Monday, December 7, 2009

दुनिया न भाये मोहे अब तो बुला ले...निराशावादी स्वरों में भी शैलेन्द्र अपना "क्लास" नहीं छोड़ते



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 283

"मेरे गीत मेरे संग सहारे, कोई ना मेरा संसार में, दिल के ये टुकड़े कैसे बेच दूँ दुनिया के बाज़ार में, मन के ये मोती रखियो तू संभाले, चरणों में तेरे"। शैलेन्द्र के लिखे ये शब्द जैसे उन्ही के दिल का आइना है। गीत लेखन शैलेन्द्र का पेशा ज़रूर था, पर सिर्फ़ पैसा कमाने के लिए नहीं। फ़िल्मी गीतों का स्तर उन्होने ऊँचाई तक ही नहीं पहुँचाया बल्कि उन्हे गरीमा भी प्रदान की। और यही वजह है कि उनके जाने के ४० वर्ष बाद भी आज उनके लिखे गानें ऐसे चाव से सुने जाते हैं जैसे कल ही बनकर बाहर आए हों। "शैलेन्द्र- आर.के.फ़िल्म्स के इतर भी" शृंखला की तीसरी कड़ी में आज प्रस्तुत है मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ में फ़िल्म 'बसंत बहार' से एक भक्ति रचना, शंकर जयकिशन के संगीत निर्देशन में। "दुनिया ना भाए मोहे अब तो बुला ले, चरणों में तेरे"। राग तोड़ी पर आधारित यह भजन फ़िल्म-संगीत के धरोहर का एक अनमोल नगीना है। इसी तरह के गीतों से ही तो फ़िल्म संगीत का स्तर हमेशा उपर रखा है शैलेन्द्र जैसे गीतकारों ने। 'बसंत बहार' फ़िल्म का एक गीत आप सुन चुके हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर, जिसे भी शैलेन्द्र ने ही लिखा था। याद है ना लता जी का गाया हुआ "जा जा रे जा बालमवा" जिसे आप ने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की २८-वीं कड़ी में सुना था? और आज २८३-वीं कड़ी में फिर एक बार इस फ़िल्म का गीत बज रहा है। आज रफ़ी साहब की आवाज़ में जो गीत आप सुन रहे हैं, उसके अलावा भी उन्होने इस फ़िल्म में एक और गीत गाया था। वह भी एक भजन ही था - "बड़ी देर भयी, बड़ी देर भयी, कब लोगे खबर मोरे राम"। इस फ़िल्म के सभी गीत शास्त्रीय रागों पर आधारित थे और इसी फ़िल्म के ज़रिए शंकर जयकिशन ने यह साबित किया कि सिर्फ़ ऒर्केस्ट्रेशन में ही नहीं, बल्कि इस मिट्टी से जुड़ी शास्त्रीय संगीत में भी वो समान रूप से दक्षता रखते हैं। यह फ़िल्म १९५६ में आयी थी और उसी साल शंकर जयकिशन, हसरत जयपुरी और शलेन्द्र की टीम ने एक से एक कई सुपरहिट म्युज़िकल फ़िल्में दी थीं जिनके नाम हैं चोरी चोरी, हलाकू, क़िस्मत का खेल, नई दिली, पटरानी, और राजहठ।

'बसंत बहार' श्री विश्वभारती फ़िल्म्स की प्रस्तुति थी जिसके निर्देशक थे राजा नवाथे और मुख्य भूमिकाओं में थे भारत भूषण, निम्मी और कुमकुम। इस फ़िल्म के सारे गानें शैलेन्द्र ने लिखे सिवाए एक गीत के ("मैं पिया तेरी तू माने या ना माने") जिसे हसरत साहब ने लिखा था। हसरत और शैलेन्द्र में कितनी गहरी दोस्ती थी और कैसे मिलजुल कर वे काम करते थे इसके बारे में तो हम ने पिछले ही दिनों आपको बताया था। आइए आज शैलेन्द्र जी के जीवन की एक और पहलू पर रोशनी डालें जिन्हे उजागर किया था शैलेन्द्र जी की सुपुत्री आमला मजुमदार ने १०४.४ आवाज़ एफ़.एम दुबई पर - "baba came from a very very humble background, very humble background, यहाँ तक की बाबा जब रेल्वे में थे, he was only an apprentice, it was not even a full-fledged job and शादी करके मम्मी आईं और मम्मी came from a better background, their was a love marriage, mummy came from a better background, mummy came with clothes and jewellery which was the norm of the day, बाबा ने मम्मी से कहा कि देखो तुम ये सब पहनकर हमारे साथ चलोगी तो it would look very odd, ये सब अभी छोड़ दो, जब हम इस लायक हो जाएँगे कि हम तुम्हे ये कपड़े ये ज़ेवर पहना सके हम ख़ुद तुम्हे पहनाएँगे। और ऐसे भी दिन आए कि she didn't have to look back, he had far out-stepped or gone beyond even her background। लेकिन हम जिस माहौल में पैदा हुए, जिस घर में बड़े हुए, उस घर में हमने we didn't see need, we didn't see poverty, we didn't see want of any kind but हमारे घर में ऐसा था कि baba was so firm, he was the kindest soul ever but he was so firm that the children will not forget that we are humble, we come from a normal background, we are normal human beings." दोस्तों, शैलेन्द्र जी की यही सादगी, यही सरलता उनके गीतों से भी साफ़ छलकती है। हर इंसान, चाहे वो कितनी ही ऊँचाई पर क्यों ना पहुँच जाए, उसे यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि चलने के लिए उसे अपने क़दमों को ज़मीन पर ही रखना पड़ता है। शैलेन्द्र ने ना केवल इसे अपने जीवन में फ़ॊलो किया बल्कि अपने बच्चों को भी यही शिक्षा दी। आइए दोस्तों, अब आज का गीत सुना जाए जिसमें गिड़गिड़ाकर भगवान से विनती की जा रही है अपने पास बुला लेने के लिए। फ़िल्म के चरित्र और सिचुयशन के मुताबिक़ जीवन के प्रति निराशावादी स्वर गूँजते हैं इस भजन में, आइए सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस गीत के इंटर्ल्युड में बजती बांसुरी की धुन पर आधारित एक चर्चित गीत ९० के दशक में इन्हीं संगीतकार के सुपुत्र ने शाहरुख़-सलमान अभिनीत फिल्म में बनाया था.
२. बहुत ही सुंदर और शिक्षाप्रद है शैलेन्द्र का लिखा ये नायाब गीत.
३. मुखड़े की तीसरी पंक्ति में शब्द है -"रैना".

