Monday, March 7, 2011

लुका छुपी खेले आओ....खेलों से याद आते हैं न वो मासूम से खेल बचपन के जिनमें हार भी अपनी होती थी और जीत भी



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 607/2010/307

दोस्तों, इन दिनों आप ६ बजे ऒफ़िस की छुट्टी हो जाने के साथ ही भाग निकलते होंगे अपने अपने घर की तरफ़। अरे भई घर पहुँचकर टीवी जो ऒन करना है और क्रिकेट मैच जो देखना है! तो फिर शायद ६:३० बजे आपका 'आवाज़' पर पधारना भी नहीं होता होगा। लेकिन 'आवाज़ वेब रेडिओ सर्विस' की खासियत है कि इसमें पोस्ट होने वाले गीत व आलेख आप जब कभी भी मन करे सुन और पढ़ सकते हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार, और आज 'खेल खेल में' शृंखला की सातवीं कड़ी में हम चर्चा करेंगे कि प्रथम क्रिकेट विश्वकप से पहले क्रिकेट का कैसा सीन हुआ करता था। क्या आपको पता है कि विश्व का पहला अंतर्राष्ट्रीय मैच कनाडा और संयुक्त राष्ट्र अमरीका के बीच २४ और २५ सितंबर १८४४ में खेला गया था। पहला टेस्ट मैच १८७७ में ऒस्ट्रेलिया और इंगलैण्ड के बीच खेला गया था और अगले कई सालों तक बस यही दो देश क्रिकेट मैच खेलते आये। १८८९ में दक्षिण अफ़्रीका को टेस्ट क्रिकेट का दर्जा नसीब हुआ। १९०० के पैरिस ऒलीम्पिक खेल में क्रिकेट को शामिल कर लिया गया, जिसमें ग्रेट ब्रिटेन ने फ़्रांस को हराकर स्वर्णपदक अपने नाम किया। यह पहली और आख़िरी बार के लिए क्रिकेट ऒलीम्पिक खेल का हिस्सा बना था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार बहुदेशीय क्रिकेट प्रतियोगिता सन् १९१२ में आयोजित हुई इंगलैण्ड, ऒस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ़्रीका के बीच। इस सीरीज़ को ज़्यादा सफलता नहीं मिली क्योंकि गरमी के दिनों में खेली गयी यह सीरीज़ बारिश की वजह से काफ़ी हद तक प्रभावित हुआ। इसके बाद एक एक करके और भी कई देश जुड़ते चले गये अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट के साथ - वेस्ट इंडीज़ (१९२८), न्युज़ीलैण्ड (१९३०), भारत (१९३२), पाकिस्तान (१९५२) आदि।

जीवन में खेल-कूद का बहुत बड़ा महत्व है। और बच्चों व युवाओं के लिए तो खेल-कूद अपनी दिनचर्या का एक अभिन्न अंग होना ही चाहिए। खेलने से न केवल शारीरिक विकास अच्छी तरह से होता है, बल्कि मन-मस्तिष्क में भी स्फूर्ति आती है, और दिमाग़ बहुत अच्छी तरह से विकसित होता है। अंग्रेज़ी में भी तो कहावत है कि "all work and no play, makes John a dull boy"| आजकल की बढ़ती प्रतियोगिता और पढ़ाई-लिखाई में दबाव की वजह से बच्चे खेल के मैदान से दूर होते चले जा रहे हैं। और जो बचा खुचा वक़्त मिलता है, उसे वो कम्प्युटर गेम्स खेलने में या कार्टून देखने में लगा देते हैं। और कुछ अभिभावक तो ऐसे भी हैं कि बच्चे को इसलिए खेल-कूद नहीं करने देते ताकि पढ़ाई लिखाई के लिए और ज़्यादा समय मिल सके। उन सभी अभिभावकों से हाथ-जोड़ निवेदन है कि ऐसा कतई न करें। अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा शारिरिक और मानसिक रूप से मज़बूत बने, स्वस्थ रहे, तो उसे पढ़ाई के साथ साथ खेल-कूद और शारीरिक व्यायाम की तरफ़ की प्रोत्साहित करें। आज जब हम बच्चों की बात छेड़ ही चुके हैं, तो क्यों ना एक ऐसे खेल पर आधारित गीत सुनें जिसका रिश्ता छोटे बच्चों से ही है। जी हाँ, आँख मिचौली, या लुका-छुपी। इस खेल पर कई गीत बने हैं जैसे कि "लुक छिप लुक छिप जाओ ना" (दो अंजाने), "आ मेरे हमजोली आ, खेलें आँख मिचौली आ" (जीने की राह) वगेरह। लेकिन आज के लिए हमने जो गीत चुना है वह है फ़िल्म 'ड्रीम गर्ल' का, "लुका छुपी खेलें आओ"। लता मंगेशकर, पद्मिनी और शिवांगी की आवाज़ों में यह गीत हेमा मालिनी पर फ़िल्माया गया था। आनंद बक्शी साहब के बोल और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत। चलिए इन बच्चों के साथ बच्चे बन कर आज एक अरसे के बाद आप और हम, सभी मिलकर खेलें लुका छुपी।



