Wednesday, October 7, 2009

मेघा छाए आधी रात बैरन बन गयी निंदिया....गीतकार नीरज का रचा एक बेहतरीन गीत



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 225

संगीत चाहे कोई भी हो, यह बना है सात स्वरों से। जी हाँ, सा रे गा मा पा धा नि। ये तो केवल अब्रीवियशन्स हैं जिनके पूरे नाम हैं शदज, रिशभ, गंधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निशाद। एक साथ मिलकर इन्हे कहा जाता है सप्तक। सप्तक तीन प्रकार के होते हैं - मंद्र (धीमी ध्वनि), मध्यम (साधारण ध्वनि), और तार (उच्च ध्वनि)। जब हम राग की बात करते हैं तो किसी भी राग के तीन dimensions होते हैं। पहला यह कि सात स्वरों में से कितने स्वरों का इस्तेमाल किया जाना है। जो राग पाँच स्वरों पर आधारित है उसे ओडव राग कहते हैं, छह स्वरों के साथ उसे शडव कहते हैं, और अगर सभी सात स्वर उसमें शामिल हैं तो उसे सम्पूर्ण राग कहते हैं। किसी राग में जिस स्वर पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है उसे वादी कहते हैं और उसके अगले ज़ोरदार स्वर को कहते हैं सम्वादी। जिस स्वर का इस्तेमाल नहीं हो सकता, उसे विवादी कहते हैं। तो दोस्तों, ये तो थीं रागदारी की कुछ मौलिक बातें, आइए अब आपको बताएँ कि आज हम किस राग पर आधारित गीत आपको सुनवाने के लिए लाए हैं। आज का राग है पटदीप। कुछ राग ऐसे हैं जिनका बहुत ज़्यादा इस्तेमाल संगीतकारों ने किया है, और कुछ राग ऐसे रह गए जिनकी तरफ़ फ़िल्मी संगीतकारों ने बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। पटदीप ऐसा ही एक राग है। संगीतकार शंकर जयकिशन और सचिन देव बर्मन उन गिने चुने संगीतकारों में से थे जिन्होने सब से ज़्यादा रागों के साथ खेला है। तभी तो इन दोनों संगीतकारों का रेज़ल्ट हमेशा १००% हुआ करता था। राग पटदीप पर शंकर जयकिशन ने फ़िल्म 'साज़ और आवाज़' के लिए एक गीत की रचना की थी "साज़ हो तुम आवाज़ हूँ मैं", और बर्मन दादा ने फ़िल्म 'शर्मिली' में लता जी से गवाया था "मेघा छाए आधी रात बैरन बन गई निंदिया"। आज इसी दूसरे गीत की बारी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। इन दो गीतों के अलावा अगर आप के ज़हन में कोई और गीत है राग पटदीप पर आधारित तो हमारे साथ ज़रूर बाँटिएगा।

'शर्मिली' १९७१ की फ़िल्म थी शशि कपूर और राखी के अभिनय से सजी हुई। राखी का इस फ़िल्म में डबल रोल था। कंचन और कामिनी दो जुड़वां बहनें हैं, लेकिन स्वभाव में एक दूसरे के विपरीत। जहाँ कंचन बहुत ही शर्मिली, प्रकृति प्रेमी, घरेलु और बड़ी ही सीधी सादी सी, साड़ी पहनने वाली लड़की है, वहीं दूसरी ओर कामिनी पाश्चात्य रंग ढंग वाली एक खुले मिज़ाज की लड़की। दोनों को एक ही पुरुष से प्यार हो जाता है। कई पड़ावों से गुज़रते हुए अंत में कंचन को मिलता है अपना प्यार और कामिनी मर जाती है। कामिनी के अंदाज़ में हमने आपको 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर ही आशा भोसले का गाया "रेश्मी उजाला है मख़मली अंधेरा" सुनवा चुके हैं। आज है कंचन की बारी। जैसा कि हमने बताया कंचन को प्रकृति से लगाव है, वो बाग़ बगीचों में समय बिताती है, तो उनके किरदार को और ज़्यादा सशक्त करते हुए गीतकार नीरज और संगीतकार सचिन देव बर्मन ने राग पटदीप पर एक गाना तैयार किया "मेघा छाए आधी रात बैरन बन गई निंदिया"। गीत का संगीत संयोजन बड़ा ही कमाल का है, गाने का प्रील्युड पाश्चात्य है, फिर धीरे धीरे सितार के तानों और तबले के थापों के साथ साथ शास्त्रीय संगीत में परिणत हो जाता है। और इंटर्ल्युड म्युज़िक में फिर वही पाश्चात्य रंग। फ़्युज़न किसे कहते हैं बर्मन दादा ने सन्'७१ के इस गीत में ही दुनिया को दिखा दिया था, आज इसी फ़्युज़न का हम एक बार फिर से आनंद उठाएँ, सुनते हैं "मेघा छाए आधी रात"।



मेघा छाए आधी रात बैरन बन गई निदिया
बता दे मैं क्या करूं ।

सबके आँगन दिया जले रे मोरे आँगन जिया
हवा लागे शूल जैसी ताना मारे चुनरिया
कैसे कहूँ मैं मन की बात बैरन बन गई निदिया
बता दे मैं क्या करूं ।

टूट गए रे सपने सारे छूट गई रे आशा
नैन बह रे गंगा मोरे फिर भी मन है प्यासा
आई है आँसू की बारात बैरन बन गई निदिया


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. अगला गीत जिस राग पर आधारित है वो है राग सारंग.
२. भारत व्यास ने लिखा इस गीत को इस एतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी मशहूर फिल्म के लिए.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"बरसे".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी बहुत जल्दी आप डबल फिगर यानी १० अंकों पर पहुँच गए हैं, आश्चर्य है इस बार स्वप्न जी ने खाता भी नहीं खोला है अब तक....:) शरद जी को बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, October 6, 2009

ओ दुनिया के रखवाले....रफी साहब के गले से निकली ऐसी सदा जिसे खुदा भी अनसुनी न कर पाए



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 224

सुनहरे दौर में बहुत सारी ऐसी फ़िल्में बनी हैं जिनका हर एक गीत कामयाब रहा है। ५० के दशक की ऐसी ही एक फ़िल्म रही है 'बैजु बावरा'। अब तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हमने आप को इस फ़िल्म के दो गीत सुनवा चुके हैं, "तू गंगा की मौज" और "मोहे भूल गए साँवरिया"। फ़िल्म के सभी गानें राग प्रधान हैं और नौशाद साहब ने शास्त्रीय संगीत की ऐसी छटा बिखेरी है कि ये गानें आज अमर हो गए हैं। नौशाद साहब की काबिलियत तो है ही, साथ ही यह असर है हमारे शास्त्रीय संगीत का। हमने पहले भी यह कहा है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ ऐसी ख़ास बात है कि यह हमारे कानों को ही नहीं बल्कि आत्मा पर भी असर करती है। और शायद यही वजह है कि रागों पर आधारित गानें कालजयी बन जाते हैं। 'बैजु बावरा' के उपर्युक्त गानें क्रम से राग भैरवी और भैरव पर आधारित हैं। इस फ़िल्म के लगभग सभी गीत किसी ना किसी शास्त्रीय राग पर आधारित है। और क्यों ना हो, फ़िल्म की कहानी ही है तानसेन और बैजु बावरा की, जो शास्त्रीय संगीत के दो स्तंभ माने जाते हैं। इसलिए 'दस राग दस रंग' शृंखला में इस फ़िल्म के किसी एक गीत को शामिल करना हमारे लिए अनिवार्य हो जाता है। आज के लिए हम ने इस फ़िल्म के जिस गीत को चुना है वह है रफ़ी साहब का गाया एक भक्ति रचना "ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले"। यह गीत आधारित है राग दरबारी कानडा पर, जिसमें नायक ईश्वर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है और साथ ही उसे कोस भी रहा है। गीतकार शक़ील बदायूनी एक अंतरे में लिखते हैं कि "आग बनी सावन की बरखा फूल बने अंगारे, नागन बन गई रात सुहानी पत्थर बन गए तारे, सब टूट चुके हैं सहारे, जीवन अपना वापस ले ले जीवन देनेवाले, ओ दुनिया के रखवाले"। बाद में 'फूल बने अंगारे' शीर्षक से कम से कम दो फ़िल्में बनी हैं, क्या पता शायद इसी से प्रेरीत हुए हों वे फ़िल्मकार! ख़ैर, 'बैजु बावरा' की तमाम बातें तो आप जान ही गए थे पिछले गीतों में, आइए आज इस राग की बातें करें।

इसमें कोई संदेह नहीं कि दरबारी कानडा एक बहुत ही लोकप्रिय राग रहा है समूचे उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत में। माना जाता है कि संगीत सम्राट तानसेन ने इस राग का आविश्कार किया था, जो शहंशाह अक़बर के शाही दरबार में गायक हुआ करते थे। और इसीलिए इसका नाम पड़ा दरबारी कनाडा। यह रात्री कालीन राग है और इसे विकृत (वक्र) तरीके से गाया जाना चाहिए ताक़ी जौनपुरी, असावरी और अडाणा जैसे समगोष्ठी रागों से भिन्न सुनाई दे। ख़ास कर के अडाणा से इसे अलग रखने के लिए यह ज़रूरी है कि मन्द्र सप्तक और पुर्वांग पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाए। इस राग पर अजस्र फ़िल्मी गीत बने हैं जिनकी एक सूची हम यहाँ आप को दे रहे हैं। इन गीतों के मुखड़ों को आप एक के बाद एक गुनगुनाइए ताक़ी इस राग का मूल स्वरूप आप के ज़हन मे आ जाए। ये हैं वो गीत...

१. आपकी नज़रों ने समझा प्यार के क़ाबिल मुझे
२. अगर मुझसे मोहब्बत है मुझे सब अपने ग़म दे दो
३. ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो
४. भूल जा, जो चला गया उसे भूल जा
५. चांदी की दीवार न तोड़ी प्यार भरा दिल तोड़ दिया
६. दिल जलता है तो जलने दे
७. हम तुझसे मोहब्बत करके सनम
८. हम तुमसे जुदा होके मर जाएँगे रो रो के
९. झनक झनक तोरी बाजे पायलिया
१०. कितना हसीं है मौसम कितना हसीं सफ़र है
११. कोई मतवाला आया मेरे द्वारे
१२. मैं निगाहें तेरे चेहरे से हटाऊँ कैसे
१३. मेरे महबूब न जा आज की रात न जा
१४. मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोए
१५. नैनहीन को राह दिखा प्रभु
१६. रहा गरदिशों में हमदम मेरे इश्क़ का सितारा
१७. सत्यम शिवम सुंदरम
१८. सुहानी चांदनी रातें हमें सोने नहीं देते
१९. तोरा मन दर्पण कहलाए
२०. टूटे हुए ख़्वाबों ने हम को ये सिखाया है

उम्मीद है, इन सब गीतों को गुनगुनाते हुए आप ने राग दरबारी कनाडा से एक रिश्ता बना लिया होगा, और आइए अब सुनते हैं फ़िल्म 'बैजु बावरा' से आज का गीत। बैजु बावरा का ज़िक्र इस शृंखला में आगे भी आएगा, जिसमें हम आपको ऐसी रागों के बारे में बताएँगे जिनका इजाद बैजु बावरा ने किया था। फ़िल्हाल सुनिए आज का गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस फिल्म में उस अभिनेत्री ने दोहरी भूमिका निभाई थी जो एक मशहूर गीतकार की जीवन संगिनी भी बनी आगे चलकर
२. नीरज के लिखा ये गीत आधारित है राग पटदीप की.
३. अंतरे में शब्द है -"गंगा".