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी, दूसरी कोशिश में आखिर आपने कैच लपक ही लिया बधाई, ३० अंकों पर आने की.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

तू सलामत रहे...अपनी नयी एल्बम के गीत के माध्यम से ज़ाती जिंदगी के कुछ राज़ खोल रहे हैं शायद अदनान सामी



ताजा सुर ताल TST (38)

दोस्तो, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर से १४ दिसम्बर तक, यानी TST के ४० वें एपिसोड तक. जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में,सीमा जी दो सही जवाब आपने दिया और अंतिम सवाल का सही जवाब आपके एक मात्र प्रतिद्वंदी तनहा जी ने दिया. खैर आज हमारी अंतिम ट्रिविया है, आज तो अगर आप जवाब नहीं भी देंगीं तब भी आप ही विजेता हैं इस साल की, अपनी पसंद के १० गीत चुन कर रखिये वर्ष २००९ में प्रदर्शित फिल्मों में से, ३१ तारीख़ की शाम होगी आपके चुने हुए गीतों के नाम....बधाई


सुजॉय - सजीव, एक और नए सप्ताह की शुरुआत हो रही है, बताइए कि इसमें ख़ास क्या है?

सजीव - ख़ास.... ख़ास.... ख़ास क्या है, चलो तुम ही बताओ, मुझे तो याद नहीं आ रहा।

सुजॉय - अरे भई, आज है इस दशक के आख़िरी साल के अख़िरी महीने का पहला सोमवार! तो हुआ ना यह ख़ास? सॉरी, बैड जोक!

सजीव - वैसे इस बात में सच्चाई तो है, देखते ही देखते हम दिसंबर में पहुँच गए और बहुत जल्द यह साल भी समाप्त हो जाएगा। ख़ैर, छोड़ो इन बातों को, अब ज़िक्र किया जाए कि तरोताज़ा क्या हम अपने श्रोताओं को सुनवा रहे हैं?

सुजॉय - बिल्कुल! आज भी हम पिछले हफ़्ते की तरह एक ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम की चर्चा भी करेंगे और उससे चुन कर कुछ गानें भी सुनेंगे। यह है अदनान सामी का नया ऐल्बम 'एक लड़की दीवानी सी'।

सजीव - इस ऐल्बम के गानें पाश्चात्य रंग के हैं। हल्के फुल्के गानें हैं, जो फ़िल्मों के लिए भी आसानी से चलए जा सकते थे। चलो सब से पहले सुना जाए इस ऐल्बम का शीर्षक गीत।

एक लड़की जो दीवानी सी है...ek ladki deewani si (adnaan saami)



सुजॉय - गीत हमने सुना, आपको नहीं लगता कि यह एक टिपिकल अदनान सामी नंबर है?

सजीव - बिल्कुल! कुछ ख़ास नयापन नज़र नहीं आया इस गीत में। अगला गीत सुनवाने से पहले क्यों ना अदनान के करीयर पर एक नज़र दौड़ाई जाए?

सुजॉय - ज़रूर! मुझे जितना पता है उनका पहला ऐल्बम आया था सन् १९९१ में, जिसका नाम था 'राग टाइम'।

सजीव - उसके बाद १९९५ में आशा भोसले के साथ मिल कर उन्होने बनाई 'सरगम' ऐल्बम। और इसके ठीक दो साल बाद, १९९७ में आया वह मशहूर ऐल्बम 'बदलते मौसम' जिसके गीत "कभी तो नज़र मिलाओ" ने अदनान को कामयाबी के शिखर पर पहुँचा दिया। और "लिफ़्ट करा दे" भी इसी ऐल्बम का हिस्सा था।

सुजॉय - सही कहा, और इस कामयाबी के बाद उनकी तरफ़ फ़िल्मी संगीतकारों ने भी ध्यान देना शुरु कर दिया और मुंबई में उनके क़दम जमने लगे।

सजीव - अरे मुंबई से याद आया कि इस नए ऐल्बम में एक मुंबई पर भी गाना है। पिछले साल के आतंकी हमले और उसके बाद इस शहर ने जिस तरह के स्पिरिट का परिचय दिया है, वही है इस गीत का आधार।

सुजॉय - एक और ख़ास बात यह कि इस गीत में माइकल जैक्सन के भाई जर्मेइन जैक्सन की आवाज़ भी शामिल है अदनान के साथ। चलिए सुनते हैं।

लेट्स गो टू मुंबई सिटी...lets go to mumbai city (adnan sami)



सजीव - हाँ, तो हम बात कर रहे थे अदनान सामी के ऐल्बमों की। सन् २००२ में उनका एक और हिट ऐल्बम रिलीज़ हुआ 'तेरा चेहरा'। और २००३ में "कभी तो नज़र मिलाओ" शीर्षक से ही एक ऐल्बम निकाला गया और उस गीत को एक बार फिर से इसमें शामिल किया गया।

सुजॉय - एक और हिट गीत "भीगी भीगी रातों में तुम आओ ना" भी इसी ऐल्बम में शामिल हुआ। अदनान की खासियत यही है कि जहाँ एक तरफ़ पाश्चात्य रीदम वाले थिरकते गीतों को वो भली भाँति खींच ले जाते हैं, वहीं दूसरी ओर नर्म-ओ-नाज़ुक रोमांटिक गीतों को भी बहुत बढ़िया अंजाम देते हैं।

सजीव - मेरा ख़याल है कि तुम इस नए ऐल्बम का "तू सलामत रहे" गीत की तरफ़ इशारा कर रहे हो।

सुजॉय - बिल्कुल ठीक समझा आपने।

सजीव - हाल ही में अदनान का अपनी दूसरी पत्नी से भी तलाख हो गया। उनकी व्यक्तिगत ज़िंदगी से जुड़ी कई ख़बरें पिछले दिनों अख़बारों में छाई रही। इस गीत के ज़रिए शायद अदनान ने सारे गिले शिकवे भुला कर अपनी भूतपूर्व पत्नी के लिए दुआएँ माँगी होगी।

तू सलामत रहे...tu salamat rahe (adnaan sami)



सुजॉय - इस संजीदा गीत से दिल थोड़ा सा भारी हो गया है। आइए अब ज़रा दिल को हल्का किया जाए अगले गीत के ज़रिए। इस गीत के बारे में बहुत ज़्यादा कुछ कहने के लिए नहीं है, बस सुनिए और झूमिए, अपने कुर्सी पर बैठे बैठे ही सही।

सजीव - हाँ, इसे हम एक रिफ़्रेशिंग् गीत की तरह अपना सकते हैं, जिसमें है डांस के बीट्स और दिल को झूमा देने वाली ध्वनियाँ।