क्या आप जानते हैं...
कि कई क्रिकेट खिलाड़ियों ने हिंदी फ़िल्मों में अभिनय किया है, जिनमें शामिल है संदीप पाटिल (कभी अजनबी थे), सुनिल गावस्कर (मालामाल), खेल (अजय जडेजा) आदि।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 11
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - आसान है.

सवाल १ - कौन सी गायिका ने साथ निभाया है आशा जी का इस गीत में - ३ अंक
सवाल २ - फिल्म में किस अभिनेता की एक से अधिक भूमिका थी - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म के निर्देशक बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अरे बाप रे एक बार फिर अमित जी आगे निकल गए, अंजना जी ऐसे में अपना कमेन्ट हटा कर २ अंक वाले सवाल का जवाब क्यों नहीं देते ये बात हम नहीं समझ पाते....खैर अभी मौका है वापसी का

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, March 6, 2011

मैदान है हरा, भीड़ से भरा खेलने चल दिए ग्यारह....और रोमांच से भरे कई मुकाबले हम अब तक इस वर्ल्ड कप में देख ही चुके हैं



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 606/2010/306

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के एक नए सप्ताह के साथ हम हाज़िर हैं दोस्तों। सप्ताह नया ज़रूर है, लेकिन चर्चा वही है जो पिछले सप्ताह रही, यानी क्रिकेट विश्वकप की। 'खेल खेल में' लघु शृंखला में आइए आज सब से पहले बात करते हैं विश्वकप ट्रॊफ़ी की। ICC क्रिकेट विश्वकप की ट्रॊफ़ी एक रनिंग् ट्रॊफ़ी है जो विजयी टीम को दी जाती है। इसका डिज़ाइन गरार्ड ऐण्ड कंपनी ने दो महीने के अंदर किया था। असली ट्रॊफ़ी को ICC के दुबई हेडक्वार्टर्स में सुरक्षित रखा गया है जब कि विजयी दल को इसकी एक प्रति दी जाती है। असली और प्रति में फ़र्क बस इतना है कि असली ट्रॊफ़ी में पूर्व विजयी देशों के नाम खुदाई किए हुए है। और अब २०११ विश्वकप के प्राइज़ मनी की बात हो जाए! २०११ क्रिकेट विश्वकप का विजयी दल अपने साथ घर ले जाएगा ३ मिलियन अमरीकी डॊलर्स; रनर-अप को मिलेंगे १.५ मिलियन अमरीकी डॊलर्स। लेकिन सुनने में आया है कि ICC इस राशी को दुगुना करने वाली हैं इसी विश्वकप में। यह निर्णय दुबई में २० अप्रैल २०१० के ICC बोर्ड मीटिंग् में लिया गया था। २०११ विश्वकप में १८ अम्पायर खेलों का संचालन कर रहे हैं, और इनके अतिरिक्त एक रिज़र्व अम्पायर एनामुल हक़ को भी रखा गया है। २०११ विश्वकप में अम्पायरिंग् करने वाले अम्पायरों के नाम इस प्रकार है:

ऒस्ट्रेलिया - सायमन टॊफ़ेल, स्टीव डेविस, रॊड टकर, डैरील हार्पर, ब्रुस ऒग्ज़ेनफ़ोर्ड
न्यु ज़ीलैण्ड - बिली बाउडेन, टॊनी हिल
दक्षिण अफ़्रीका - मराइस एरस्मस
पाकिस्तान - अलीम दर, असद रौफ़
भारत - शवीर तारापुर, अमिष साहेबा
इंगलैण्ड - इयान गूल्ड, रिचार्ड केटलबोरो, नाइजेल लॊंग्
श्रीलंका - अशोक डी'सिल्वा, कुमार धर्मसेना
वेस्ट इंडीज़ - बिली डॊट्रोव