पिछली पहेली का परिणाम -

पूर्वी जी बहुत बधाई अब आप मंजिल के बेहद करीब हैं, दिशा जी ने बहुत दिनों में दर्शन दिए पर यदि बोल हिंदी में देते तो अधिक बेहतर होता. दिलीप जी अपनी पोस्ट का भी लिंक दे दिया होता....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रौशन दिल, बेदार नज़र दे या अल्लाह...इसी दुआ के साथ लता दीदी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई



महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५१

पाँच हफ़्तों और दस कड़ियों की माथापच्ची के बाद हम हाज़िर हैं प्रश्न-पहेली के अंकों का हिसाब लेकर। इन प्रश्न-पहेलियों में मुख्यत: ३ लोगों ने हीं भाग लिया(पिछली कड़ी में मंजु जी ने बस एक सवाल का जवाब दिया..इसलिए उन्हें हम मुख्य प्रतिभागियों में नहीं गिनते)। तो ये तीन लोग थे- सीमा जी, शरद जी और शामिख जी। अगर हम ५०वीं कड़ी के अंकों को छोड़ दें तो अंकों का गणित कुछ यूँ बनता था: सीमा जी: २९.५, शरद जी: १८, शामिख जी: १० अंक। तब तक यह ज़ाहिर हो चुका था कि सीमा जी हार नहीं सकतीं और पहली विजेता वहीं हैं। शरद जी और शामिख जी के बीच ८ अंकों का फ़र्क था। और इतनी दूरी को पाटने के लिए कोई चमत्कार की हीं जरूरत थी। ५०वीं कड़ी में हमने जब बोनस प्रश्न और बोनस अंक(५ अंक) जोड़ा तब भी हमें यह ख्याल नहीं था कि इसके सहारे कोई कमाल हो सकता है। लेकिन शामिख जी छुपे रूस्तम साबित हुए। उन्होंने अपना तुरूप का इक्का तभी इस्तेमाल किया जब उसकी जरूरत थी। हर बारे दूसरे या तीसरे स्थान पर आने वाले शामिख साहब इस बार महफ़िल में सबसे पहले हाज़िर हुए। उन्होंने न सिर्फ़ नियमित प्रश्नों के सही जवाब दिये बल्कि बोनस प्रश्न का सही जवाब देकर छक्का मार दिया और एक हीं बार में ९ अंक(४+५) हासिल कर लिए। शाबाश शामिख जी... और इस तरह से आपके कुल १९ अंक हो गए। इस कमाल के बाद एक कमाल यह हुआ कि सीमा जी भले हीं एक दिन देर से हाज़िर हुईं लेकिन शरद जी उनसे भी पीछे आए। शरद जी अगर दूसरे नंबर पर आते तो उन्हें २ अंक मिलते और २० अंकों के साथ जीत उन्हीं की होती। लेकिन तीसरे नंबर पर आने के कारण उन्हें बस १ अंक हीं मिले और उनका कुल जोड़ हुआ १९. तो इस तरह अंततोगत्वा हिसाब ये बनता है: प्रथम: सीमा जी(३१.५..निर्विवाद..निर्विरोध), द्वितीय: शरद जी, शामिख जी(१९ अंक)। संयोग देखिए कि पिछली बार की तरह इस बार भी तीनों के तीनों विजयी हुए। अब बात करते हैं गज़लों की। सीमा जी अपनी पसंद की ५ गज़लें और शरद जी एवं शामिख जी ३-३ गज़लें सुन सकते हैं। आप तीनों से आग्रह है कि शुक्रवार तक इन गज़लों/नज़्मों की फ़ेहरिश्त sajeevsarathie@gmail.com पर भेज दें। ध्यान यह रखें कि गज़लें अलग-अलग फ़नकारों की हों(ताकि ज्यादा से ज्यादा जानकारी हम आपसे शेयर कर पाएँ) और हाँ अगर किसी गज़ल/नज़्म को ढूँढने में हमें मुश्किल आई तो हम आपसे उन गज़लों को बदलने का आग्रह भी कर सकते हैं।

आज हम जो गज़ल लेकर इस महफ़िल में हाज़िर हुए हैं,उसके साथ एक ऐसी फ़नकारा का नाम जुड़ा है, जिन्होंने ३६ भाषाओं(जिनमें रूसी, फ़िजीयन और डच भी शामिल है) में २०००० से भी अधिक गाने गाए हैं और जिनका नाम दुनिया भर में सबसे अधिक रिकार्ड की गई गायिका होने के नाते गिनीज बुक आफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज है। मजे की बात यह है कि आप हीं ऐसी एकमात्र जीवित व्यक्ति हैं जिनके नाम से पुरस्कार दिए जाते हैं। आपके बारे में और भी कुछ कहने से पहले हम आपको गत २८ सितंबर को मनाए गए आपके जन्मदिन की बधाई देना चाहेंगे। ८० साल की हो चलीं लता जी के बारे में अपने मुख से कुछ भी कहना संभव न होगा, इसलिए हमने निर्णय लिया है कि आज की कड़ी में हम आपसे लता जी की हीं कही गई बातें शेयर करेंगे। उससे पहले हम आपको यह बता दें कि लता जी ने पहली बार वसंत जोगलेकर द्वारा निर्देशित एक मराठी फिल्म 'किती हसाल'(कितना हसोगे?)(१९४२) में गाया था। उनके पिता नहीं चाहते थे कि लता फ़िल्मों के लिये गाये इसलिये इस गाने को फ़िल्म से निकाल दिया गया। लेकिन उनकी प्रतिभा से वसंत जोगलेकर काफी प्रभावित हुये। इसके पाँच साल बाद भारत आज़ाद हुआ और लता मंगेशकर ने हिंदी फ़िल्मों में गायन की शुरूआत की, "आपकी सेवा में" पहली फ़िल्म थी जिसे उन्होंने अपने गायन से सजाया लेकिन उनके गाने ने कोई ख़ास चर्चा नहीं हुई। लता जी को पहली सफ़लता कमाल अमरोही की फिल्म "महल" के "आएगा आने वाला" गीत से मिली जिसे उस दौर की शीर्ष की हिरोईन मधुबाला पर फिल्माया गया था। उस घटना को याद करते हुए लता जी कहती हैं: जब महल फ़िल्म का गाना रिकॉर्ड हो रहा था तो खेम चंद्र प्रकाश जी जो मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार करते थे, उन्होंने कहा था कि देखना महल के गाने खूब चलेंगे। फ़िल्म आई और गाने भी खूब बजे, लेकिन खेम चंद्र प्रकाश जी का देहांत हो गया। वो देख ही नहीं पाए कि आएगा आने वाला....इतना चला। उस गाने की शूटिंग तो बहुत ही मज़ेदार रही है। मलाड में बॉम्बे टाकीज़ का बहुत बड़ा स्टूडियो था। स्टूडियो पूरा खाली था। मैंने गाना शुरू किया, लेकिन उनका कहना था कि वो प्रभाव नहीं आ रहा है कि जैसे आवाज़ दूर से आ रही हो। उन्होंने मुझे स्टूडियो के एक कोने में खड़ा करके माइक बीच में रख दिया गया। माइक मुझसे क़रीब 20 फुट दूर रखा था। जो गाने से पहले का शेर था ख़ामोश है जमाना...वो शेर कहते हुए मैं एक-एक कदम आगे बढ़ती थी और गाना शुरू होने तक मैं माइक के पास पहुँच जाती थी। इस गाने पर बहुत मेहनत की मैंने। यकीनन इसी हौसले और इसी मेहनत का फ़ल है कि लता जी ने वह मुकाम हासिल कर लिया,जहाँ पहुँचना आम इंसानों के लिए मुमकिन नहीं है।

लंदन की वृत्तचित्र निर्माता नसरीन मुन्नी कबीर से बातचीत पर आधारित किताब "लता मंगेशकर इन हर ऑन वाइस" में लता जी से जुड़ी कई सारी बातों का खुलासा हुआ है। उनमें से हम दो बातें आपके सामने पेश कर रहे हैं। एक तो यह कि लता जी छद्म नाम से संगीत देती थीं। इस बारे में वे कहती हैं(सौजन्य:बीबीसी): मैं पुरुष छद्म नाम आनंदघन से फिल्मों में संगीत देती थीं। कोई नहीं जानता था कि मैं संगीतकार हूँ, लेकिन जब 'साधी मानस’ ने १९६६ में महाराष्ट्र सरकार के सर्वश्रेष्ठ संगीत समेत आठ पुरस्कार जीते तब समारोह के आयोजकों ने इस बात का खुलासा कर दिया कि आनंदघन कोई और नहीं बल्कि लता मंगेशकर ही हैं। इसके बाद मुझे सार्वजनिक रूप से सामने आकर पुरस्कार लेना पड़ा था। दूसरी घटना दिलीप साहब से जुड़ी है। इस बारे में लता जी का कहना था कि(सौजन्य:खास खबर): यह कोई १९४७ या ४८ की बात है, एक दिन अनिल विश्वास, युसूफ भाई(दिलीप कुमार) और मैं ट्रेन में सफर कर रहे थे। हम एक कंपार्टमेंट में बैठे थे, और युशूफ भाई ने मेरे बारे में पूछा कि ये कौन हूं। अनिल दा ने जवाब दिया यह एक नई गायिका है, जब आप इसे सुनेंगे तो आप भी इसकी आवाज को पसंद करेंगे। जब अनिल दा ने दिलीप साहब को बताया कि लता महाराष्ट्रीयन है, तो उन्होंने कहा कि इसकी उर्दू अच्छी नहीं है, इसका गाया गाना दाल भात जैसा होता होगा। यह सुनकर मैं बहुत दु:खी हुई। मैंने अनिल दा और नौशाद साहब के सहायक शफ़ी मोहम्मद से कहा कि मैं उर्दू का उच्चारण सुधारना चाहती हूँ। उन्होंने मेरी मुलाकात मौलाना महबूब से कराई, जिन्होंने कुछ समय मुझे उर्दू पढाई। बाद में नर्गिस की मां जद्दनबाई ने भी मेरी उर्दू की तारीफ की। मैं इसके लिए दिलीप साहब का शुक्रिया अदा करती हूँ। उन्होंने न टोका होता तो मेरी उर्दू वैसी हीं रहती। सभी जानते हैं कि लता जी और रफ़ी साहब ने तीन साल तक एक-दूसरे के साथ नहीं गाया था। इस बाबत पूछने पर वे कहती हैं(सौजन्य:पुणे/मुंबई मिरर):१९६० में हमारा एक म्युजिसियन्स’ एसोशिएशन था। उसमें मुकेश भैया, तलत महमूद साहब ने फ़नकारों के लिए रोयाल्टी की माँग रखी थी। मैं पहले से हीं रोयाल्टी लेती आ रही थी,इसलिए मैं चाहती थी कि सबको मिले। रफ़ी साहब इसके खिलाफ़ थे। उनका कहना था कि हम जो गाते हैं, उसका पैसा हमें मिल जाता है और बात वहीं खत्म हो जाती है। ऐसे हीं एक मीटिंग में जब उनसे उनकी राय पूछ गई तो उनका कहना था कि "यह महारानी जो कहेगी वही होगा"। मुझे बुरा लगा। मैंने कहा कि "हाँ, मैं महारानी हूँ, लेकिन आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?" इसपर उन्होंने सबके सामने कह दिया कि मैं तुम्हारे साथ अब नहीं गाऊँगा। मैंने कहा कि "ये कष्ट आप क्यों कर रहे हैं? मैं हीं नहीं गाऊँगी आपके साथ।" मैंने वहाँ मौजूद सारे संगीतकारों को भी बता दिया कि अब हमारे लिए कोई साथ में गाना न बनाएँ। उस घटना के बाद लगभग तीन सालॊं तक हमने साथ नहीं गाया। फ़नकारों के साथ ऐसा होता रहता है, वैसे भी फ़नकार तो नाजुक मिजाज के होते हैं। लता जी की फ़नकारी के और भी कई सारे किस्से हमारे पास हैं,लेकिन समय(पढें:जगह) इज़ाज़त नहीं दे रहा। इसलिए अभी आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की गज़ल के शायर "क़तील शिफ़ाई" साहब को हमने एक पूरी की पूरी कड़ी नज़र की थी, इसलिए अभी हम उनके इस शेर से हीं काम चला लेते हैं:

मेरे बाद वफ़ा का धोखा और किसी से मत करना
गाली देगी दुनिया तुझको, सर मेरा झुक जायेगा।