लैला ओ मेरी लैला...lailla o meri lailla (adnan sami)



सजीव - और अब हम आ पहुँचे हैं आज के अंतिम गीत पर। और शायद यह गीत इस ऐल्बम का सब से ख़ूबसूरत गीत होना चाहिए। "चलो चलो चलो, ऐसा अपना जहाँ बनाएँ चलो"।

सुजॉय - गीत के बोल भी सुंदर है। वैसे इस गीत को सुनते हुए मुझे वह गीत याद आ गया - "कुछ ऐसा जहाँ हम बनाएँ जहाँ पहला हो हर वो नज़ारा"।

सजीव - इस भाव पर और भी बहुत से गानें हैं। अदनान की जो बात मुझे सब से ज़्यादा पसंद आती है, वह है उनका प्रयोगधर्मी स्वभाव। बजाए एक व्यावसायिक कलाकार बन कर फार्मूला म्युज़िक देने के उन्होने दूसरी राह चुनी जिसमें वो ख़ुद संगीत में अलग अलग एक्स्पेरीमेंट्स करते रहते हैं।

सुजॉय - हाँ, और इतना ही नहीं, जिन जिन फ़िल्मों में उन्होने संगीत दिया है या जिन फ़िल्मों में उन्होने गाए हैं, वो सब कामयाब रहे हैं और मास और क्लास दोनों को ही पसंद आए हैं।

सजीव - तो अब अदनान साहब को भविष्य की शुभकामनाएँ देते हुए यह चर्चा यहीं समाप्त करते हैं और सुनते हैं आज का अंतिम गीत।

चलो चलो चलो...chalo chalo chalo (adnaan sami)



और अब बारी है ट्रिविया की

TST ट्रिविया # ३७-अदनान सामी को एक विशेष UNICEF Award और United Nations Peace Medal से सम्मानित किया गया था उनके एक ख़ास गीत के लिए। बताइए कि यह गीत उन्होने किस महाद्वीप को समर्पित किया था?

TST ट्रिविया # ३८- अमरीका के किस पत्रिका ने अदनान सामी को "Keyboard Discovery of The 90s" कह कर संबोधित किया था?

TST ट्रिविया # ३९- यह प्यार है या क्या है नहीं हमें इसका कोई आभास, स्नेहा के होठों पर सज रही है लता की मिठास। बताइए कि इशारा किस गीत की तरफ़ है?


"एक लड़की दीवानी सी" एल्बम को आवाज़ रेटिंग ***

हालाँकि एल्बम में अदनान ने विविधता लाने की पूरी कोशिश की है पर कोई भी गीत उस तरह अपील नहीं करता जैसा कि "तेरा चेहरा", "कभी तो नज़र मिलाओ" या फिर "भीगी भीगी रातों में" ने किया था, फिर भी अदनान के चाहने वालों को उनके ये पेशकश पसंद आएगी...

आवाज़ की टीम ने इस अल्बम को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत अल्बम को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Sunday, December 6, 2009

आजा रे परदेसी, मैं तो कब से खडी इस पार....लता के स्वरों में गूंजी शैलेन्द्र की पीड़ा



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 282

"शैलेन्द्र- आर.के.फ़िल्म्स के इतर भी" शृंखला की दूसरी कड़ी में आपका स्वागत है। इस शृंखला में हम ना केवल राज कपूर निर्मित फ़िल्मों के बाहर शैलेन्द्र के लिखे गीत सुनवा रहे हैं, बल्कि ये सभी गानें अपने आप में एक एक मास्टरपीस हैं और एक दूसरे से बिल्कुल जुदा है, अलग है, अनूठा है। आज जिस गीत को हमने चुना है वह एक हौंटिंग् नंबर है लता जी का गाया हुआ। ५० और ६० के दशकों में एक ट्रेंड चला था सस्पेन्स फ़िल्मों का और हर ऐसी फ़िल्म में लता जी का गाया हुआ एक हौंटिंग् गीत होता था। १९४९ में फ़िल्म 'महल' के बाद १९५८ में अगली इस तरह की सुपरहिट सस्पेन्स फ़िल्म आई 'मधुमती' जो पुनर्जनम की कहानी पर आधारित थी। इस फ़िल्म में शैलेन्द्र ने एक ऐसा गीत लिखा जिसे गा कर लता जी को अपने जीवन का पहला फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला। जी हाँ, "मैं तो कब से खड़ी इस पार, ये अखियाँ थक गईं पंथ निहार, आजा रे परदेसी"। सलिल चौधरी के मीठे धुनों से सजी इस फ़िल्म के सभी के सभी गानें ख़ूब ख़ूब सुने गये और आज भी उनकी चमक उतनी ही बरकरार है, और रेडियो पर इस फ़िल्म के गानें तो अक्सर सुना जा सकता है। और विविध भारती के फ़रमाइशी कार्यक्रमों में भी इस फ़िल्म के गीतों की फ़रमाइशें इस फ़िल्म के बनने के ५० साल बाद भी कुछ कम होती दिखाई नहीं देती। दोस्तों, 'मधुमती' से जुड़ी तमाम जानकारियाँ हमने आपको उस दिन ही दे दिए थे जिस दिन '१० गीत जो थे मुकेश को प्रिय' शृंखला के अंतर्गत इस फ़िल्म का "सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं" गीत सुनवाया था। इसलिए आज उन बातों को बिना दोहराते हुए हम आपको शैलेन्द्र जी से जुड़ी कुछ और बातें बताते हैं।