दोस्तों, क्रिकेट पर बनने वाली फ़िल्मों की जब बात आती है, तो जिन चंद फ़िल्मों के नाम सब से पहले ज़ुबान पर आते हैं, वो हैं 'मालामाल', 'ऒल राउण्डर', 'अव्वल नंबर', 'लगान', 'इक़बाल' और 'हैट्रिक'। हाल में रिलीज़ हुई 'पटियाला हाउस' भी इसी श्रेणी में अपना नाम दर्ज करवाने वाली है। ये सभी फ़िल्में उस दौर की हैं कि जब फ़िल्म संगीत का सुनहरा युग बीत चुका था। लेकिन दोस्तों, क्योंकि यह शृंखला २०११ क्रिकेट विश्वकप को केन्द्रबिंदु में रख कर प्रस्तुत किया जा रहा है, ऐसे में अगर एक गीत हम क्रिकेट के नाम ना करें तो कुछ मज़ा नहीं आ रहा। इसलिए आज के अंक के लिए हमने चुना है १९९० की फ़िल्म 'अव्वल नंबर' का एक गीत, जिसके बोल हैं "ये है क्रिकेट"। वैसे दोस्तों, ५० के दशक में कम से कम एक फ़िल्म ऐसी ज़रूर आयी थी जिसमें क्रिकेट खेल पर एक गीत था। आगे चलकर इस गीत को हम शामिल करेंगे एक ख़ास प्रस्तुति के रूप में। वापस आते हैं 'अव्वल नंबर' पर। 'अव्वल नंबर' देव आनंद की फ़िल्म थी, निर्देशन भी उनका ही था, और जिसमें उनके अलावा अभिनय किया था आमिर ख़ान, आदित्य पंचोली, एक्ता सोहिनी और नीता पुरी प्रमुख। फ़िल्म की कहानी क्रिकेट और क्रिकेटर्स पर ही केन्द्रित थी जिसे लिखा भी देव साहब ने ही था। फ़िल्म में संगीत था बप्पी लाहिड़ी का और फ़िल्म के तमाम गानें ख़ूब चले थे उस ज़माने में। अगर आपको याद नहीं आ रहा तो इस फ़िल्म का सब से हिट गीत था "पूछो ना कैसा मज़ा आ रहा है", अमित कुमार और एस. जानकी की आवाज़ों में। आज का प्रस्तुत गीत गाया है बप्पी लाहिड़ी, अमित कुमार और उदित नारायण ने। इस फ़िल्म में आमिर ख़ान का प्लेबैक अमित कुमार ने किया था, लेकिन इस गीत में अमित कुमार बने आदित्य पंचोली की आवाज़ और देव साहब के लिए गाया बप्पी दा ने। 'क़यामत से क़यामत तक' से आमिर ख़ान की आवाज़ बने उदित नारायण ने इस गीत में भी उनके लिए ही गाया था। "मैदान है हरा, भीड़ से भरा, खेलने चल दिए हैं ग्यारह, विकेट है गड़े, तैयार हम खड़े, खेल शुरु होगा पौने ग्यारह, ये है क्रिकेट, ये है क्रिकेट"। तो लीजिए क्रिकेट फ़ीवर को बरकरार रखते हुए सुनते हैं आज का यह गीत जिसे लिखा है गीतकार अमित खन्ना ने।



क्या आप जानते हैं...
कि १९९० और २००० के दशकों में देव आनंद ने जिन फ़िल्मों का निर्माण किया था, उनके नाम हैं - अव्वल नंबर (१९९०), प्यार का तराना (१९९३), गैंगस्टर (१९९४); मैं सोलह बरस की (१९९८), सेन्सर (२००१), लव ऐट टाइम्स स्कुएर (२००३), मिस्टर प्राइम मिनिस्टर (२००५), और चार्जशीट (२००९)।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 11
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - आसान है.