"क़तील" साहब के इस शेर के बाद लीजिए अब पेश है जगजीत सिंह जी के संगीत से सजी यह गज़ल जिसे हमने "सजदा" एलबम से लिया है:

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह

मैनें तुझसे चाँद सितारे कब माँगे
रौशन दिल, बेदार नज़र दे या अल्लाह

सूरज-सी इक चीज़ तो हम सब देख चुके
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह

या धरती के ज़ख़्मों पर मरहम रख दे
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

एक फ़ुर्सते-___ मिली, वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवरदिगार के


आपके विकल्प हैं -
a) गुनाह, b) निगाह, c) पनाह, d) फिराक़

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "मानूस" और शेर कुछ यूं था -

इतना मानूस न हो ख़िलवतेग़म से अपनी
तू कभी खुद को भी देखेगा तो ड़र जायेगा

कहते हैं ना कि "अपने तो अपने होते हैं"। तो शायद इसी कारण से अहमद फ़राज़ साहब के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना "शामिख फ़राज़" ने.. फ़राज़-फ़राज़...समझ गए ना :) । आपने मानूस शब्द पर कुछ शेर भी कहे:

तेरी मानूस निगाहों का ये मोहतात पयाम
दिल के ख़ूं का एक और बहाना ही न हो (साहिर लुध्यान्वी)

इतना मानूस हूँ सन्नाटे से
कोई बोले तो बुरा लगता है (अहमद नदीम कासमी)

गये दिनों का सुराग़ लेकर किधर से आया किधर गया वो
अजीब मानूस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो (नसिर क़ाज़मी)

शामिख जी के बाद महफ़िल में तशरीफ़ लाए सुमित जी। सुमित जी, चलिए कोई बात नहीं...शेर याद आए न आए, महफ़िल में आते रहिएगा....बीच में न जाने कहाँ गायब थे आप।

मंजु जी, जब कोई गज़ल/नज़्म या फिर हमारे आलेख की तारीफ़ करता है तो एक हौसला मिलता है, आगे बढते रहने का। धन्यवाद आपका। आपने "फ़राज़" साहब के शेर को एक अलग हीं रंग दे दिया है। कमाल है:

ये पेड़,फूल,सागर ही तो मेरे मानूस हैं ,
खिलवत ए गम की दवा जो है।

शन्नो जी, आपका शेर और मायूस :).. वैसे बड़ा हीं खुबसूरत है ये शेर:

देर हो चुकी है बहुत ये मानूस दिल
अपनी कलम से हम दुश्मन बना बैठे.

सीमा जी, महफ़िल की शम्मा बुझे, उससे पहले आप आ गईं। देर से आईं,लेकिन शुक्र है कि आप आईं तो सही। ये रही आपकी पेशकश:

इन राहों के पत्थर भी मानूस थे पाँवों से
पर मैंने पुकारा तो कोई भी नहीं बोला (दुष्यंत कुमार)

मानूस कुछ ज़रूर है इस जलतरंग में
एक लहर झूमती है मेरे अंग-अंग में (आलम खुर्शीद)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Monday, October 5, 2009

आवाज़ देकर हमें तुम बुलालो...लता रफी से स्वरों में एक बेमिसाल युगल गीत



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 223

'दस राग दस रंग' शृंखला के अंतर्गत आज हम ने जिस राग को चुना है वह है शिवरंजनी। बहुत ही सुरीला राग है दोस्तों जिसे संध्या और रात्री के बीच गाया जाता है (लेट ईवनिंग)। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है यह राग भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए गाया जाता है। जहाँ एक तरफ़ यह राग रुमानीयत की अभिव्यक्ति कर सकता है, वहीं दूसरी तरफ़ दर्द में डूबे हुए किसी दिल की सदा बन कर भी बाहर आ सकती है। मूल रूप से शिवरंजनी का जन्म दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत में हुआ था, जो बाद में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत मे भी घुल मिल गया। दोस्तों, आप मे से कई लोगों को यह सवाल सताता होगा कि जब एक ही राग पर कई गीत बनते हैं तो फिर वो सब गानें अलग अलग क्यों सुनाई देते हैं? वो एक जैसे क्यों नहीं लगते? दोस्तों, इसका कारण यह है कि किसी एक राग पर कोई गीत तीन सप्तक (ऒक्टेव्ज़) के किसी भी एक सप्तक पर कॊम्पोज़ किया जा सकता है। और यही कारण भी है कि जिन्हे संगीत की तकनीक़ी जानकारी नहीं है, वो सिर्फ़ गीत को सुन कर यह नहीं आसानी से बता पाते कि गीत किस राग पर आधारित है। कुछ गीतों में राग को आसानी से पहचाना जा सकता है और कुछ गीतों में रागों को पहचानने के लिए अच्छे अच्छे जानकारों को भी पसीना बहाना पड़ता है। दूसरी तरफ़ कभी कभी दो गानें जो एक ही राग पर आधारित हैं, वे एक जैसे सुनाई देते हैं, इसके पीछे भी कारण है। जब कोई संगीतकार किसी राग पर आधारित गीत बनाता है तो वो उस राग की बंदिश को भी इस्तेमाल करने की कोशिश करता है। बंदिश ही वह 'कॊमॊन फ़ैक्टर' है जो किसी राग के सभी धुनों में एक जैसा रहता है। और इसी वजह से कभी कभी एक राग पर आधारित दो गीत एक जैसे सुनाई दे जाते हैं।

जैसा कि हमने आपको बताया राग शिवरंजनी रोमांस और दर्द, दोनों के लिए प्रयोग में लाए जा सकते हैं। रोमांस की अगर बात करें तो इस राग पर आधारित कुछ हिट गानें हैं "बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है", "ओ मेरे सनम दो जिस्म मगर एक जान हैं हम", "रिमझिम के गीत सावन गाए", "तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अंजाना", "तुम्हे देखती हूँ तो लगता है ऐसे", "तुम से मिल कर ना जाने क्यों और भी कुछ याद आता है", इत्यादि। है ना इन सभी गीतों की धुनों में एक समानता! और अब एक नज़र उन गीतों पर भी जो हैं दर्द में डूबे हुए। "बनाके क्यों बिगाड़ा रे नसीबा", "दिल के झरोखे मे तुझको बिठाकर", "जाने कहाँ गए वो दिन", "कहीं दीप जले कहीं दिल", "कई सदियों से कई जनमों से", "मेरे नैना सावन भादों फिर भी मेरा मन प्यासा", "ना किसी की आँख का नूर हूँ", आदि। संगीतकार शंकर जयकिशन ने राग शिवरंजनी का विस्तृत सदुपयोग किया है। जितना उन्हे यह राग पसंद था, उतना ही राज कपूर को भी। आज हम ने इस राग पर आधारित जिस दर्द भरे गीत को चुना है वह भी शंकर जयकिशन की ही धुन है फ़िल्म 'प्रोफ़ेसर' से। मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर के गाए इस सदाबहार युगलगीत को लिखा है हसरत जयपुरी साहब ने। "आवाज़ देके हमें तुम बुलाओ, मोहब्बत में ना हमको इतना सताओ"। शम्मी कपूर और कल्पना अभिनीत यह फ़िल्म आयी थी सन् १९६२ में, जिसका निर्देशन किया था लेख टंडन ने। संगीत संयोजन में तबले का असरदार प्रयोग सुनाई देता है और इंटर्ल्युड संगीत में किस साज़ का इस्तेमाल हुआ है, यह आपको बताना है। सैक्सोफ़ोन या मेटल फ़्ल्युट या फिर कुछ और? हमें आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा। तो दोस्तों पहचानिए यह साज़ और नियमीत सुनते रहिए आवाज़!



लता :
आवाज़ दे के हमें तुम बुलाओ
मुहोब्बत में इतना न हमको सताओ
अभी तो मेरी ज़िन्दगी है परेशां
कहीं मर के हो खाक भी न परेशां
दिये की तरह से न हमको जलाओ - मुहोब्ब्त में
रफ़ी :
मैं सांसों के हर तार में छुप रहा हूँ
मैं धडकन के हर राग में बस रहा हूँ
ज़रा दिल की जानिब निगाहे झुकाओ - मुहोब्बत में
लता :
न होंगे अगर हम तो रोते रहोगे
सदा दिल का दामन भिगोते रहोगे
जो तुम पर मिटा हो उसे न मिटाओ - मुहोब्बत में


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. अगला राग है दरबारी कानडा.
२. इस कालजयी गीत को रफी साहब ने अपनी आवाज़ से अमर कर दिया है.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"आग".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी लौट आये हैं, और ये अन्य सभी प्रतिभागियों के खतरे की घंटी है. २ अंकों के साथ शरद जी पहुंचे ८ अंकों पर, दिलीप जी बहुत अच्छा लगा आपका ये इनपुट पाकर. स्वप्न जी कहाँ व्यस्त हैं आजकल...अनिल चड्डा जी नियमित रहिये....आनंद आएगा

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

आ ज़माने आ, आजमाले आ...गायक मोहन की आवाज़ में है सपनों को सच करने का हौंसला



ताजा सुर ताल TST (27)

दोस्तों, आज से ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. आज से TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें १ की जगह तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी आज से अगले २० एपिसोडस तक, जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के ६० गीतों में से पहली १० पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

तो चलिए आज के इस नए एपिसोड की शुरुआत करें, दोस्तों सुजॉय अभी भी छुट्टियों से नहीं लौटे हैं, तो उनकी अनुपस्तिथि में मैं सजीव सारथी एक बार फिर आपका स्वागत करता हूँ. इस वर्ष लगभग ४ महीनों तक सिनेमा घरों के मालिकों और फिल्म निर्माताओं के बीच ठनी रही और ढेरों फिल्मों का प्रदर्शन टल गया. यही वजह है कि आजकल एक के बाद एक फिल्में आती जा रही हैं और रोज ही किसी नयी फिल्म का संगीत भी बाज़ार में आ रहा है. "लन्दन ड्रीम्स" एक ऐसी फिल्म है जिसका सिनेमाप्रेमियों को बेसब्री से इंतज़ार होगा. इसकी एक वजह इस फिल्म का संगीत भी है, शंकर एहसान और लॉय की तिकडी ने बहुत दिनों बाद ऐसा जलवा बिखेरा है. ढेरों नए गायकों को भी इस फिल्म में उन्होंने मौका दिया है. अभिजित घोषाल से तो हम आपको मिलवा ही चुके हैं इस कार्यक्रम में. आज सुनिए एक और नए गायक मोहन और साथियों का गाया एक और जबरदस्त गीत -"खानाबदोश". इस गीत में एक बहुत ख़ास रेट्रो फील है. शुरुआत में चुटकी और कोरस का ऐसा सुन्दर इस्तेमाल बहुत दिनों बाद किसी गीत में सुनने को मिला है, मोहन की आवाज़ में जबरदस्त संभावनाएं हैं, बहुत कोशिशों के बावजूद भी मैं उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं ढूंढ पाया. 'आ ज़माने आ..." से गीत कुछ ऐसे उठता है जिसके बाद आप उसके सम्मोहन में ऐसे बंध जाते हैं कि स्वाभाविक रूप से ही आप गीत को दुबारा सुनना चाहेंगे. मेरी नज़र में तो ये इस साल के श्रेष्ठतम गीतों में से एक है, संगीत संयोजन भी एक दम नापा तुला, और प्रसून के बोल भी कुछ कम नहीं...इससे बेहतर कि मैं कुछ और कहूं आप खुद ही सुनकर देखिये, हो सकता है पहली झलक में आपको इतना न भाए पर धीरे धीरे इसका नशा आप भी भी चढ़ जायेगा ये तय है

खानाबदोश (लन्दन ड्रीम्स)
आवाज़ रेटिंग - ****१/२.



TST ट्रिविया # ०१ - शंकर महादेवन ने शिवमणि और लुईस बैंकस के साथ मिलकर एक संगीत टीम बनायीं थी, क्या आप जानते हैं उस ग्रुप का नाम ?