शब्दों की दुनिया शैलेन्द्र की दासी थी। भाषा की पकड़ बेहद मज़बूत लेकिन बेहद सरल शब्दावली का इस्तेमाल किया करते थे। "मैं दीये की ऐसी बाती, जल ना सकी जो बुझ भी ना पाती", या फिर "मैं नदिया फिर भी मैं प्यासी, भेद यह गहरा बात ज़रा सी" जैसी उपमाओं के पीछे कितनी दार्शनिक और गंभीर बातें छुपी हुई हैं, गीत को उपर उपर सुनते हुए अहसास ही नहीं होता। मुंबई के बोरीवली निवासी सुशील ठाकुर के बहनोई थे शैलेन्द्र। सुशील जी शैलेन्द्र जी को बहुत क़रीब से देखा था और जाना भी। विविध भारती ने एक बार सुशील जी को आमंत्रण दिया था शैलेन्द्र जी पर कुछ कहने के लिए। उन्होने कहा था - "मेरा और उनका तो जैसे बाप बेटे का रिश्ता था। जाड़ों के दिनों में मैं उनकी रजाई में घुस जाता था और उन्हे कविताएँ सुनाने के लिए कहता था। उनके शब्द बड़े ही सरल हुआ करते थे। १९४७ में उनकी शादी हुई और परेल के रेल्वे वर्कशॊप में नौकरी कर ली। रेल्वे का छोटा सा कमरा था जिसमें बस एक पलंग था। पूरा ख़ानदान उसी में रहते थे। उन पर कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव था। एक बार इपटा के किसी जल्से में वे अपनी कविताएँ सुना रहे थे कि राज कपूर की नज़र उन पर पड़ी और उन्हे गीत लिखने का ऑफर दे दिया। पर शैलेन्द्र जी उसे ठुकरा दिया। राज साहब ने कहा था कि कभी भी अगर पैसों की ज़रूरत पड़े तो उन्हे ज़रूर बताएँ, वे उनसे गीत लिखवाना चाहते हैं। शैलेन्द्र जी का बच्चा हुआ तो उनकी आर्थिक परेशानियाँ बढ़ गईं और वे राज साहब के पास जा पहुँचे। राज कपूर ने कहा कि अभी अभी मैं फ़िल्म 'आग' बना चुका हूँ, फिर जब मैं कोई फ़िल्म बनाउँगा तो आप को ज़रूर मौका दूँगा। उन्होने उनकी आर्थिक सहायता की और फ़िल्म 'बरसात' में उन्हे गीत लिखने का ऑफर दे दिया।" और दोस्तों, इस तरह से पदार्पण हुआ इस महान गीतकार का फ़िल्म जगत में। शैलेन्द्र जी की बातें आगे भी जारी रहेंगी, आइए अब सुना जाए आज का गीत फ़िल्म 'मधुमती' से।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. राग तोड़ी पर आधारित एक और भक्ति में डूबा गीत शैलेन्द्र का रचा.
२. राज नवाथे निर्देशक थे इस फिल्म के.
३. इस निराशावादी गीत के एक अंतरे की अंतिम पंक्ति में शब्द है -"मोती".

पिछली पहेली का परिणाम -
शैलेन्द्र को समर्पित इस नयी शृंखला में भी इंदु जी ने लीड बरकरार रखी है और २८ अंकों के साथ वो अब वो रोहित जी स्कोर के अधिक करीब आ गयी हैं, पाबला जी आप तो बहुत बड़े स्टार निकले :), दिलीप जी, आपने एकदम दुरुस्त फ़रमाया...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, December 5, 2009

तू प्यार का सागर है....शैलेन्द्र की कलम सी निकली इस प्रार्थना में गहरी वेदना भी है



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 281

"अजीब दास्ताँ है ये, कहाँ शुरु कहाँ ख़तम, ये मंज़िलें हैं कौन सी, ना तुम समझ सके ना हम"। "दुनिया बनानेवाले, क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई?" "जीना यहाँ, मरना यहाँ, इसके सिवा जाना कहाँ, जी चाहे जब हमको आवाज़ दो, हम हैं वहीं, हम थे जहाँ"। जीवन दर्शन और ज़िंदगी के फ़ल्सफ़ात लिए हुए इन जैसे अनेकों अमर गीतों को लिखने वाले बस एक ही गीतकार - शैलेन्द्र। वही शैलेन्द्र जो अपने ख़यालों और ज़िंदगी के तजुर्बात को अपने अमर गीतों का रूप देकर ज़माने भर के तरफ़ से माने गए। शैलेन्द्र एक ऐसे शायर, एक ऐसे कवि की हैसीयत रखते हैं जिनकी शायरी और गीतों के मज़बूत कंधों पर हिंदी फ़िल्म संगीत की इमारत आज तक खड़ी है। फ़िल्म जगत को १७ सालों में जो कालजयी गानें शैलेन्द्र साहब ने दिए हैं, वो इतने कम अरसे में शायद ही किसी और ने दिए हों। आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु हो रही है नई शृंखला "शैलेन्द्र- आर.के.फ़िल्म्स के इतर भी", जिसके तहत आप शैलेन्द्र के लिखे ऐसे दस गीत सुनेंगे जिन्हे शैलेन्द्र जी ने आर. के. बैनर के बाहर बनी फ़िल्मों के लिए लिखे हैं। तो आइए शुरु करते हैं यह नई शृंखला। तो फिर आज कौन सा गीत आपको सुनवाया जाए। हमें ध्यान में आया कि अभी दो दिन पहले, यानी कि ३ दिसंबर को 'विश्व विकलांगता दिवस' के रूप में पालित किया गया। हमारे देश में लाखों ऐसे बच्चे हैं जो किसी ना किसी तरह से विकलांग हैं। अक्सर ऐसा होता है कि इन बच्चों की तरफ़ देख कर हम सिर्फ़ अपनी सहानुभूति व्यक्त कर देते हैं। लेकिन इन्हे सहानुभूति की नहीं, बल्कि प्रोत्साहन की आवश्यकता है। आज विज्ञान और टेक्नोलोजी की मदद से अलग अलग तरह की विकलांगताओं पर विजय पाई गई है, और उचित प्रशीक्षण से ये बच्चे भी एक आम ज़िंदगी जीने में समर्थ हो सकते हैं। आइए आज इस विशेष दिन पर सुनते हैं शैलेन्द्र का लिखा फ़िल्म 'सीमा' की एक प्रार्थना "तू प्यार का सागर है, तेरी इक बूँद के प्यासे हम, लौटा जो दिया तूने, चले जाएँगे जहाँ से हम"। मन्ना डे और बच्चों की आवाज़ों में इस गीत की तर्ज़ बनाई थी शंकर जयकिशन ने।