सवाल १ - किस खूबसूरत अभिनेत्री पर है ये गीत - २ अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक कौन हैं - ३ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वही जबरदस्त मुकाबला जारी है....शानदार

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

शततंत्री वीणा से आधुनिक संतूर तक, वादियों की खामोशियों को सुरीला करता ये साज़ और निखरा पंडित शिव कुमार शर्मा के संस्पर्श से



सुर संगम - 10 - संतूर की गूँज - पंडित शिव कुमार शर्मा

इसके ऊपरी भाग पर लकड़ी के पुल से बने होते हैं जिनके दोनों ओर बने कीलों से तारों को बाँधा जाता है। संतूर को बजाने के लिए इन तारों पर लकड़ी के बने दो मुंगरों (hammers) - जिन्हें 'मेज़राब' कहा जाता है, से हल्के से मार की जाती है।


विवार की मधुर सुबह हो, सूरज की सुनहरी किरणे हल्के बादलों के बीच से धरती पर पड़ रही हों, हाथ में चाय का प्याला, बाल्कनी पर खड़े बाहर का नज़ारा ताकते हुए आप, और रेडियो पर संगीत के तार छिड़े हों जिनमें से मनमोहक स्वरलहरियाँ गूँज रही हों! सुर-संगम की ऐसी ही एक संगीतमयी सुबह में मैं सुमित आप सभी संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ| हम सभी ने कई अलग-अलग प्रकार के वाद्‍य यंत्रों की ध्वनियाँ सुनी होंगी| पर क्या आपने कभी इस बात पर ग़ौर किया है कि कुछ वाद्‍यों से निकली ध्वनि-कंपन सपाट(flat) होती है जैसे कि पियानो या वाय्लिन से निकली ध्वनि; जबकि कुछ वाद्‍यों की ध्वनि-कंपन वृत्त(round) होती है तथा अधिक गूँजती है। आज हम ऐसे ही एक शास्त्रीय वाद्‍य के बारे में चर्चा करेंगे जिसका उल्लेख वेदों में "शततंत्री वीणा" के नाम से किया गया है। जी हाँ! मैं बात कर रहा हूँ भारत के एक बेहद लोकप्रिय व प्राचीन वाद्‍य यंत्र - संतूर की। आइये, संतूर के बारे में और जानने से पहले आनंद लें पंडित शिव कुमार शर्मा द्वारा प्रस्तुत इस पहाड़ी धुन का।

संतूर पर डोगरी धुन - पं. शिव कुमार शर्मा


'संतूर' एक फ़ारसी शब्द है तथा शततंत्री वीणा को अपना यह नाम इसके फ़ारसी प्रतिरूप से ही मिला है| फ़ारसी संतूर एक विषम-चतुर्भुज (trapezoid) से आकार का वाद्‍य है जिसमें प्रायः ७२ तारें होती हैं। इसकी उत्पत्ती लगभग १८०० वर्षों से भी पूर्व ईरान में मानी जाती है परन्तु आगे जाकर यह एशिया के कई अन्य देशों में प्रचलित हुआ जिन्होंने अपनी-अपनी सभ्यता-संस्कृति के अनुसार इसके रूप में परिवर्तन किए। भारतीय संतूर फ़ारसी संतूर से कुछ ज़्यादा आयताकार (rectangular) होता है और यह आमतौर पर अखरोट की लकड़ी का बना होता है। इसके ऊपरी भाग पर लकड़ी के पुल से बने होते हैं जिनके दोनों ओर बने कीलों से तारों को बाँधा जाता है। संतूर को बजाने के लिए इन तारों पर लकड़ी के बने दो मुंगरों (hammers) - जिन्हें 'मेज़राब' कहा जाता है, से हल्के से मार की जाती है। इसे अर्धपद्मासन में बैठकर तथा गोद में रखकर बजाया जाता है। यह मूल रूप से कश्मीर का लोक वाद्‍य है जिसे सूफ़ी संगीत में इस्तेमाल किया जाता था। तो आइये देखें और सुनें कि फ़ारसी संतूर भारतीय संतूर से किस प्रकार भिन्न है - इस वीडियो के ज़रिये।