चलिए आगे बढ़ते हैं. अगला गीत है एक ऑफ बीट फिल्म का. मशहूर साहित्यकार उदय प्रकाश की कहानी पर आधारित "मोहनदास" को शहरों के मल्टीप्लेक्स में काफी सराहना मिली है. संगीतकार हैं विवेक प्रियदर्शन और गीतकार हैं यश मालविय. सीमित प्रचार के बावजूद फिल्म को अच्छे सिनेमा के कद्रदानों ने पसंद किया है, जो कि ख़ुशी की बात है, फिल्म में सभी गीत पार्श्व में हैं....और ये गीत बहुत ही मधुर है, मेलोडी लौटी है विवेक के इस गीत में, शब्द भी अच्छे हैं सुनिए, और आनंद लीजिये -

नदी में ये चंदा (मोहनदास)
आवाज़ रेटिंग - ****



TST ट्रिविया # ०२ - फिल्म मोहनदास के निर्देशक मजहर कामरान ने एक मशहूर निर्देशक की फिल्म के लिए बतौर सिनेमेटोग्राफर भी काम किया है, क्या आप जानते हैं कौन है वो निर्देशक ?

आज का अंतिम गीत हिन्दुस्तान की सबसे महँगी फिल्म का थीम है, अमूमन थीम संगीत में शब्द नहीं होते पर यहाँ बोल भी है और मज़े की बात ये है कि इस थीम के बोल फिल्म के अन्य गीतों के मुकाबले अधिक अच्छे भी हैं. संगीत है ऑस्कर विजेता ऐ आर रहमान का. रहमान साहब की सबसे बड़ी खासियत ये है कि उनका संगीत अपने आप में बहुत होता है एक पूरी कहानी के लिए, उनके वाध्य बोलते हुए से प्रतीत होते हैं, थीम संगीत की अगर बात की जाए तो इसकी परंपरा भी रहमान साहब ने ही डाली थी, फिल्म बॉम्बे का थीम संगीत आज भी रोंगटे खड़े कर देता है, सत्या में विशाल भारद्वाज का थीम संगीत फिल्म के गीतों से भी अधिक लोकप्रिय हुआ था. "ब्लू" का ये थीम संगीत भी जबरदस्त ऊर्जा से भरपूर है. संगीत प्रेमियों के लिए ट्रीट है ये. गायकों कि एक बड़ी फौज है इस थीम में. नेहा कक्कड़ की आवाज़ आपने सुनी होगी इंडियन आइडल में में, दिल्ली की इस गायिका की बड़ी बहन सोनू कक्कड़ भी बेहद मशहूर गायिका हैं दिल्ली की. दोनों बहनों की आवाजें हैं इस गीत में.साथ में हैं रकीब आलम, जसप्रीत, ब्लाज़ और दिलशाद भी. इस मस्त संगीत का आनंद लें -

ब्लू थीम (ब्लू)
आवाज़ रेटिंग -****



TST ट्रिविया # ०३ - ब्लू के इस थीम ट्रैक में बोल किसने लिखे हैं, क्या आप जानते हैं ?

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Sunday, October 4, 2009

छुपालो यूं दिल में प्यार मेरे कि जैसे मंदिर में लौ दिए की...हर सुर पवित्र हर शब्द पाक



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 222

राग यमन एक ऐसा राग है जिसकी उंगली थाम हर संगीत विद्यार्थी शास्त्रीय संगीत सीखने के मैदान में उतरता है। इसके पीछे भी कारण है। राग यमन के असंख्य रूप हैं, कई नज़रिए हैं। यमन के मूल रूप को आधार बना कर बहुत से राग रागिनियाँ बनाई जा सकती है। यह राग मौका देती है संगीतज्ञों को नए नए प्रयोग करने के लिए, संगीत के नए नए आविष्कार करने के लिए। आज भी शास्त्रीय संगीत के गुरु अपने छात्रों को सब से पहले राग यमन पर दक्षता हासिल करने की सलाह दिया करते हैं क्योंकि एक बार यमन सिद्धहस्थ हो जाए तो बाक़ी के राग बड़ी आसानी से रप्त हो जाएँगे। वो कहते हैं ना कि "एक साधे सब साधे", बस वही बात है, एक बार यमन को मुट्ठी में कर लिया तो आप इस सुर संसार पर राज कर सकते हैं। जैसा कि अभी हमने आपको बताया कि राग यमन के बहुत सारे रूप हैं, तो उनमें एक महत्वपूर्ण है राग यमन कल्याण। आज 'दस राग दस रंग' में इसी राग की बारी। इस राग पर फ़िल्मों में असंख्य गीत बने हैं, जिनमें से एक बेहद सुरीला और उत्कृष्ट गीत हम चुन कर लाए हैं। यह गीत फ़िल्म 'ममता' का है, जिसे रोशन के संगीत में और मजरूह साहब के बोलों पर हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर ने गाया है। "छुपा लो युं दिल में प्यार मेरा, के जैसे मंदिर में लौ दीये की"। संगीत जितना मधुर है, उतने ही मीठे हैं इस गीत के शब्द, और वैसा ही न्याय लता जी और हेमन्त दा ने किया है इस गीत के साथ। इस गीत को सुनते हुए जैसे हम किसी और ही दैविय दुनिया में पहुँच जाते हैं, एक पवित्र वातावरण हमारे आसपास पैदा हो जाता है। "ये सच है जीना था पाप तुम बिन, ये पाप मैने किया है अब तक, मगर है मन में छवि तुम्हारी के जैसे मंदिर में लौ दीए की"।

विविध भारती द्वारा रिकार्ड किए हेमन्त कुमार के 'जयमाला' कार्यक्रम में इस गीत को प्रस्तुत करते वक़्त हेमन्त दा ने कहा था - "अब एक गाना संगीतकार रोशन का भी सुन लीजिए। रोशन मेरे बहुत बहुत पुराने दोस्तों में से थे। बम्बई आने के बाद उनसे बहुत मेलजोल बढ़ा। वो मेलडी पर मरता था, पागल पागल सा, मेलडी जहाँ पर होता था वो पागल हो जाता था। फ़िल्म 'ममता' बन रही थी, उसमें मेरा कोई गाना नहीं था। रोशन ने मुझे बुलाया और कहा कि इस फ़िल्म का एक गीत आपको गाना है। राग यमन और भक्ति रस को मिलाकर यह गाना बनाया था उन्होने। मैने जब वह गाना उनसे सुना तो मुझे इतना अच्छा लगा कि मैने उसमें पूरी जान डाल दी। और लता की बात तो छोड़ ही दीजिए, वो तो अच्छा गाएगी ही!" तो दोस्तों, रोशन के इस कालजयी रचना को सुनने से पहले आइए उनके द्वारा बनाए हुए कुछ और ऐसे गीतों पर एक नज़र दौड़ाएँ जिन्हे उन्होने इसी राग को आधार बना कर तैयार किया था। फ़िल्म 'दिल ही तो है' का "निगाहें मिलाने को जी चाहता है", फ़िल्म 'भीगी रात' में "दिल जो ना कह सका वही राज़-ए-दिल कहने की रात आयी", फ़िल्म 'चित्रलेखा' में "मन रे तू काहे ना धीर धरे" और "संसार से भागे फिरते हो", फ़िल्म 'बरसात की रात' में "ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात", इत्यादि। तो आइए सुनते हैं फ़िल्म 'ममता' में राग यमन और भक्ति रस का संगम, जिन पर उतने ही असरदार बोल लिखे हैं शायर और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने। हाँ, आपको यह भी बता दें कि १९६६ की इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार और सुचित्रा सेन। इस फ़िल्म में लता जी के गाए तीन एकल गीत "रहें ना रहें हम", "हम गवन्वा ना ज‍इबे हो" तथा "रहते थे कभी जिनके दिल में" ख़ासा लोकप्रिय हुआ था, लेकिन आज का प्रस्तुत गीत भी उनके मुक़ाबले कुछ कम नहीं। सुनिए...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. अगला गीत है राग शिवरंजनी पर आधारित.
२. संगीतकार हैं शंकर जयकिशन इस युगल गीत के.
३. हसरत के लिखे इस गीत में आपके इस प्रिय जालस्थल के नाम से मुखडा खुलता है.

पिछली पहेली का परिणाम -

पराग जी ३८ अंक लेकर आप पूर्वी जी को टक्कर दे रहे हैं, पर अभी भी फासला है ४ अंकों का, शरद जी और स्वप्न जी आप दोनों भी मैदान में हैं, बेझिझक जवाब दिया कीजिये...इन्द्र नील जी आपकी बात से १०० फीसदी सहमत हैं हम भी...राज भाटिया जी आर के पुरम के किस थियटर में देखी थी आपने फिल्म ये भी तो बताईये...:) दिलीप जी प्रस्तुत शृंखला में आपसे बहुत सी जानकारियों की अपेक्षा रहेगी हम सभी श्रोताओं को....नियमित रहिएगा

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (17)



दोस्तों कुछ चीजें ऐसी होती है जो हमारी जिन्दगी में धीरे-धीरे कब शामिल हो जाती है हमें पता ही नहीं चलता. एक तरह से इन चीजों का न होना हमें बेचैन कर देता है. जैसे सुबह एक प्याली चाय हो पर इन चाय की चुसकियों के साथ अखबार न मिले, फिर देखिए हम कितना असहज महसूस करते है. देखिए ना, आपका और हमारा रिश्ता भी तो रविवार सुबह की काँफी के साथ ऐसा ही बन गया है. अगर रविवार की सुबह हो लेकिन हमें हिन्दयुग्म पर काँफी के साथ गीत-संगीत सुनने को न मिले तो पूरा दिन अधूरा सा रहता है पता ही नहीं लगता कि आज रविवार है. यही नहीं काँफी का जिक्र भर ही हमारे दिल के तार हिन्दयुग्म से जोड़ देता है. इसीलिये हम भी अपने पाठकों और श्रोताओं के प्यार में बँधकर खिंचे चले आते हैं कुछ ना कुछ नया लेकर. आज मै आपके साथ अपनी कुछ यादें बाँटती हूँ. मेरी इन यादों में गीत-संगीत के प्रति मेरा लगाव भी छिपा है और गीतों को गुनगुनाने का एक अनोखा तरीका भी. अक्सर मै और मेरी बहनें रात के खाने के बाद छ्त पर टहलते थे. हम कभी पुराने गीतों की टोकरी उड़ेलते तो कभी एक ही शब्द को पकड़कर उससे शुरु होने वाले गानों की झड़ी लगा देते थे. बहुत दिनों बाद आज फिर मेरा मन वही खेल खेलने का कर रहा है इसलिए मै आपके साथ अपनी जिन्दगी के उन पलों को फिर से जीना चाहती हूँ. तो शुरु करें? चलिए अब तो आपकी इजाजत भी मिल गयी है. क्योंकि मैं आपसे अपनी जिन्दगी के पल बाँट रही हूँ तो "जिन्दगी" से बेहतर कोई और शब्द हो ही नहीं सकता. जिन्दगी के ऊपर फिल्मों में बहुत सारे गाने लिखे गये है. इन सभी गानों में जिन्दगी को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाया गया है. गीतों के जरिए जिन्दगी के इतने रंगों को बिखेरा गया है कि हर किसी को कोई न कोई रंग अपना सा लगता है.

कहीं जिन्दगी प्यार का गीत बन जाती है तो कहीं एक पहेली. किसी के लिये यह एक खेल है, जुआ है तो किसी के लिये एक सुहाना सफर. ऐसे लोगों की भी कमी नही है जो जिन्दगी को एक लतीफे की तरह मानते हैं और कहते है कि सुख-दुख जिन्दगी के ही दो पहलू हैं. देखा आपने, इस एक जिन्दगी के कितने रुप है. हर शायर ने अपने-अपने नजरिये से जिन्दगी को उकेरा है. आइये हम मिलकर जिन्दगी के संगीत को अपनी साँसों में भर लें.