आर.के. कैम्प के बाहर शंकर जयकिशन, शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी की टीम ने फ़िल्मकार अमीय चक्रबर्ती के साथ भी बहुत उत्कृष्ट काम किया है। अमीय साहब ने अपनी फ़िल्मों मे सामाजिक मुद्दों को अक्सर उजागर किया करते थे, लेकिन मनोरंजन के सारे साज़-ओ-सामान को बरकरार रखते हुए। उनकी १९५५ की फ़िल्म 'सीमा' हिंदी सिनेमा की एक यादगार फ़िल्म रही है। यह फ़िल्म नूतन और बलराज साहनी की यादगार अदाकारी के लिए भी याद किया जाता है। इस फ़िल्म के लिए नूतन को उस साल के सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिया गया था। इस फ़िल्म के ज़यादातर गीत शास्त्रीय रागों पर आधारित थे। आज का प्रस्तुत गीत राग दरबारी कनाड़ा पर आधारित है। शैलेन्द्र ने इस गीत में बस यही कहने की कोशिश की है कि एक बेचैन मन को भगवान की शरण ही शांति दिला सकती है। एक अंतरे में वो लिखते हैं कि "घायल मन का पागल पंछी उड़ने को बेक़रार, पंख हैं कोमल आँखें हैं धुंधली जाना है सागर पार, अब तू ही इसे समझा राह भूले थे कहाँ से हम"। अलंकारों की छटा देखिए इन पंक्तियों में, भाव तो यही है कि कच्चे उम्र में इंसान बिना सही पथ-प्रदर्शक के भटक जाता है, ऐसे में ईश्वर से निवेदन किया जा रहा है सही मार्ग दर्शन देने की। दूसरे अंतरे में शैलेन्द्र ने बड़ी दक्षता से फ़िल्म के शीर्षक का इस्तेमाल कर इस गीत को फ़िल्म का शीर्षक गीत बना दिया है। दोस्तों, क्योंकि हमने आज ज़िक्र की विकलांग बच्चों की, तो इस फ़िल्म में एक और गीत है जो मुझे याद आ रही है। रफ़ी साहब की आवाज़ में यह गीत है "हमें भी दे दो सहारा कि बेसहारे हैं, फ़लक के गोद से टूटे हुए सितारे हैं"। हालाँकि इस गीत को शैलेन्द्र ने नहीं बल्कि हसरत जयपुरी ने लिखा था। इस गीत को हम आप तक फिर कभी पहुँचाएँगे, आज आइए सुनते हैं शैलेन्द्र के कलम से निकली हुई मशहूर प्रार्थना गीत "तू प्यार का सागर है"।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. जिस गायिका ने इसे गाया था उनके लिए ये गीत पहला फिल्म फेयर पुरस्कार लेकर आया था.
२. शैलेन्द्र ने इस गीत में जन्म जन्म के गहरे प्यार की दुहाई दी है.
३. एक अंतरा खत्म होता है इस शब्द पर -"उदासी".

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी, उर्फ़ ओल्ड इस गोल्ड की शेरनी जी, २६ अंक हुए आपके, एक बार फिर बधाई. पाबला जी और आपकी टुनिंग कमाल की है, पराग जी एक सफल शृंखला के लिए आप बधाई के पात्र हैं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

सुनो कहानी: हरिशंकर परसाई का व्यंग्य "खेती



'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की कहानी "ह्त्या की राजनीति" का पॉडकास्ट उन्हीं की आवाज़ में सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं हरिशंकर परसाई का लघु व्यंग्य "खेती", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय मात्र 2 मिनट 24 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।




मेरी जन्म-तारीख 22 अगस्त 1924 छपती है। यह भूल है। तारीख ठीक है। सन् गलत है। सही सन् 1922 है। ।
~ हरिशंकर परसाई (1922-1995)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

हुज़ूर, हम किसानों को आप ज़मीन, पानी और बीज दिला दीजिये और अपने अफसरों से हमारी रक्षा कीजिये।
(हरिशंकर परसाई के व्यंग्य "खेती" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#Fourty Ninth Story, Kheti: Harishankar Parsai/Hindi Audio Book/2009/43. Voice: Anurag Sharma

Friday, December 4, 2009

मेरा दिल जो मेरा होता....गीता जी की आवाज़ और गुलज़ार के शब्द, जैसे कविता में घुल जाए अमृत



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 280

गीता दत्त जी के गाए गीतों को सुनते हुए आज हम आ पहुँचे हैं इस ख़ास लघु शृंखला 'गीतांजली' की अंतिम कड़ी पर। पराग सांकला जी के सहयोग से इस पूरे शृंखला में आप ने ना केवल गीता जी के गाए अलग अलग अभिनेत्रियों पर फ़िल्माए हुए गीत सुनें, बल्कि उन अभिनेत्रियों और उन गीतों से संबंधित तमाम जानकारियों से भी अवगत हो सके। अब तक प्रसारित सभी गीत ५० के दशक के थे, लेकिन आज इस शृंखला का समापन हो रहा है ७० के दशक के उस फ़िल्म के गीत से जिसमें गीता जी की आवाज़ आख़िरी बार सुनाई दी थी। यह गीत है १९७१ की फ़िल्म 'अनुभव' का, "मेरा दिल जो मेरा होता"। और यह गीत फ़िल्माया गया था तनुजा पर। इस फ़िल्म के गीतों पर और चर्चा आगे बढ़ाने से पहले आइए कुछ बातें तनुजा जी की हो जाए! तनुजा का जन्म बम्बई के एक मराठी परिवार में हुआ था। उनके पिता कुमारसेन समर्थ एक कवि थे और माँ शोभना समर्थ ३० और ४० के दशकों की एक मशहूर फ़िल्म अभिनेत्री। जहाँ शोभना जी ने अपनी बेटी नूतन को लौंच किया १९५० की फ़िल्म 'हमारी बेटी' में, ठीक वैसे ही उन्होने अपनी छोटी बेटी तनुजा को बतौर बाल कलाकार कास्ट किया था उसी फ़िल्म में। उसके बाद तनुजा को पढ़ाई लिखाई के लिए विदेश भेजा गया जहाँ पर उन्होने अंग्रेज़ी, फ़्रेंच और जर्मन भाषाओं की तालीम प्राप्त की। वापस आकर १९६० की फ़िल्म 'छबिली' में अपनी बड़ी बहन नूतन के साथ उन्होने अभिनय किया, जिसका निर्देशन उनकी माँ ने ही किया था। इस फ़िल्म में गीता दत्त ने नूतन के साथ अपना एक्लौता डुएट गाया था। इसके एक दशक बाद बासु भट्टाचार्य की फ़िल्म 'अनुभव' में तनुजा का किरदार बहुत सराहा गया। तनुजा ने इस फ़िल्म की शूटिंग् के लिए अपना अपार्टमेंट बासु दा को दे रखा था, जिसके बदले बासु दा ने उन्हे दी एक यादगार भूमिका।