फ़ारसी संतूर


हमारे देश में जहाँ भी संतूर के बारे में चर्चा की जाती है - वहाँ एक नाम का उल्लेख करना अनिवार्य बन जाता है। आप समझ ही गये होंगे कि मेरा इशारा किन की ओर है? जी हाँ! आपने ठीक पहचाना, मैं बात कर रहा हूँ भारत के सुप्रसिद्ध संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा की। इनका जन्म १३ जनवरी १९३८ को जम्मू में हुआ तथा इनकी माता जी श्रीमती ऊमा दत्त शर्मा स्वयं एक शास्त्रीय गायिका थीं जो बनारस घराने से ताल्लुक़ रखती थीं। मात्र ५ वर्ष कि अल्पायु से ही पंडित जी ने अपने पिता से गायन व तबला वादन सीखना प्रारंभ कर दिया था। अपने एक साक्षात्कार में वे बताते हैं कि उनकी माँ का यह सपना था कि वे भारतीय शास्त्रीय संगीत को संतूर पर बजाने वाले प्रथम संगीतज्ञ बनें। इस प्रकार उन्होंने १३ वर्ष की आयु में संतूर सीखना शुरू कर दिया तथा अपनी माँ का सपना पूरा किया। बम्बई में वर्ष १९५५ में उन्होंने अपनी प्रथम सार्वजनिक प्रस्तुति दी। आज संतूर की लोकप्रियता का सर्वाधिक श्रेय पंडित जी को ही जाता है। उन्होंने संतूर को शास्त्रीय संगीत के अनुकूल बनाने के लिये इसमें कुछ परिवर्तन भी किये। जहाँ तक पुरस्कारों की बात है - पंडित शिव कुमार शर्मा को कई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष १९८५ में उन्हें अमरीका के बॊल्टिमोर शहर की सम्माननीय नागरिकता प्रदान की गई। इसके पश्चात्‍ वर्ष १९८६ में 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार', वर्ष १९९१ में 'पद्मश्री पुरस्कार' तथा वर्ष २००१ में 'पद्म विभूषण पुरस्कार' से उन्हें सम्मानित किया गया। अपने अनोखे संतूर वादन की कला-विरासत उन्होंने अपने सुपुत्र राहुल को भी अपना शिष्य बनाकर प्रदान की तथा पिता-पुत्र की इस जोड़ी ने वर्ष १९९६ से लेकर आज तक कई सार्वजनिक प्रस्तुतियाँ दी हैं। क्यों न हम भी इन दोनों की ऐसी ही एक मनमोहक प्रस्तुति का आनन्द लें इस वीडियो के माध्यम से।

पं. शिव कुमार शर्मा व राहुल शर्मा - जुगलबंदी



और अब बारी इस बार की पहेली की। 'सुर-संगम' की आगामी कड़ी से हम इसमें एक और स्तंभ जोड़ने जा रहे हैं - वह है 'लोक संगीत' जिसके अन्तर्गत हम भारत के भिन्न-भिन्न प्रांतों के लोक संगीत से आपको रू-ब-रू करवाएँगे। तो ये रहा इस अंक का सवाल जिसका आपको देना होगा जवाब तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। 'सुर-संगम' के ५०-वे अंक तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी तरफ़ से।

"इस समुदाय के गवैये-बजैये मुस्लिम होते हुए भी अपने अधिकतम गीतों में हिंदु देवी-देवताओं की तथा हिंदु त्योहारों की बढ़ाई करते हैं और 'खमाचा' नामक एक खास वाद्‍य क प्रगोग करते हैं। तो बताइए हम किस प्रांत के लोक संगीत की बात कर रहे हैं?"

पिछ्ली पहेली का परिणाम: कृष्‍णमोहन जी ने बिल्कुल सटीक उत्तर देकर ५ अंक अर्जित कर लिये हैं, बधाई!

हमारे और भी श्रोता व पाठक आने वाली कड़ियों को सुनें, पढ़ें तथा पहेलियों में भाग लें, इसी आशा के साथ, हम आ पहुँचे हैं 'सुर-संगम' की आज की कड़ी की समाप्ति पर। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, इसपर अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। आगामि रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने मित्र सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए, नमस्कार!

प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Saturday, March 5, 2011

ओल्ड इस गोल्ड - शनिवार विशेष - अभिनेत्री व फ़िल्म-निर्मात्री आशालता के जीवन की कहानी उन्हीं की सुपुत्री शिखा बिस्वास वोहरा की जुबानी



नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' की ३१-वीं कड़ी में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। आज हम आपको मिलवा रहे हैं एक ऐसी शख्सियत से जिनकी माँ ना केवल हिंदी सिनेमा की पहली पीढ़ी की एक जानीमानी अदाकारा रहीं, बल्कि अपने एक निजी बैनर तले कई फ़िल्मों का निर्माण भी किया। इस अदाकारा और फ़िल्म निर्मात्री को हम आशालता के नाम से जानते हैं। जी हाँ, वही आशालता बिस्वास जिन्हें आप मशहूर संगीतकार अनिल बिस्वास की पहली पत्नी के रूप में ज़्यादा जानते हैं। इसे हम अफ़सोस की बात ही कहेंगे कि आशालता जी के बारे में बहुत कम और ग़लत जानकारियाँ दुनिया को मिल पायी है, कारण चाहे कोई भी हो। लेकिन हक़ीक़त यह है कि आशालता जी का अपना भी एक अलग व्यक्तित्व था, अपनी अलग पहचान थी, और इस बात का अंदाज़ा आपको इस साक्षात्कार को पढ़ने के बाद हो जाएगा। आशालता जी के बारे में विस्तार से बातचीत करने के लिए 'हिंद-युग्म' की तरफ़ से हमने आमंत्रित किया उनकी सुपुत्री शिखा बिस्वास वोहरा जी को। तो आइए आपको मिलवाते हैं आशालता जी और अनिल दा की सुपुत्री शिखा बिस्वास वोहरा जी से।

********************************

सुजॊय - शिखा जी, बहुत बहुत स्वागत है आपका 'हिंदयुग्म' पर, और बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने हमारे इस निमंत्रण को स्वीकारा, और आशालता जी के बारे में विस्तार से हमारे पाठकों को बताने के लिए राज़ी हुईं।

शिखा - आपका बहुत धन्यवाद जो आपने अपने फ़ोरम में मुझे बुलाया। सब से पहले मैं यह कहना चाहूँगी कि बच्चे अपने माता-पिता के काम के बारे में बहुत कम ही बातचीत करते हैं और हम भी दूसरे बच्चों से अलग नहीं थे। हमने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा आ जाएगा कि ये सब बातें इतिहास बन जाएँगी या इन सब बातों को जानने में लोगों की दिलचस्पी होगी। माँ-बाप चाहे बाहर कितने भी लोकप्रिय या पब्लिक फ़िगर हों, बच्चों के लिए तो वो केवल माँ-बाप ही होते हैं। सिनेमा के रसिक उनके बारे में ज़्यादा जानकारी रखते हैं, इसलिए आपके इस मुहिम में शायद मैं बहुत ज़्यादा कारगर न साबित हो सकूँ।

सुजॊय - शिखा जी, आशालता जी उस पीढ़ी की अभिनेत्री थीं जब बोलती फ़िल्मों की बस शुरुआत ही हुई थी। जब मैंने इंटरनेट पर उपलब्ध आशालता जी की फ़िल्मोग्राफ़ी पर नज़र दौड़ाई, तो पाया कि उनकी पहली फ़िल्में थीं 'सजीव मूर्ती', 'आज़ादी' और 'सती तोरल', और ये फ़िल्में आईं थीं सन् १९३५ में। क्या आप बता सकती हैं कि क्या वाक़ई आशालता जी १९३५ में लौंच हुईं थीं?

शिखा - 'आज़ादी' का निर्माण १९३४ में शुरु होकर फ़िल्म १९३५ में रिलीज़ हुई थी, इसलिए यही फ़िल्म शायद उनकी डेब्यु फ़िल्म थी, और इसमें उनके नायक थे विजय कुमार। उस वक़्त आशालता जी की उम थी १८ वर्ष।

सुजॊय- क्या आशालता जी ने कभी आपको बताया कि उनका सिनेमा में पदार्पण किस तरह से हुआ था?

शिखा - न उन्होंने कभी इसके बारे में हमें बताया और न ही हमने कभी उनसे यह पूछा। लेकिन जितना मुझे मालूम है, वो और शोभना समर्थ क्लासमेट्स थीं और बहुत अच्छे दोस्त भी। इसलिए हो सकता है कि वे दोनों एक ही समय पर फ़िल्मी मैदान में उतरी होंगी। शोभना समर्थ जी के अंकल एक फ़ोटो-स्टुडिओ चलाते थे 'देवारे' नाम से।

सुजॊय - मैंने सुना है कि आशालता जी का असली नाम था मेहरुन्निसा। जहाँ तक एक फ़िल्मी नायिका के नाम का सवाल है, इस नाम में कोई ख़ामी नहीं थी। फिर उन्होंने अपना नाम क्यों बदला होगा, क्या इसके बारे में आप कुछ बता सकती हैं?

