुई थी। अगर यह फिल्म रीलिज़ हुई होती तो निस्संदेह यह प्रशंसा सैकड़ों गुणा बढ चुकी होती, लेकिन संगीत की सही समझ रखने वालों को इससे कोई खासा फ़र्क नहीं पड़ता। हम सब "के के" की काबिलियत से अच्छी तरह वाकिफ़ है, इसलिए "ओ मामा" में "म्याऊँ-सी लड़की" सुनकर खुश भी होते हैं और झूम भी पड़ते हैं। जहाँ तक "दिल दिल है" की बात है तो "सूरज जगन" की गायकी "विशाल दादलानी" की तरह सुनाई पड़ती है। सूरज कहीं भी कमजोर नहीं पड़े हैं, लेकिन मेरे हिसाब से विशाल दादलानी होते तो बात हीं कुछ और होती। वैसे यह अच्छी ख़बर है कि विशाल भारद्वाज कुछ गिने-चुने गायकों तक हीं सीमित नहीं है, बल्कि नए-नए गायकों को उनकी आवाज़ और पहुँच के हिसाब से मौका दे रहे हैं। अगर ऐसी बात नहीं होती तो हमें इस फ़िल्म में "सुखविंदर" और "राहत" साहब के गाने सुनने को ज़रूर मिलते।

आपने गौर किया होगा कि हमारी यह समीक्षा "गीतकार" के लिए ज्यादा थी बनिस्पत संगीतकार और गायक-गायिकाओं के। अब क्या करें हम! जहाँ गुलज़ार साहब नज़र आ जाते हैं तो नज़र उनसे हटती हीं नहीं। और वैसे भी हमारी संगीत की समझ बहुत कम है। हम किसी भी गाने में बोल को तरज़ीह देते हैं, क्योंकि हम खुद ठहरे एक "संघर्षरत गीतकार" :)

वैसे एक बात कहना चाहूँगा कि आज के दौर में "विशाल भारद्वाज" एकमात्र ऐसे संगीतकार हैं जो "कविता" की कद्र करते हैं और जानते हैं कि "एक गीतकार" (अमूमन "गुलज़ार साहब") के शब्दों को कितनी अहमियत दी जानी चाहिए, तभी तो इनका हर एक गीत दिल के करीब पहुँच जाता है।

चलिए तो अब आज की बातचीत पर यहीं पूर्णविराम लगाते हैं। अगली मुलाकात अगले हफ़्ते होगी। तब तक "दिल दिल है" गाने से "दिल" की परिभाषा जानने की कोशिश की जाए:

सौ जन्नतों के काबिल है,
यह जाहिलों का जाहिल है..
दिल दर्द की मटकी, दिल जान की आफ़त,
बदमाशियाँ करके, दिखलाए शराफ़त..
जो दिल को चुरा ले, दिल उसकी अमानत,
सब इश्क़ के मुजरिम, एक दिल की जमानत
......

आवाज़ रेटिंग - 9/10

सुनने लायक गीत - डार्लिंग, दूसरी डार्लिंग, बेकरां, तेरे लिए, आवारा, यीशु, ओ मामा




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

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