'अनुभव' फ़िल्म के गीतों की अगर बात करें तो वह एक ऐसा दौर था जब गीता दत्त बीमार हो चुकीं थीं। उनके पति गुरु दत्त का स्वर्गवास हो चुका था और उन पर अपने तीन छोटे छोटे बच्चों को बड़ा करने और 'गुरु दत्त फ़िल्म्स' के कर्ज़ों को चुकाने की ज़िम्मीदारी आन पड़ी थी। ऐसी स्थिति में फ़िल्म 'अनुभव' उनके जीवन में एक रोशनी की तरह आई और फिर बार फिर उन्होने यह साबित किया कि अब भी उनकी आवाज़ में वही अनूठा अंदाज़ बरक़रार है जो ५० और ६० के दशकों में हुआ करती थी। 'अनुभव' के गानें बेहद लोकप्रिय हुए और आज जब भी गीता जी के गाए गीतों की कोई सी.डी रिलीज़ होती है तो इस फ़िल्म का एक गीत उसमें ज़रूर शामिल किया जाता है। गीता दत्त के गाए 'अनुभव' फ़िल्म के तीनों गानें अपने आप में मास्टरपीस हैं और इन गीतों की चर्चा घंटों तक की जा सकती है। हमें याद रखनी चाहिए कि उस समय बाक़ी सभी संगीतकार उनसे मुँह मोड़ चुके थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि गीता जी ने इन गीतों में जान डाल दी थी और वह भी उस समय जब कि उनकी अपनी तबीयत बहुत ख़राब थी और ख़ुद अपनी ज़िंदगी की तमाम परेशानियों से झूझ रही थीं। किसी तरह का नाटकीय या बहुत ज़्यादा जज़्बाती ना होते हुए भी उन्होने इन गीतों में वो अहसासात भरे हैं कि तनुजा के किरदार के साथ पूरा पूरा न्याय हुआ है। "मुझे जाँ ना कहो मेरी जाँ" गीत के अंत में उनकी हँसी कितनी नैचरल लगती है, है न? इस फ़िल्म में संगीत था कमचर्चित संगीतकार कानु रॉय का, जिनके संगीत निर्देशन में गीता जी की ही आवाज़ में फ़िल्म 'उसकी कहानी' का गीत "आज की काली घटा" हमने आपको गीता जी की पुण्य तिथि २० जुलाई को सुनवाया था। दुर्भाग्यवश 'अनुभव' की कामयाबी उस दीपक की तरह थी जो बुझने से पहले दमक उठती है। गीता जी जल्द ही इस दुनिया-ए-फ़ानी को छोड़ कर चली गईं अपनी अनंत यात्रा पर, और पीछे छोड़ गईं वो असंख्य मीठी सुरीली यादें जिनके सहारे आज हम कभी थिरक उठते हैं, कभी मचल जाते हैं, कभी उनकी रोमांटिक कॉमेडी हमें गुदगुदा जाती हैं, तो कभी उनके भक्ति रस वाले गीतों में डूब कर हम ईश्वर को अपने ही अंदर महसूस करने लगते हैं, और कभी उनके दुख भरे गीतों को सुनते हुए दर्द से दिल भर उठता है यह सोचते हुए कि क्यों इस महान और बेमिसाल गायिका को इतने दुख ज़िंदगी ने दिए! दोस्तों, गीता जी पर केन्द्रित यह शृंखला समाप्त करते हुए आइए सुनते हैं 'अनुभव' फ़िल्म का यह गीत, और चलते चलते एक बार फिर से हम आभार व्यक्त करते हैं पराग सांकला जी का इस पूरे शृंखला के लिए गानें और तथ्य संग्रहित करने के लिए। इस शृंखला के बारे में आप अपने विचार हमें टिप्पणी के अलावा hindyugm@gmail.com की ई-मेल पते पर भी भेज सकते हैं। धन्यवाद!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल से शुरू होगी उस महान गीतकार/कवि पर हमारी लघु शृंखला, जिनकी आज से १० दिनों बाद पुण्यतिथि है.
२. यूं तो फिल्म का नाम ही मुख्य अभिनेत्री के स्क्रीन नाम पर था, पर इस फिल्म में बलराज सहानी की भी प्रमुख भूमिका रही.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"घायल".

पिछली पहेली का परिणाम -
पाबला जी ८ अंकों के लिए बधाई, और इंदु जी सेहत का ध्यान रखें ज़रा आप भी....

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, December 3, 2009

मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया...जिस अभिनेत्री को मिली गीता की सुरीली आवाज़, वो यही गाती नज़र आई



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 279

'गीतांजली' की नौवी कड़ी में आज गीता दत्त की आवाज़ सजने वाली है माला सिंहा पर। दोस्तों, हमने इस महफ़िल में माला सिंहा पर फ़िल्माए कई गीत सुनवा चुके हैं लेकिन कभी भी हमने उनकी चर्चा नहीं की। तो आज हो जाए? माला सिंहा का जन्म एक नेपाली इसाई परिवार में हुआ था। उनका नाम रखा गया आल्डा। लेकिन स्कूल में उनके सहपाठी उन्हे डाल्डा कहकर छेड़ने की वजह से उन्होने अपना नाम बदल कर माला रख लिया। कलकत्ते में कुछ बंगला फ़िल्मों में अभिनय करने के बाद माला सिंहा को किसी बंगला फ़िल्म की शूटिंग् के लिए बम्बई जाना पड़ा। वहाँ उनकी मुलाक़ात हुई थी गीता दत्त से। गीता दत्त को माला सिंहा बहुत पसंद आई और उन्होने उनकी किदार शर्मा से मुलाक़ात करवा दी। और शर्मा जी ने ही माला सिंहा को बतौर नायिका अपनी फ़िल्म 'रंगीन रातें' में कास्ट कर दी। लेकिन माला की पहली हिंदी फ़िल्म थी 'बादशाह' जिसमें उनके नायक थे प्रदीप कुमार। उसके बाद आई पौराणिक धार्मिक फ़िल्म 'एकादशी'। दोनों ही फ़िल्में फ़्लॊप रही और उसके बाद किशोर साहू की फ़िल्म 'हैमलेट' ने माला को दिलाई ख्याति, भले ही फ़िल्म पिट गई थी। १९५७ में गुरु दत्त ने माला को अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'प्यासा' में एक महत्वपूर्ण किरदार निभाने का मौका दिया जिसे वो पहले मधुबाला को देना चाहते थे। माला ने उस किरदार में जान डाल दी। यह फ़िल्म ना केवल हिंदी सिनेमा की एक क्लासिक फ़िल्म है, बल्कि यह फ़िल्म माला सिंहा के करीयर की एक टर्निंग् पॊयन्ट भी सिद्ध हुई। इसके बाद माला सिंहा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। धूल का फूल, परवरिश, फिर सुबह होगी, मैं नशे में हूँ, लव मैरिज, बहूरानी, अनपढ़, आसरा, दिल तेरा दीवाना, गुमराह, आँखें, हरियाली और रास्ता, हिमालय की गोद में, जैसी सुपर डुपर हिट फ़िल्में माला की झोली में गई।