शिखा - उनका असली नाम था मेहरुन्निसा भगत। शायद उन्होंने या फ़िल्म के निर्माता ने उनका नाम बदल दिया होगा क्योंकि उन दिनों यह एक रवायत थी।

सुजॊय - ये जो तीन फ़िल्मों का ज़िक्र हमने अभी किया, वे सभी 'शक्ति मूवीज़' के बैनर तले निर्मित फ़िल्में थीं। उस ज़माने में फ़िल्मी कलाकार फ़िल्म कंपनी के कर्मचारी हुआ करते थे जिन्हें मासिक तौर पर तनख्वा मिलती थी। तो क्या आशालता जी भी 'शक्ति मूवीज़' में कार्यरत थीं?

शिखा - मुझे नहीं लगता कि उनका किसी स्टुडिओ विशेष से कोई अनुबंधन था, बल्कि फ़िल्म निर्माण के दौरान उन्हें उस कंपनी से मासिक तनख्वा मिला करती होगी।

सुजॊय - शायद आप ठीक कह रही हैं, क्योंकि अगले ही साल, यानी १९३६ से वो कई बैनरों की फ़िल्मों में नज़र आयीं, जैसे कि 'गोल्डन ईगल', 'ईस्टर्ण आर्ट्स', 'सागर मूवीटोन', 'दर्यानी प्रोडक्शन्स' आदि। अच्छा, १९३६ की बात करें तो इस साल 'शेर का पंजा' और 'पिया की जोगन' जैसी फ़िल्में उनकी आयीं, जिनमें संगीत आपके पिता श्री अनिल बिस्वास जी का था। तो यह बताइए कि आशालता जी अनिल दा से कब मिलीं? क्या इन्ही दो फ़िल्मों के निर्माण के दौरान या उससे पहले?

शिखा - अनिल बिस्वास 'मनमोहन' फ़िल्म के संगीतकार के सहायक थे, जिसका निर्माण १९३५ से ही शुरु हो चुका था। इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि वे दोनों तभी मिले होंगे और दोनों ने शादी की १९३६ में।

सुजॊय - अच्छा शिखा जी, वह ३० का दशक कुंदन लाल सहगल साहब का दशक था, और १९४० में एक बहुत ही मशहूर फ़िल्म आयी थी 'ज़िंदगी' जिसमें सहगल साहब मुख्य भूमिका में थे। इस फ़िल्म में आशालता जी ने भी अभिनय किया था। क्या उन्होंने आपको इस फ़िल्म के बारे में या सहगल साहब के बारे में कुछ बताया?

शिखा - जी नहीं, उन्होंने कभी ऐसा कुछ ज़िक्र नहीं किया कि इस फ़िल्म में उनका सहगल साहब के साथ कोई सीन था।

सुजॊय - १९३७ में आशालता जी की एक मशहूर फ़िल्म आयी थी 'प्रेमवीर', जिसका निर्माण हिंदी और मराठी, दोनों में हुआ था। यह बताइए कि क्या आशालता जी ने इस फ़िल्म के लिए मराठी सीखा था? उनकी मातृभाषा क्या थी?

शिखा - 'प्रेमवीर', मास्टर विनायक के साथ। नंदा जी के पिता मास्टर विनायक जी के लिए उनके दिल में बहुत सम्मान था। वो ख़ुद बहुत अच्छा मराठी, गुजराती और सिंधी बोल लेती थीं और शादी के बाद बंगला भी सीख गई थीं। वो मूलत: भुज की थीं और उनकी मातृभाषा थी कच्छी।

सुजॊय - फ़िल्मों से संन्यास लेने के एक अरसे बाद वो फिर से नज़र आयीं गुजराती फ़िल्म 'मारे जावुण पेले पार' फ़िल्म में जो १९६८ में बनी थी। इस फ़िल्म के लिए उन्हें न्योता कैसे मिला?