चलिए शुरुआत करते हैं एक कव्वाली से जहाँ आदमी और औरत के नज़रिए से जिदगी पर चर्चा हो रही है, बहुत दुर्लभ है ये गीत. इस गीत में जो विचार रखे गए हैं आदमी और औरत की सोच पर, वो शायद आज के दौर में तो किसी को कबूल नहीं होगी, पर शायद कुछ शाश्वत सत्यों पर आधारित मूल्यों पर इसकी बुनियाद रखी गयी होगी...सुनिए -

आदमी की जिंदगी का औरत नशा है ...


दोस्तों वैसे तो ये जिंदगी बहुत ही खूबसूरत है, और जो मेरी इस बात से इनकार करें उनके लिए बस इतना ही कहूंगी कि यदि इसमें किसी ख़ास शख्स की अगर कमी है तो उस कमी को दूर कर देखिये....फिर आप भी हेमंत दा की तरह यही गीत गुनगुनायेंगें.

जिंदगी कितनी खूबसूरत है ....


कुछ गम जिंदगी से ऐसे जुड़ जाते हैं, कि वो बस जिंदगी के साथ ही जाते हैं, धीरे धीरे हमें इस गम की कुछ ऐसी आदत हो जाती है, कि ये गम न जीनें देता है न मरने...दोस्तों यही तो इस जिंदगी की खासियत है कि ये हर हाल में जीना सिखा ही देती है, किशोर दा ने अपनी सहमी सहमी आवाज़ में कुछ ऐसे ही उदगार व्यक्त किये थे फिल्म "दो और दो पांच" के इस भुला से दिए गए गीत में, बहुत खूबसूरत है, सुनिए -

मेरी जिंदगी ने मुझपर....


कई गीत ऐसे बने हैं जहाँ फिल्म के अलग अलग किरदार एक ही गीत में अपने अपने विचार रखते हैं, संगम का "हर दिल जो प्यार करेगा..." आपको याद होगा, दिल ने फिर याद किया का शीर्षक गीत भी कुछ ऐसा ही था, फिल्म नसीब ने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने अपने संगीत निर्देशन में एक बार फिर वही करिश्मा किया जो अमर अकबर अन्थोनी में रफी लता किशोर और मुकेश को लेकर उन्होंने किया था, बस इस बार गायक कलाकार सभी ज़रा अलग थे. कमलेश अवस्थी, अनवर, और सुमन कल्यानपुर की आवाजों में जिंदगी के इम्तेहान पर एक लम्बी चर्चा है ये गीत, सुनिए -

जिंदगी इम्तेहान लेती है....


और चलते चलते एक ऐसा गीत जिसमें छुपी है जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई, दोस्तों प्यार बिना जिंदगी कुछ भी नहीं, तभी तो कहा गया है, "सौ बरस की जिंदगी से अच्छे हैं प्यार के दो चार दिन.....". तो बस प्यार बाँटिये, और प्यार पाईये, मधुर मधुर गीतों को सुनिए और झूमते जाईये -

सौ बरस की जिंदगी से अच्छे हैं....



प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Saturday, October 3, 2009

पूछो न कैसे मैंने रैन बितायी...फाल्के सम्मान पाने के बाद पहली बार पधारे मन्ना दा ओल्ड इस गोल्ड पर



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 221

ब से पुराने संगीत की अगर हम बात करें तो वो है हमारा शास्त्रीय संगीत, जिसका उल्लेख हमें वेदों में मिलता है। चार वेदों में सामवेद में संगीत का व्यापक वर्णन मिलता है। सामवेद ऋग्वेद से निकला है और उसके जो श्लोक हैं उन्हे सामगान के रूप में गाया जाता था। फिर उससे 'जाती' बनी और फिर आगे चलकर 'राग' बनें। ऐसी मान्यता है कि ये अलग अलग राग हमारे अलग अलग 'चक्र' (उर्जाबिंदू) को प्रभावित करते हैं। ये अलग अलग राग आधार बनें शास्त्रीय संगीत का और युगों युगों से इस देश के सुरसाधक इस परम्परा को निरंतर आगे बढ़ाते चले जा रहे हैं, हमारी संस्कृति को सहेजते हुए बढ़े जा रहे हैं। शास्त्रीय संगीत के असर से हमारे फ़िल्म संगीतकार भी बच नहीं पाए हैं और इतिहास गवाह है कि जब भी संगीतकारों ने राग प्रधान गीतों की रचना की है, वे गानें कालजयी बन गए हैं। और ऐसी ही कुछ कालजयी राग प्रधान फ़िल्मी रचनाओं को संजोकर हम आप के लिए आज से अगले दस दिनों तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में ले आए हैं एक ख़ास शृंखला 'दस राग दस रंग'। जैसा कि शीर्षक से ही प्रतीत हो रहा है कि ये दस गीत दस अलग अलग रागों पर आधारित होंगे। गीतों को सुनवाने के साथ साथ संबंधित रागों के बारे में हम थोड़ी बहुत जानकारी भी देंगे। क्योंकि हमें रागों की विशेषज्ञता हासिल नहीं है, इसलिए हम रागों के तक़नीकी पक्ष में नहीं झाँकेंगे। हाँ लेकिन अगर आप में से कोई शास्त्रीय संगीत और रागों की जानकारी रखते हों तो आप टिप्पणी में उसकी चर्चा ज़रूर कर सकते हैं, हमें बेहद ख़ुशी होगी। तो दोस्तों, आइए शुरु किया जाए यह राग-रंग, आज का राग है अहिरभैरव। यह एक मिश्रित राग है, यानी कि भैरव और अहिरि के मिश्रण से यह बना है। अहिरि (जिसे अभिरि भी कहा जाता है) प्राचीनतम रागों में से है। कुछ संगीतज्ञ अहिरभैरव को भैरव और काफ़ी का मिश्रण भी कहते हैं। कर्नाटक शैली में इस राग को चक्रवाकम कहते हैं। अहिरभैरव एक उत्तरांग राग है और जिसे प्रात: काल में गाया जाता है। इसे सुबह के दूसरे प्रहर, यानी कि ६ बजे से ९ बजे के बीच गाया जाता है। अहिरभैरव पर आधारित फ़िल्मों के लिए बेशुमार गीत बनें हैं, और वो भी एक से एक सुपरहिट। हमने जिस गीत को चुना है वह है मन्ना डे की आवाज़ में फ़िल्म 'मेरी सूरत तेरी आँखें' से - "पूछो ना कैसे मैने रैन बिताई"। शैलेन्द्र के बोल, सचिन देव बर्मन का संगीत।

हाल ही में हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित सम्मान दादा साहब फाल्के से पुरस्कृत न्ना डे एक ऐसे गायक रहे हैं जिन्होने फ़िल्मों में सब से ज़्यादा इस तरह की रचनाएँ गायी हैं। या फिर युं कहिए कि इस तरह की शास्त्रीय रचनाओं के लिए उनसे बेहतर नाम कोई नहीं था उस ज़माने में और ना आज है। यह ज़रूर अफ़सोस की बात रही है कि मन्ना दा को नायकों के लिए बहुत ज़्यादा पार्श्वगायन का मौका नहीं मिला, लेकिन जब भी शास्त्रीय रंग में ढला कोई "मुश्किल" गीत गाने की बारी आती थी तो हर संगीतकार को सब से पहले इन्ही की याद आती थी। शास्त्रीय संगीत पर उनकी मज़बूत पकड़ और उनकी सुर साधना को सभी स्वीकारते हैं और फ़िल्म संगीत जगत में उनका नाम आज भी बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है। जहाँ तक प्रस्तुत गीत के संगीत की बात है तो बर्मन दादा अपने इस गीत को अपनी सर्वोत्तम रचना मानते हैं, और उन्होने यह भी कहा है कि "इसमें एक सुर मेरा अपना है और बाक़ी सारे अहिरि भैरव पर आधारित है"। फ़िल्म 'मेरी सूरत तेरी आँखें' का यह गीत फ़िल्माया गया था दादामुनि अशोक कुमार पर। १९६८ में रिकार्ड किए हुए दादामुनि द्वारा प्रस्तुत विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में उन्होने कहा था कि इस फ़िल्म में उन्होने एक बदसूरत गायक की भूमिका अदा की थी और इस गीत पर अभिनय करते समय उनकी आँखों में सचमुच के आँसू आ गए थे। दोस्तों, यही तो बात है इस मिट्टी के संगीत में, यहाँ के कलाकारों में। लीजिए प्रस्तुत है राग अहिरभैरव पर आधारित बर्मन दादा की सर्वश्रेष्ठ गीत रचना।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. राग यमन कल्याण पर आधारित है ये युगल गीत.
२. रोशन हैं संगीतकार और हेमंत दा का हैं पुरुष स्वर.
३. एक अंतरे की पहली दो पंक्तियों में ये शब्द है -"पाप".

पिछली पहेली का परिणाम -

पूर्वी जी लगातार अच्छा प्रदर्शन करते हुए आप पहुँच गयी हैं ४२ अंकों के स्कोर पर...बधाई...पराग जी क्षमा चाहते हैं जो आपको असुविधा हुई. रोहित जी वाकई ये सब लता जी के दुर्लभतम गीतों में से थे, और हम में से बहुतों से इन्हें कभी नहीं सुना होगा, अजय देशपांडे जी के चुनाव और सुजॉय की मेहनत ने इस प्रयास को सफल बनाया. अभी कल जब मेरी अजय जी से इस बारे में बात हुई तो उन्होंने खुलासा किया कि कल का गीत "अल्लाह भी है मल्लाह भी...." एक ज़माने में बन रही फिल्म अनारकली का क्लाइमेक्स गीत होना था, वो फिल्म कभी नहीं बनी, पर इस गीत को बाद में इस फिल्म "मान" में शामिल कर लिया गया और एक भिखारिन का किरदार निभा रही कलाकार पर इसे फिल्माया गया...हैं न मजेदार बात, शरद कोकास जी और अरविन्द जी ओल्ड इस गोल्ड पर निरंतर आते रहिये और दिलीप जी, मंजू जी जरा समय से आकर जवाब देकर मुकाबले को दिलचस्प बनाईये.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

पंचलाइट - रेणु



सुनो कहानी: फणीश्वर नाथ "रेणु" की "पंचलाइट"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने नितिन व्यास की आवाज़ में हरिशंकर परसाई की कहानी "बोर" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं हिंदी साहित्यकार पद्मश्री फणीश्वर नाथ "रेणु" की प्रसिद्ध आंचलिक कहानी "पंचलाइट", जिसको स्वर दिया है कवि, आयोजक, गायक, व्यंग्यकार एवं रंगकर्मी शरद तैलंग ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 10 मिनट 2 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।





अपने घर की ढिबरी को भी बिजली-बत्ती कहेंगे और दूसरों के पंचलैट को लालटेन।
~ फणीश्वर नाथ "रेणु" (1921-1977)


हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी


गोधन ने एक बार मुनरी की और देखा। मुनरी की पलकें झुक गयीं।
(फणीश्वर नाथ "रेणु" की "पंचलाइट" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3


#Fourtieth Story, Panch-Light: Faneeshwar Nath Renu/Hindi Audio Book/2009/34. Voice: Sharad Tailang

Friday, October 2, 2009

अल्लाह भी है मल्लाह भी....लता के स्वरों में समायी है सारी खुदाई ..साथ में सलाम है अनिल बिश्वास दा को भी