दोस्तों, गीता दत्त ने माला सिंहा के लिए जिन फ़िल्मों में पार्श्वगायन किया, वो फ़िल्में हैं - सुहागन ('५४), रियासत ('५५), फ़ैशन, प्यासा ('५७), जालसाज़, चंदन, डिटेक्टिव ('५८), आँख मिचोली ('६२), और सुहागन ('६४)। १९५७ की बंगला फ़िल्म 'प्रिथिबी आमारे चाय' में भी गीता जी ने माला जी का प्लेबैक किया था। आज हम जिस गीत को चुन लाए हैं वह एक बहुत ही ख़ूबसूरत युगल गीत है जिसमें गीता दत्त का साथ दिया है हेमन्त कुमार ने। फ़िल्म 'डिटेक्टिव' का यह गीत है जिसमें संगीत दिया था गीता दत्त के भाई मुकुल रॉय ने। गीत फ़िल्माया गया माला सिंहा और प्रदीप कुमार पर। ये मीठे सुरीले बोल हैं शैलेन्द्र के। इस फ़िल्म का निर्देशन किया था शक्ति सामंत ने। वाल्ट्ज़ के रीदम पर आधारित यह युगलगीत रूमानीयत के रस में डूबो डूबो कर रची गई है। मुकुल रॉय को बहुत ज़्यादा काम करने का मौका नहीं मिला। उनके संगीत निर्देशन में बस ४ फ़िल्में आईं - डिटेक्टिव, सैलाब, भेद, दो बहादुर। फ़िल्म 'डिटेक्टिव' में गीता जी का ही गाया एक और मशहूर गीत था "दो चमकती आँखों में कल ख़्वाब सुनहरा था जितना, हाए ज़िंदगी तेरी राह में आज अंधेरा है उतना"। क़िस्मत की विडंबना देखिए, जहाँ एक तरफ़ इस गीत को बेहद लोकप्रियता हासिल हुई, वहीं ऐसा लगा जैसे इस गीत के बोल हू-ब-हू मुकुल रॉय के लिए ही लिखे गए हों। प्रतिभा होते हुए भी वो आगे नहीं बढ़ सके। आज का यह अंक गीता जी के साथ साथ समर्पित है मुकुल रॊय की प्रतिभा को भी। सुनते हैं यह गीत.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. गुलज़ार साहब ने बहुत खूबसूरत बोल लिखे इस गीत के.
२. जिस अंदाज़ में इसे गीता जी गाया उसका कोई सानी नहीं, जिस अभिनेत्री पर इसे फिल्माया गया था उन्होंने बतौर बाल कलाकार उस फिल्म से शुरुआत की थी जिसमें उनकी बड़ी बहन को लौंच किया गया था.
३. पहला अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"सूरज".इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी ३ और शानदार अंक आपकी झोली में...बहुत बधाई, पाबला जी, अगर जवाब नहीं पता तो बोल दिया कीजिये बहाने क्यों बनाते हैं हा हा हा :)

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, December 2, 2009

चंदा चांदनी में जब चमके...गीता दत्त और गीता बाली का अनूठा संगम



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 278

राग सांकला जी के चुने हुए गीता दत्त के गाए गानें इन दिनों आप सुन रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ख़ास लघु शृंखला 'गीतांजली' के अन्तर्गत। आज के अंक में गीता दत्त गा रहीं हैं गीता बाली के लिए। जी हाँ, वही गीता बाली जिनकी थिरकती हुई आँखें, जिनके चेहरे के अनगिनत भाव, जिनकी नैचरल अदाकारी के चर्चे आज भी लोग करते हैं। और इन सब से परे यह कि वो एक बहुत अच्छी इंसान थीं। गीता बाली का जन्म अविभाजित पंजाब में एक सिख परिवार में हुआ था। उनका असली नाम था हरकीर्तन कौर। देश के बँटवारे के बाद परिवार बम्बई चली आई और गरीबी ने उन्हे घेर लिया। तभी हरकीर्तन कौर बन गईं गीता बाली और अपने परिवार को आर्थिक संकट से उबारा एक के बाद एक फ़िल्म में अभिनय कर। बम्बई आने से पहले उन्होने पंजाब की कुछ फ़िल्मों में नृत्यांगना के छोटे मोटे रोल किए हुए थे। कहा जाता है कि जब किदार शर्मा, जिन्होने गीता बाली को पहला ब्रेक दिया, पहली बार जब वो उनसे मिले तो वो अपने परिवार के साथ किसी के बाथरूम में रहा करती थीं। किदार शर्मा ने पहली बार गीता बाली को मौका दिया १९४८ की फ़िल्म 'सुहाग रात' में। और इसी फ़िल्म से शुरु हुआ गीता बाली और गीता रॉय का साथ। गीता बाली और गीता दत्त, दोनों ने ही यह साबित किया कि दर्दीले और चुलबुले, दोनों तरह के किरदार और गीत गानें में वो अपनी अपनी जगह पारंगत हैं। १९५१ में गुरु दत्त की पहली हिट फ़िल्म 'बाज़ी' से गीता बाली एक नामचीन अदाकारा बन गईं। देव आनंद ने इस फ़िल्म के बारे में कहा था कि "People came repeatedly to theatres to see Geeta's spirited dancing to "tadbeer se bigdi hui taqdeer bana de". This cemented the bonding between Geeta Bali and Geeta Roy!" शम्मी कपूर गीता बाली की ज़िंदगी में आए जब वे दोनों 'मिस कोका कोला' और 'कॊफ़ी हाउस' जैसी फ़िल्मों में साथ साथ काम कर रहे थे। दोनों ने आगे चलकर शादी कर ली, लेकिन बहुत जल्द गीता बाली इस दुनिया से गुज़र गईं। उस वक़्त शम्मी कपूर 'तीसरी मंज़िल' फ़िल्म में काम कर रहे थे।