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 220

ता मंगेशकर के गाए कुछ बेहद पुराने, भूले बिसरे, और दुर्लभ नग़मों को सुनते हुए आज हम आ पहुँचे हैं इस ख़ास शृंखला 'मेरी आवाज़ ही पहचान है' की अंतिम कड़ी में। पिछले नौ दिनों आप ने नौ अलग अलग संगीतकारों की धुनों पर लता जी की सुरीली आवाज़ सुनी, आज जिस संगीतकार की रचना हम पेश करने जा रहे हैं वो एक ऐसे संगीतकार हैं जिन्हे फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के संगीतकारों का भीष्म पितामह कहा जाता है। आप हैं अनिल बिस्वास (विश्वास)। एक बार जब उन्हे किसी ने फ़िल्मी संगीतकारों का भीष्म पितामह कह कर संबोधित किया तो उन्होने उसे सुधारते हुए कहा था कि 'R.C. Boral is the father of film music directors, I am only the uncle'| यह सच ज़रूर है कि न्यु थियटर्स के आर. सी. बोराल, तिमिर बरन, पंकज मल्लिक, के. सी. डे जैसे संगीतकारों ने फ़िल्मों में सुगम संगीत की नींव रखी, लेकिन जब सुनहरे युग की बात चलती है तो उसमें अनिल बिस्वास का ही नाम सब से पहले ज़हन में आता है। ख़ैर, इस पर हम फिर कभी बहस करेंगे, आज ज़िक्र लता जी और अनिल दा का। अनिल दा उन संगीतकारों में से हैं जिन्होने लता जी से उनके शुरुआती दिनों में कई गीत गवाए थे। इससे पहले कि हम आज के गीत का ज़िक्र छेड़ें, प्रस्तुत है अनिल बिस्वास के उद्‍गार लता जी के बारे में और उन बीते हुए सुनहरे दिनों के बारे में। यह अमीन सायानी के एक इंटरव्यू का एक अंश है दोस्तों, जिसे बरसों पहले रिकार्ड किया गया था - "किसी से मैने पूछा था 'देखो मैं सुनता हूँ टीवी पर, बहुत ख़ूबसूरत आवाज़ें आ रहीं हैं आजकल, दो तीन आवाज़ें मुझे बहुत पसंद आई, लेकिन क्या वजह है कि लोगों को चान्स नहीं देते हो?' तो उस साहब ने कहा कि 'समय किसके पास है साहब? वो तो लता दीदी आती हैं और रिहर्सल विहर्सल कुछ नहीं करती हैं और गाना वहीं सुन लेती हैं और रिकार्ड हो जाता है, सब कुछ ठीक हो जाता है'। तो रिहर्सल लेने के लिए इन लोगों के पास समय नहीं है। और हमारे साथ तो ऐसी बात हुई कि लता दीदी ने ही, उनके पास भी समय हुआ करता था रिहर्सल देने के लिए और एक गाना शायद आपको याद होगा, जो चार ख़याल मैने पेश किए थे फ़िल्म 'हमदर्द' में, "ऋतू आए ऋतू जाए", १५ दिन बैठके लता दी और मन्ना दादा, १५ दिन बैठके उसका प्रैक्टिस किया था।"

आज जिस गीत के ज़रिए हम लता जी और अनिल दा के सुरीले संगम को याद करने जा रहे हैं वह गीत है १९५४ की फ़िल्म 'मान' का। अजीत, चित्रा, जागिरदार और कमलेश कुमारी अभिनीत यह फ़िल्म कामयाब नहीं रही और इसके गीतों को भी लोगों ने समय के साथ साथ भुला दिए। इस फ़िल्म में लता जी का गाया एक बहुत ही सुंदर भक्ति रचना है "अल्लाह भी है मल्लाह भी है, कश्ती है कि डूबी जाती है", जिसे गीतकार कैफ़ भोपाली ने लिखा था। कैफ़ भोपाली का नाम याद आते ही याद आते हैं फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' के दो गीत "तीर-ए-नज़र देखेंगे" और "चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो"। कैफ़ साहब बहुत ज़्यादा गीत फ़िल्मों में नहीं लिखे, लेकिन जितने भी लिखे उनमें अपने स्तर को कभी गिरने नहीं दिया। 'दाएरा', 'डाकू', 'शंकर हुसैन', 'मान' और 'पाक़ीज़ा' जैसी फ़िल्मों में उन्होने गीत लिखे हैं। फ़िल्म 'मान' के प्रस्तुत गीत में अल्लाह और मल्लाह का बहुत ही सुंदर इस्तेमाल करते हुए कैफ़ साहब नायिका की ज़ुबाँ से ये कहने की कोशिश कर रहे हैं कि लाख कोशिशें करने के बावजूद (जिस तरह मल्लाह अपनी नाव को डूबने से बचाने का हर संभव प्रयास करता है) और लाख ईश्वर पर भरोसा होने के बावजूद भी दिल की नैय्या डूबती जा रही है। "इक शमा घिरी है आंधी में, बुझती भी नहीं जलती भी नहीं, शमशीर-ए-मोहब्बत क्या कहिए, रुकती भी नहीं चलती भी नहीं, मजबूर मोहब्बत रह रह कर हर साँस ठोकर खाती है"। तो दोस्तों, यह गीत सुनिए और इसी के साथ लता जी पर केन्द्रित इस विशेष शृंखला 'मेरी आवाज़ ही पहचान है' का यहीं पर समापन होता है, हालाँकि लता जी के गाए सदाबहार गीत 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर युंही जारी रहेंगे, लेकिन उनके गाए भूले बिसरे १० गीतों की यह माला आज यहाँ पूरी हो रही है। और इस गीतमाला को रचने में नागपुर निवासी अजय देशपाण्डे जी का बहुत ही सराहनीय योगदान रहा, जिन्होने लता जी के गाए इन १० गीतों को चुनकर हमें भेजा। उनके सहयोग के बिना इन गीतों को आप तक पहुँचाना हमारे लिए संभव नहीं होता। तो एक बार फिर से अजय जी को धन्यवाद देते हुए आज के लिए हम विदा लेते हैं, फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया तो!



अल्लाह भी है मल्लाह भी है
अल्लाह भी है मल्लाह भी है
कश्ती है कि डूबी जाती है
अल्लाह भी है मल्लाह भी है

हम डूब तो जाएंगे लेकिन
दोनों ही पे तोहमत आती है
अल्लाह भी है मल्लाह भी है

इक शमा घिरी है आंधी में
बुझती भी नही जलती भी नही
शमशीर -ए -मोहब्बत क्या कहिये
रुकती भी नही चलती भी नही
मजबूर मोहब्बत रह रह कर
हर सांस ठोकर खाती है
अल्लाह भी है मल्लाह भी है

एक ख्वाब नज़र सा आया था
कुछ देख लिया कुछ टूट गया
एक तीर जिगर पर खाया था
कुछ डूब गया कुछ टूट गया
कुछ डूब गया कुछ टूट गया
क्या मौत की आमद आमद है
क्या मौत की आमद आमद है
क्यूँ नींद सी आयी जाती है
अल्लाह भी है मल्लाह भी है

और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस महागायक ने जीता है इस वर्ष का दादा साहब फाल्के सम्मान जिसकी आवाज़ में है कल का गीत.
२. दस राग पर आधारित दस शानदार गीत होंगें अगले १० एपिसोड्स में, कल का राग है -अहिरभैरव.
३. एक अंतरे की अंतिम पंक्ति में शब्द है -"उमर".

पिछली पहेली का परिणाम -

पूर्वी जी ४० अंकों तक पहुँचने की जबरदस्त बधाई, बस अब आप १० अंक पीछे हैं, लता वाली सीरीस और बोनस अंकों का सही फायदा आपने ही उठाया.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

ये खेल होगा नहीं दुबारा...बड़ी हीं मासूमियत से समझा रहे हैं "निदा" और "जगजीत सिंह"



महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५०

हफ़िल-ए-गज़ल की जब हमने शुरूआत की थी, तब हमने सोचा भी नहीं था कि गज़लों का यह सफ़र ५०वीं कड़ी तक पहुँचेगा। लेकिन देखिए, देखते हीं देखते वह मुकाम भी हमने हासिल कर लिया। यह आप सबके प्यार और हौसला-आफ़ज़ाई के कारण हीं मुमकिन हो पाया है, नहीं तो हर बार कुछ नया लाना इतना आसान नहीं होता। उम्मीद है कि हम आपकी उम्मीदों पर खड़े उतर रहे हैं। हर बार आपके लिए कुछ नया लाने में हमारा भी बड़ा फ़ायदा है। न जाने ऐसे कितने नगीने हैं जो मिट्टी-तले दबे रहते हैं और उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए हम हर बार आपके सामने आते रहते हैं। आपने जिस तरह हमारा आज तक साथ दिया है, बस यही इल्तज़ा है कि आगे भी साथ बने रहिएगा। इसी दुआ के साथ पिछली कड़ी के अंकों का खुलासा करते हैं। तो हिसाब कुछ यूँ बनता है: सीमा जी: ४ अंक, शामिख जी: २ अंक और शरद जी: १ अंक। अब बारी है आज के प्रश्नों की| ये रहे प्रतियोगिता के नियम और उसके आगे दो प्रश्न: हम आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब आज के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। इन सवालों का सबसे पहले सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। पिछली नौ कड़ियों और आज की कड़ी को मिलाकर जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, वहीं दूसरे स्थान पर आने वाला पाठक अपनी पसंद की ३ गज़लों को सुनने का हक़दार होगा। इस तरह चुनी गई आठ गज़लों को हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच पेश करेंगे। और साथ हीं एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) गानों में सरगम तकनीक का इस्तेमाल करने वाले एक फ़नकार जिसे टाईम मैगजीन ने २००६ में "एशियन हीरोज़" की फ़ेहरिश्त में शुमार किया था। उस फ़नकार के नाम के साथ यह भी बताएँ कि हमने उनकी जो गज़ल सुनाई थी उसे वास्तव में किस रिकार्ड लेबल के लिए रिकार्ड किया गया था?
२) उस फ़नकारा का नाम बताएँ जो हिंदी के प्रख्यात समीक्षक की पौत्री और एक क्रिकेट कमेंटेटर की पुत्री हैं और जिनका संगीत की सभी विधिओं पर एकसमान अधिकार है। साथ हीं यह भी बताएँ कि हमने उस कड़ी में जिस समारोह की बातें की थी उस समारोह की शुरूआत का श्रेय किसे दिया जाता है?

महफ़िल-ए-गज़ल की स्वर्ण जयंती पर पेश है यह बोनस प्रश्न जिसका उत्तर देकर आप एक बार में ५ अंकों की बढोतरी ले सकते हैं। ध्यान रखिएगा कि जो भी इस प्रश्न का सबसे पहले सही उत्तर देगा बस उसी को ये अंक मिलेंगे यानि कि अंक बंटेंगे नहीं।

३) ४०-५० के दशक की जानीमानी संगीतकार-जोड़ी जिनके बड़े भाई की संगीतबद्ध एक गज़ल हमने आपको सुनवाई थी। उस कड़ी में हमने उस फ़नकार की भी बातें की थी जो महज़ १४ साल की उम्र में ५ जून १९४२ को सुपूर्द-ए-खाक हो गया। उन सबका नाम बताएँ जिनका ज़िक्र इस प्रश्न में आया है।


तुम्हारी कब्र पर मैं
फ़ातेहा पढ़ने नही आया,

मुझे मालूम था, तुम मर नही सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था।

मेरी आँखे
तुम्हारी मंज़रो मे कैद है अब तक
मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ
वो, वही है
जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी।

कहीं कुछ भी नहीं बदला,
तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं,
मैं लिखने के लिये जब भी कागज कलम उठाता हूं,
तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं|

बदन में मेरे जितना भी लहू है,
वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है,
मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जेहन रहता है,
मेरी बीमारियों में तुम मेरी लाचारियों में तुम|

तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है,
वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है,
तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें जिन्दा हो,
कभी फुरसत मिले तो फातहा पढनें चले आना|

आज हम जिस शायर की नज़्म सुनने और सुनाने जा रहे हैं, ये पंक्तियाँ उन्होंने हीं लिखी थी और वो भी अपने अब्बा की मौत पर। किसी कारणवश वे अपने अब्बा की मैय्यत में शरीक़ नहीं हो पाए थे। अब्बा उनके दिल के कितने करीब थे, यह तो नहीं पता, लेकिन इतना पता है कि जो किसी अपने की मौत में अपनी मौत को देख लेता है, उससे फिर कोई भी भावना अछूती नहीं रह जाती। वह शायर वह सबकुछ लिख सकता है, जिसे लिखने में बाकी लोग कतराते हैं। वही शायर जब बच्चों की मार्फ़त यह कहता है तो बवाल खड़े हो जाते हैं:

बच्चा बोला देख के मस्जिद आलीशान
मालिक तेरे एक को इतना बड़ा मकान।

वह शायर,जिसे लोग "निदा फ़ाज़ली" कहते हैं और जिसका असल नाम "मुक़तदा हसन" है, हिन्दुस्तानियों के लिए "बर्तोल्त ब्रेख्त" हो जाता है। जानकारी के लिए बता दें कि ब्रेख्त हिटलर के समकालीन थे। हिटलर ने जब बहुत से तत्कालीन लेखकों की किताबों को अपने खिलाफ पाकर बैन किया तो पता नहीं कैसे ब्रेख्त की किताब छूट गई। ब्रेख्त ने हिटलर को खत लिखा और कहा कि मैं भी आपके बहुत खिलाफ हूँ, मेरी भी किताबें आप बैन कीजिए, वरना इतिहास यही समझेगा कि मैं या तो आपके पक्ष में था या इतना महत्वपूर्ण नहीं था कि आप मेरी किताबें बैन करें। अपने विचारों, अपनी नज्मों के कारण निदा ने भी बहुत दिन तक बाल ठाकरे का अघोषित प्रतिबंध झेला है। ब्रेख्त की तरह निदा भी अपने मन के शायर हैं, गजलें उन्होंने कही जरूर हैं, पर जिन विषयों पर वो शायरी करते हैं, वो विषय गजल का नहीं है। (सौजन्य: वेबदुनिया) निदा साहब से जब यह पूछा गया कि उनकी शायरी की शुरूआत कैसे हुई तो उनका जवाब कुछ यूँ था: मेरे वालिद अपने ज़माने के अच्छे शायर थे। नाम था 'दुआ डबाइवी'। उनके अशआर मुझे ज़ुबानी याद थे। यही अशआर सुना-सुनाकर मैं क़ॉलेज में अपने दोस्तों से चाय पिया करता था। कभी-कभी तो नाश्ते का इंतिज़ाम भी हो जाया करता था। उनके अशआर सुनाते-सुनाते ख़ुद भी शे'र कहने लगा।

निदा साहब यूँ तो क्रांतिकारी विचारों के शायर थे और हैं भी लेकिन आज हम उनसे वह किस्सा सुनना चाहेंगे जिसके कारण उनका फिल्मों में आना हुआ। आप सब सुजाय जी को तो ज़रूर हीं जानते होंगे(आवाज़ पर प्रसारित होने वाले "ओल्ड इज गोल्ड" के मेजबान)। उन्हीं की बदौलत हमें रेडियो पर आने वाले "आज के मेहमान" कार्यक्रम की वह रिकार्डिंग हासिल हुई है, जिसमें निदा साहब मौजूद थे। उस मज़ेदार घटना को याद करते हुए वे कहते हैं: जब मैं मुंबई आया तो मैने धर्मवीर भारती के "धर्मयुग" में लिखना शुरू कर दिया, उसके बाद मै "ब्लिट्ज़" में लिखने लगा। उसी दौरान कभी "धर्मयुग" में तो कभी "ब्लिट्ज़" में तो कभी किसी रेडियो स्टेशन में मुझे मैसेज़ मिलने लगे कि "मैं आप से मिलना चाहता हूँ- कमाल अमरोही"। मैंने सोचा कि मेरा कमाल अमरोही से क्या काम हो सकता है। मैं कमाल अमरोही से मिलने चला गया। कमाल साहब मिले करीब २ बजे, वो स्टाईलिश आदमी थे, वो एक लफ़्ज़ भी अंग्रेजी का बोलते नहीं थे और वो भाषा बोलते थे जो आज से ५० साल पहले अमरोहा में बोली जाती थी। मैं वो भाषा बंबई आकर भूल गया था। मैंने कहा "कमाल साहब, आदाब अर्ज़ है, मेरा नाम निदा फ़ाज़ली है"। तो वो बोले- "तशरीफ़ रखिए, मैंने आपको इसलिए याद फ़रमाया है"- ये उनका स्टाईल था, "मैंने आपको इसलिए याद फ़रमाया है कि मुझे एक मुक़म्मल शायर की ज़रूरत है", मैंने कहा कि मैं हाज़िर हूँ और इस इज़्ज़त आफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया कि आप मुझे मुक़म्मल शायर समझ रहे हैं। बोले- "जी, मुझे आपसे कुछ नगमात तहरीर करवाने हैं"। मैने कहा कि मैं हाज़िर हूँ साहब, आप बताईये कि कैसा गाना है, क्या लिखना है, तो वो बोले कि "इससे पहले कि आप गाना लिखें, एक बात मैं ज़ाहिर कर देना चाहता हूँ कि इल्मी शायरी और फिल्मी शायर अलग होती है। इल्मी शायरी लिखने के लिए आपको मेरे मिज़ाज़ की शिनाख्त बहुत ज़रूरी है, जाँ निसार अख्तर मेरे मिज़ाज को पहचान गए थे, लेकिन वो अल्लाह को प्यार हो गए। इतना कहने के बाद उन्होंने सिचुएशन सुनाई- "हमारी दास्तान उस मुकाम पर आ गई जहाँ मल्लिका-ए-आलिया रज़िया सुल्तान, यानि हमारी हेमा मालिनी, सियाहा लिबास में खरामा-खरामा चली आ रही है, जिसे देखकर हमारा आलया कासी खैरमक़दम के लिए आगे बढता है।" मेरे कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा, मैं कुछ देर बैठा रहा, फिर उनके असिस्टेंट ने कहा कि इसका मतलब है कि हेमा मालिनी सफ़ेद घोड़े पर काले लिबास पहने आ रही हैं और आलया कासी मतलब कैमरा उनकी तरफ़ बढ रहा है। इसके बाद मैंने उस फिल्म के आखिरी दो गाने लिखे। लेकिन उस फिल्म के बनने में इतना वक्त लगा कि कमाल साहब के गुडविल ने फिल्म-इंडस्ट्री में मुझे मशहूर कर दिया कि कोई ऐसा है जिससे कमाल अमरोही गाने लिखवा रहे हैं।

निदा साहब के बारे में और भी बहुत कुछ है कहने को, लेकिन आज बस इतना हीं। वैसे हीं स्वर्ण जयंती के कारण आज हमारी मुलाकात का दौर कुछ ज्यादा हीं चला। इसलिए वक्त है अब आज की नज़्म सुनवाने का। यह नज़्म मेरी पसंदीदा नज़्मों में से एक है। जहाँ एक तरह निदा साहब के मासूम अल्फ़ाज़ हैं तो वही दूसरी तरह जगजीत सिंह जी की मखमली आवाज़। आप खुद देखिए:

ये ज़िन्दगी,
आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी-बड़ी नसों में
मचल रही है
तुम्हारे पैरों से चल रही है
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है।

ये ज़िन्दगी
जाने कितनी सदियों से
यूँ ही शक्लें
बदल रही है।

बदलती शक्लों
बदलते जिस्मों में
चलता-फिरता ये इक शरारा
जो इस घड़ी
नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा।

सितारे तोड़ो या घर बसाओ
क़लम उठाओ या सर झुकाओ,
तुम्हारी आँखों की रोशनी तक
है खेल सारा,
ये खेल होगा नहीं दुबारा।

ये खेल होगा नहीं दुबारा॥




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

इतना ___ न हो ख़िलवतेग़म से अपनी
तू कभी खुद को भी देखेगा तो ड़र जायेगा


आपके विकल्प हैं -
a) मायूस, b) मानूस, c) हैरान, d) बेज़ार

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "ख़ुदकुशी" और शेर कुछ यूं था -

ख़ुदकुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन यूँ ही औरों को सताया जाये

एक बार फिर से महफ़िल में पहली हाज़िरी लगी सीमा जी की। कमाल देखिए कि पिछली महफ़िल का शेर निदा फ़ाज़ली साहब का था और आज की महफ़िल हमने पूरी की पूरी उन्हीं के सुपूर्द कर दी। निदा साहब का यह शेर जिस गज़ल से है, उसमें एक ऐसा शेर भी है जो बच्चे-बच्चे की जुबान पर मौजूद रहता है और हो भी क्यों न, जबकि उसमें बच्चे का हीं ज़िक्र किया गया है। इस शेर को सुनकर और पढकर "तमन्ना" फिल्म का वह गाना याद आ जाता है जिसकी शुरूआत इसी शेर के साथ होती है। आप भी देखिए:

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये।

पूरी गज़ल मुहैय्या कराने के लिए सीमा जी का शुक्रिया। "ख़ुदकुशी" शब्द पर आपने कुछ शेर भी कहे:

मेरी गुड़िया-सी बहन को ख़ुदकुशी करनी पड़ी
क्या ख़बर थी दोस्त मेरा इस क़दर गिर जाएगा। (मुनव्वर राना)

ग़म-ए-हयात से बेशक़ है ख़ुदकुशी आसाँ
मगर जो मौत भी शर्मा गई तो क्या होगा। (अहसान बिन 'दानिश')

मेरा मकान शायद है ज़लज़लों का दफ़्तर
दीवारें मुतमइन हैं हर वक़्त ख़ुदकुशी को। (ज्ञान प्रकाश विवेक)

मंजु जी, आपकी बात सही है,लेकिन मुझे "चिन्नी" का अर्थ समझ नहीं आ रहा था,इसलिए मुझे अपना दिमाग लगाना पड़ा। आईंदा ऐसा नहीं होगा....ये खेल होगा नहीं दुबारा :) । ये रहा आपका आज का शेर:

ए मेरे रुस्तम! कैसे बयाँ करूं हाल दिल
खुदकुशी करने को जी चाहता है।

शामिख जी ने कई शेरों के बीच गुलज़ार साहब की एक त्रिवेणी भी पेश की। बानगी देखिए:

कैसे लोग हैं क्या खूब मुन्सुफी की है,
हमारे क़त्ल को कहते हैं खुदखुशी की है. (प्रकाश अर्श)

कितने तारो ने यहाँ टूटकर ख़ुदकाशी की है
कब से बोझ से हाँफ़ रहा था बेचारा।

चलो आसमान को कुछ मुक्ति तो मिली (गुलज़ार)

निर्मला जी, महफ़िल में आपका स्वागत है। आप अगर कोई शेर भी साथ ले आएँ तो महफ़िल में चार चाँद लग जाए।
शरद जी, कोई बात नहीं, देर आए दुरूस्त आए...पर आए तो सही :)। आपका स्वरचित शेर कमाल का है:

दर्द के साथ दोस्ती कर ली
इसलिए मैने खुदकुशी कर ली
ज़िन्दगी को सवांरने के लिए
हमने बरबाद ज़िन्दगी कर ली।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, October 1, 2009