गीता बाली की थोड़ी चर्चा हमने की, और अब बारी है आज के गाने की। गीता दत्त की आवाज़ में पेश है गीता बाली पर फ़िल्माया फ़िल्म 'मुजरिम' का गीत "चंदा चांदनी में जब चमके"। वैसे आपको बता दें कि इस फ़िल्म में शम्मी कपूर की नायिका थीं रागिनी; गीता बाली तो बस होटल डान्सर की भूमिका में केवल इसी आइटम सॊंग् में नज़र आईं। इस गीत में गीता बाली को बर्मीज़ लुक्स दिए गए, जिस तरह से हेलेन दिखती थीं। बहुत ही खुशमिजाज़ गीत है और एक बार फिर से ओ. पी. नय्यर साहब की धुन, लेकिन इस बार गीतकार हैं मजरूह सुल्तानपुरी। इस गीत का शुरुआती संगीत काफ़ी हद तक हमें याद दिलाती है "मेरा नाम चिन चिन चू" के शुरुआती संगीत का। तो दोस्तों, आइए गीत को सुना जाए, पिछले दो गीतों की तरह आज भी बारी है झूमने की। गीता दत्त की आवाज़ में इस तरह के गानें इतने अच्छे लगते हैं कि सच में दिल झूम उठता है। ५० के दशक में नय्यर साहब ने बहुत से इस तरह के गानें गीता दत्त से गवाए हैं, जिनमें से बहुत से गानें आज कहीं से बिल्कुल सुनाई नहीं देते हैं। और आज का गीत उन्ही में से एक है। लेकिन पराग जी के प्रयास का नतीजा है कि आज हम इस गीत को एक बार फिर से जी रहे हैं। आइए सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. एक नेपाली इसाई परिवार में जन्मी अभिनेत्री हैं ये जिन पर ये गीत फिल्माया गया है.
२. वो गायिका के भाई थे जिन्होंने इस गीत को संगीत से सजाया.
३. इस युगल गीत के मुखड़े की अंतिम पंक्ति में शब्द है -"कमल".इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी, एक बार फिर आपने पाबला जी को मात देकर बाज़ी मार ली, २१ अंकों के लिए बधाई, पराग जी....आपकी बात सर आँखों पर...सही कहा आपने, सच्चाई यही है.

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, December 1, 2009

किया यह क्या तूने इशारा जी अभी अभी...गीत दत्त के स्वरों में हेलन ने बिखेरा था अपना मदमस्त अंदाज़



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 277

न दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है गीता दत्त के गाए हुए गीतों की ख़ास लघु शृंखला 'गीतांजली', जिसके अन्तर्गत दस ऐसे गानें बजाए जा रहे हैं जो दस अलग अलग अभिनेत्रियों पर फ़िल्माए गए हैं। आज जिस अभिनेत्री को हमने चुना है वो नायिका के रूप में भले ही कुछ ही फ़िल्मों में नज़र आईं हों, लेकिन उन्हे सब से ज़्यादा ख्याति मिली खलनायिका के किरदारों के लिए। सही सोचा आपने, हम हेलेन की ही बात कर रहे हैं। वैसे हेलेन पर ज़्यादातर मशहूर गानें आशा भोसले ने गाए हैं, लेकिन ५० के दशक में गीता दत्त ने हेलेन के लिए बहुत से गानें गाए। आज हमने जिस गीत को चुना है वह है १९५७ की फ़िल्म 'दुनिया रंग रंगीली' से "किया यह क्या तूने इशारा जी अभी अभी, कि मेरा दिल तुझे पुकारा अरे अभी अभी"। राजेन्द्र कुमार, श्यामा, जॉनी वाकर, चाँद उस्मानी, जीवन व हेलेन अभिनीत इस फ़िल्म के गानें लिखे जान निसार अख़्तर ने और संगीत था ओ. पी. नय्यर साहब का। 'आर पार' की सफलता के बाद गीता दत्त को ही श्यामा के पार्श्वगायन के लिए चुना गया। इस फ़िल्म में श्यामा के नायक थे जॉनी वाकर और इस जोड़ी पर कई गानें भी फ़िल्माए गए जिनमें स्वर आशा भोसले का था। आशा जी ने इस फ़िल्म की मुख्य नायिका चाँद उस्मानी का भी पार्श्वगायन किया। ५० के दशक के शुरुआती सालों में नय्यर साहब गीता दत्त से बहुत सारे गानें गवाए थे, लेकिन जैसे जैसे यह दशक समापन की ओर बढ़ता गया, आशा भोसले बनती गईं नय्यर साहब की प्रधान गायिका। १९५८ की फ़िल्म 'हावड़ा ब्रिज' में नय्यर साहब ने गीता जी से केवल दो गीत गवाए जो हेलेन पर फ़िल्माए गए। इनमें से एक था "मेरा नाम चिन चिन चू" जिसने गीता दत्त और हेलेन, दोनों को लोकप्रियता की बुलंदी पर बिठाया।

वापस आते हैं आज के गीत पर। आज का यह गीत कहीं खो ही गया था, लेकिन १९९२ में एच. एम. वी (अब आर. पी. जी) ने "Geeta Dutt sings for OP Nayyar" नामक कैसेट में इस गीत को शामिल किया और इस तरह से यह गीत एक बार फिर से गीता दत्त और नय्यर साहब के चाहनेवालों के हाथ लग गई। यह गीत एक साधारण गीत होते हुए भी बहुत असरदार है जो एक चुलबुली हवा के झोंके की तरह आती है और गुदगुदाकर चली जाती है। गीता जी का ख़ास अंदाज़ इस तरह के गीतों में चार चाँद लगा देती थी। एक तरफ़ गीता जी का नशीला अंदाज़ और दूसरी तरफ़ हेलेन जॉनी वाकर को इस गीत में शराब पिलाकर फाँसने की कोशिश कर रही है। भले ही इस गीत के ज़रिए हेलेन जॉनी वाकर को बहकाने की कोशिश कर रही है लेकिन ना तो गीता जी की गायकी में कोई अश्लीलता सुनाई देती है और ना ही हेलेन के अंदाज़ और अभिनय में। इस गीत में हेलेन के डांस स्टेप्स हमें याद दिलाती हैं फ़िल्म 'अलबेला' में सी. रामचंद्र के धुनों पर थिरकते हुए गीता बाली और भगवान की। नय्यर साहब का संगीत संयोजन हर गीत में कमाल का रहा है। इस गीत के इंटर्ल्युड म्युज़िक में भी उनका हस्ताक्षर साफ़ सुनाई देता है। तो आइए सुनते हैं फ़िल्म 'दुनिया रंग रंगीली' का गीत। इस फ़िल्म का नाम याद आते ही पंकज मल्लिक की आवाज़ में "दुनिया रंग रंगीली बाबा" जैसे दिल में बज उठती है। यह गीत भी भविष्य में सुनेंगे, लेकिन आज बहक जाइए गीता दत्त और हेलेन के नशीले अंदाज़ में।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस अभिनेत्री का मूल नाम था हरकीर्तन कौर.
२. मजरूह के बोलों को धुनों में पिरोया है उस संगीतकार ने जिन्होंने गीत दत्त के शुरूआती करियर में अहम् भूमिका निभाई थी
३. मुखड़े में शब्द है -"चांदनी".इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी अच्छा लगा आपको वापस देखकर, १८ अंक हुए आपके, बधाई...

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ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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