दर्द-ए-उल्फ़त छुपाऊँ कहाँ....लता ने किया एक मासूम सवाल शंकर जयकिशन के संगीत में



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 219

गीतकार शैलेन्द्र, संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन और गायिका लता मंगेशकर की जब एक साथ बात चलती है तो इतने सारे मशहूर, हिट और शानदार गीत एक के बाद एक ज़हन में आते जाते हैं कि जिनका कोई अंत नहीं। चाहे राज कपूर की फ़िल्मों के गानें हों या किसी और फ़िल्मकार के, इस टीम ने 'बरसात' से जो सुरीली बरसात शुरु की थी उसकी मोतियों जैसी बूँदें हमें आज तक भीगो रही है। लेकिन ऐसे बेशुमार हिट गीतों के बीच बहुत से ऐसे गीत भी समय समय पर बने हैं जो उतनी ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुए और इन हिट गीतों की चमक धमक में इनकी मंद ज्योति कहीं गुम हो गई, खो गई, लोगों ने भुला दिया, समय ने उन पर पर्दा डाल दिया। ऐसा ही एक गीत आज के अंक में सुनिए। फ़िल्म 'औरत' का यह गीत है "दर्द-ए-उल्फ़त छुपाऊँ कहाँ, दिल की दुनिया बसाऊँ कहाँ"। बड़ा ही ख़ुशरंग और ख़ुशमिज़ाज गीत है यह जिसमें है पहले पहले प्यार की बचैनी और मीठे मीठे दर्द का ज़िक्र है। मज़ेदार बात यह है कि बिल्कुल इसी तरह का गीत शंकर जयकिशन ने अपनी पहली ही फ़िल्म 'बरसात' में लता जी से गवाया था। याद है न आपको हसरत साहब का लिखा "मुझे किसी से प्यार हो गया"? बस, बिल्कुल उसी अंदाज़ का गीत है, फ़र्क बस इतना कि इस बार शैलेन्द्र साहब है यहाँ गीतकार. एक और मज़ेदार बात यह कि इसी फ़िल्म 'औरत' में हसरत जयपुरी साहब ने भी लता जी से पहले प्यार पर आधारित एक गीत गवाया था "नैनों से नैन हुए चार आज मेरा दिल आ गया, अरमान पे छायी है बहार आज मेरा दिल आ गया"। इसी साल १९५३ में फ़िल्म 'आस' में एक बार फिर शैलेन्द्र और शंकर जयकिशन ने लता जी से गवाया "मैं हूँ तेरे सपनों की रानी तूने मुझे पहचाना ना, हरदम तेरे दिल में रही मैं फिर भी रहा तू अंजाना"। फ़िल्म 'औरत' बनी थी सन् १९५३ में 'वर्मा फ़िल्म्स' के बैनर तले। बी. वर्मा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे बीना राय और प्रेमनाथ। लता जी के गाए कुछ गीतों का ज़िक्र हमने अभी किया, लेकिन एक और ज़रूरी बात यह भी कि फ़िल्म 'औरत' का शीर्षक गीत लता जी से नहीं बल्कि आशा जी से गवाया गया था, जिसके बोल थे "लोग औरत को फोकट जिस्म समझते हैं"। महबूब ख़ान ने 'औरत' शीर्षक से सन् १९४० में एक फ़िल्म बनाई और उसी का रीमेक बनाया 'मदर इंडिया' के नाम से जिसे हिंदी सिनेमा का एक मील का पत्थर माना जाता है।

दोस्तों, लता जी और ख़ास कर जयकिशन जी की आपस में अच्छी दोस्ती थी, और दोनों एक दूसरे से ख़ूब झगड़ते भी थे, नोक झोक चलती ही रहती थी। उन्ही दिनों को और जयकिशन जी को याद करते हुए लता जी ने अमीन सायानी साहब के उस इंटरव्यू में क्या कहा था, आइए आज के इस अंक में उसी पर नज़र डालते हैं। "जयकिशन और मैं, हम दोनो हम-उम्र थे। बस ६ महीनों का फ़र्क था हम दोनों में। 'बरसात' और 'नगिना' जैसी फ़िल्मों के बाद हम लोगों का एक बड़ा मज़ेदार ग्रूप बन गया था। हम लोग यानी शंकर साहब, शैलेन्द्र जी, हसरत साहब, मुकेश भ‍इया। हम सब एक साथ काम भी करते, घूमने भी जाते, तर्ज़ें भी डिस्कस करते, और कभी कभी बहुत झगड़े भी होते थे। बस छोटी छोटी बातों पर, ख़ास तौर पर जयकिशन के साथ। कभी मैं उनकी धुन की बुराई करती तो कभी वो मेरी आवाज़ पर कोई जुमला कर देते। और इस तरह जब ठनती तो दिनों तक ठनी रहती। मुझे याद है, मैने एक बार झुंझलाकर उससे कह दिया कि जाओ, अब मैं तुम्हारे लिए नहीं गाती, किसी और से गवा लेना, यह कह कर मैं चल दी अपने घर। घर पहुँचकर मैं भी पछताई और वो भी पछताए। लेकिन दोनों ही अड़े रहे। फिर शैलेन्द्र और शंकर भाई उन्हे पकड़कर मेरे घर ले आए। और बस फिर दोस्ती वैसी की वैसी।" तो दोस्तों, आइए सुनते हैं आज का यह गीत और एक बार फिर से शुक्रिया अदा करते हैं अजय देशपाण्डे जी का जिनके सहयोग से लता जी के गाए ये तमाम दुर्लभ नग़में हमें प्राप्त हुए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. अनिल बिस्वास के लिए गाया लता ने ये दुर्लभ गीत.
२. कैफ भोपाली के लिखे इस गीत को बूझ कर ३ अंक पाने के है आज आखिरी मौका.
३. मुखड़े में शब्द है -"कश्ती".

पिछली पहेली का परिणाम -

पूर्वी जी बधाई हो..३ अंक और आपके खाते में हैं.....आपका स्कोर है ३७, अब आप सबसे आगे हैं अंकों के मामले में ...बधाई...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

मेक ए विश...कह रहे हैं अमिताभ...इस दिवाली मांग ही डालिए कुछ अपने जिन्नी से



ताजा सुर ताल (26)

दोस्तों आज ताजा सुर ताल में मैं सजीव सारथी अकेला ही हूँ आपके स्वागत के लिए क्योंकि आपके प्रिय होस्ट सुजॉय दुर्गा पूजा की खुशियाँ अपने परिवार के साथ बांटने घर गए हुए है....खैर आज मैं जो गीत आपको सुनवाने जा रहा हूँ, वो एक "रैप" सोंग है, रैप यानी एक सधे हुए पेटर्न पर गीत की पंक्तियों को तेजी से बोलना, बरसों पहले अशोक कुमार ने फिल्म आशीर्वाद के लिए "रेलगाडी" गीत गाया था कुछ इसी अंदाज़ में, याद है न ?, पता नहीं उस ज़माने में इसे रैप ही कहते थे या कुछ और....पाश्चात्य संगीत की इस मशहूर संगीत परंपरा को हिन्दुस्तान में बाबा सहगल ने अपने "ठंडा ठंडा पानी" से लोकप्रिय बनाया..बाद में रहमान ने भी कुछ गीतों में रैप का इस्तेमाल किया....आजकल तो ये लगभग हर गीत का हिस्सा बन चूका है. आज कल लगभग हर दूसरे गीत हिप होप बनाने के लिए उसमें कुछ अंग्रेजी शब्दों का मायाजाल बुनकर उसे रैप शैली में गवा दिया जाता है. खैर हमने जो आज का गीत चुना है वो कोई मामूली रैप नहीं है..पूछिए क्यों ...

जी हाँ, ये रैप कोई इंसान नहीं बल्कि एक जिन्नी का है, "जिन्नी" ? अरे आप जिन्नी को भूल गए ? याद कीजिये बचपन में जब सुनते थे की अलादीन को जादूई चिराग मिला और उसमें से निकल एक जिन्न जो कहता है "क्या हुकम है मेरे आका"...सच बताइयेगा, क्या उस कहानी को सुनकर कभी आपने मन में नहीं आया कि काश हमें भी कोई जिन्नी मिलता... सच तो ये है कि हम सब पूरी जिंदगी असंभव से ख्वाब देखते है और सोचते हैं कि काश....और इस कोशिश कोशिश में एक दिन हम खुद ही एक जिन्नी बन जाते हैं, जो कभी अपने बच्चों की मुराद पूरी करता है कभी घर परिवार की.... हम सब में छुपा जिन्न हमारे अपनों को खुश देखने के लिए पूछता ही रहता है -."मेक ऐ विश...."

अलादीन और उसके जिन्नी की ये कहानी इस हद तक मशहूर है कि जब वाल्ट डिस्नी फिल्म्स ने जब इसका हिंदी संस्करण भारत में निकला तो बच्चों बड़ों ने इसे खूब सराहा, आपको याद होगा इस फिल्म में अलादीन की आवाज़ बने थे सोनू निगम, जिन्होंने अपनी भोली आवाज़ में संवाद बोलने के आलावा कुछ बढ़िया से गीत भी गाये थे, मगर वो एक एनीमेशन फिल्म थी, अब यही फिल्म वास्तविक कलाकारों को लेकर बनी है और जल्द ही प्रदर्शन में आने वाली है, इस दिवाली आप भी अपने बच्चों को खुश कर सकते हैं ये फिल्म दिखाकर...इस फिल्म में अलादीन बने हैं रितेश देशमुख. रितेश अलादीन के रूप में कितने जचते हैं ये तो मैं नहीं कह सकता, पर हाँ जो यहाँ जिन्न बने हैं उन पर मुझे पूरा भरोसा है कि उनका अभिनय और मात्र उनकी उपस्थिति ही काफी होगी फिल्म को दिलचस्प बनाने में. जी हाँ यहाँ आपके जिन्न हैं महा नायक अमिताभ बच्चन.

दोस्तों ये साल है २००९ और आपको बता दें की साल १९६९ में अमिताभ ने रुपहले परदे पर पहली बार अपने जलवे दिखाए थे फिल्म सात हिन्दुस्तानी में, यानी ये उनके करियर का ४० वां साल है, और आज ४० सालों के बाद भी हिंदी फिल्म जगत पर राज कर रहा है ये शहंशाह....वाह बच्चन साहब क्या कहने आपके. अक्सर उनके विशाल नायकीय व्यक्तित्व के आगे एक बात अक्सर हम भूल जाते हैं वो हैं उनकी दमदार आवाज़. "नीला आसमान सो गया..." जैसे दर्द से भरे गीत हों या, "मेरे अंगने में..." की अतिनाटकीयता या फिर "रंग बरसे" की मस्ती. अमिताभ की आवाज़ में वो जादू है कि उनके गाये मामूली से मामूली गीत को भी आप अनसुना नहीं कर सकते. ये भी एक अजीब इत्तेफाक है कि जब वो अपने चरम पर थे तब कुछ चुने हुए गीत कुछ चुने हुए संगीतकारों के लिए ही गाते थे. पर साठ पार करने के बाद तो उनके भीतर का गायक कुछ और जवान हो गया है, अब तो लगभग उनकी हर फिल्म में एक गीत अवश्य होता है उनकी अपनी आवाज़ में. इस नयी फिल्म अलादीन में गीत संगीत का जिम्मा संभाला है - विशाल शेखर और अन्विता दत्त गुप्तन ने और जाहिर है ये जिन्नी रैप है खुद अमिताभ बच्चन की दमदार आवाज़ में और उनका साथ दिया है अनुष्का मनचंदा ने.

इसी माह अमिताभ बच्चन अपना जन्मदिन भी मनाएंगे, तो हम उन्हें अभी से शुभकामनाएं दिए देते है, जन्मदिन की भी और इस फिल्म अलादीन के लिए भी, कुछ सालों पहले बच्चों के दिल में अमिताभ ने ख़ास जगह बनायीं थी फिल्म "भूतनाथ" में एक भले भूत की भूमिका निभाकर. ये फिल्म मुझे और मेरे बच्चों को बेहद पसंद है, तो जाहिर है अलादीन से भी मुझे तो अच्छी ही उम्मीदें है, स्पेशल एफ्फेक्ट्स आदि भी अनूठे ही लग रहे हैं प्रोमोस देखकर. जहाँ तक संगीत की बात है इसी तरह की फिल्मों में अधिकतर गीत परिस्थितिजन्य होते है जो सुनने में कम देखने में अधिक भाते हैं. ये रैप गीत भी कुछ उसी तरह का है. इसलिए आज हम इस गीत को २.५ की रेटिंग दे रहे हैं...बाकी आप सुनकर बतायें कि आपको कैसी लगी "एंग्री यंग (?) मैन" की कूल आवाज़ इस गीत में...



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 2.5 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

चलते चलते
चलिए अब आप ने गीत सुन ही लिया है तो एक सवाल का जवाब भी दें, शर्त ये है कि आपने ईमानदारी से मात्र दो मिनट का समय लेकर निचे दिए गए वाक्य को पूरा करना है, जो भी जेहन में आये झट से लिख डालिए...क्योंकि जिन्नी के पास बहुत अधिक समत नहीं है....कौन जाने आपकी कोई मुराद इस बार पूरी ही हो जाए....वाक्य है -

जिन्नी - क्या हुक्म है मेरे आका? कौन सी आपकी तीन ख्वाहिशें ?
आप - जिन्नी मेरी तीन ख्वाहिशें ये है ______________

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

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25 नई सुरांगिनियाँ

ओल्ड इज़ गोल्ड शृंखला

महफ़िल-ए-ग़ज़लः नई शृंखला की शुरूआत

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