शिखा - दरअसल १९६६ में उन्होंने एक फ़िल्म 'श्रीमान फ़ंटूश' का निर्माण किया था अपने भाई के बैनर तले और जिसमें उन्होंने किशोर कुमार के माँ का किरदार भी निभाया था। उसी दौरान मुझे भी एक फ़िल्म 'फिर वही आवाज़' में नायिका बनने का ऒफ़र आया था जिसमें सुजीत कुमार नायक थे, और उस फ़िल्म के निर्देशक थे शांतिलाल सोनी, जो कि एक गुजराती थे। उन्होंने मेरी मम्मी को रेकमेण्ड किया उस रोल के लिए। वह फ़िल्म बहुत बड़ी हिट साबित हुई और उसका हिंदी में री-मेक हुआ 'खिलौना' शीर्षक से, जिसमें अरुणा इरानी वाला किरदार मुमताज़ ने निभाया।

सुजॊय - एक फ़िल्म निर्मात्री के रूप में आशालता जी के करीयर को देखें तो उन्होंने कुछ यादगार म्युज़िकल फ़िल्मों का निर्माण किया है जैसे कि 'लाडली', 'बड़ी बहू', 'लाजवाब', 'हमदर्द', 'बाज़ूबंद', जो अपने ज़माने के हिट फ़िल्में हैं। इन सब फ़िल्मों के बारे में आप क्या जानती हैं?

शिखा - देखिए वो हमेशा से ही एक ऐक्टिव पर्सन रही हैं अपने प्रोफ़ेशनल लाइफ़ में। वो काम करना चाहती थीं, लेकिन दो बच्चों के जन्म के बाद वो अभिनय से संयास लेना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने अभिनय को छोड़ कर फ़िल्म निर्माण का काम ले लिया और अपने बैनर 'वरायटी पिक्चर्स' की स्थापना की। मैं एक बात ज़रूर कहना चाहूँगी कि उन्होंने फ़िल्म निर्माण के हर पहलु को वो ख़ुद परखती थीं, रोज़ ऒफ़िस जाना, और पूरे शिड्युल को बकायदा मेण्टेन करना। निम्मी, शेखर, सुलोचना चटर्जी जैसे कलाकारों के साथ उनका रिश्ता बहुत ही अच्छा था। मैं अक्सर उनके साथ आउटडोर जाया करती थी जैसे कि पंचगनी और महाबलेश्वर। एक बार किसी डान्स सिक्वेन्स के शूटिंग् के दौरान मैं ग़लती से कैमरे के फ़्रेम में आ गई और जुनियर आर्टिस्ट्स के साथ डान्स करने लग पड़ी। फ़िल्म के निर्देशक 'कट' बोलने ही वाले थे कि उन्होंने कैमरा चलते रहने का इशारा किया। उनकी ज़्यादातर फ़िल्में 'रणजीत' और दादर के 'श्री साउण्ड स्टुडिओ' में शूट हुआ करती थी। मुझे याद है कि फ़िल्म 'बड़ी बहू' के गीत "मेरे दिल की धड़कन में" और "सपने तुझे बुलाये" का डान्स रिहर्सल हमारे घर के बैठकखाने में हुई थी। और रिहर्सल कर रहे थे गोपी कृषन और स्मृति बिस्वास; और बाद में इनका फ़िल्मांकन 'फ़ेमस स्टुडिओ महालक्ष्मी' में हुआ, जहाँ पर मम्मा ने अपना ऒफ़िस बाद में शिफ़्ट कर लिया था।

सुजॊय - बहुत ही हसीन यादें जुड़ी हुई होगी इनके साथ, है न? तो क्यों न यहाँ पर हम फ़िल्म 'बड़ी बहू' का एक गाना सुन लें!

गीत - मीठी मीठी निंदिया आई रे (बड़ी बहू)


सुजॊय - अच्छा शिखा जी, जैसा कि आपने बताया कि आपके घर पर फ़िल्मों के रिहर्सल हुआ करते थे, तो यह बताइए कि किस तरह का माहौल हुआ करता था?

शिखा - बहुत ही मज़ेदार होते थे वो दिन कि जब बाबा खाना बनाते थे सभी के लिए और जैसे घर पर एक पिकनिक का माहौल बन जाता था। उस ज़माने में फ़िल्म से जुड़े सभी लोग आपस में एक दूसरे के बहुत नज़दीक हुआ करते थे और एक परिवार की तरह काम किया करते थे। मुझे याद है बाबा ने 'हमदर्द' में एक गेस्ट अपीयरेन्स दिया था, उन्होंने एक नाई की भूमिका निभाई थी। और जितना मुझे याद है 'मेहमान' में उन्होंने एक पुजारी का रोल निभाया था और उन पर एक गीत भी फ़िल्माया गया था "खोल दे पुजारी द्वार खोल दे"।

सुजॊय - अरे वाह! यह तो वाक़ई दुर्लभ जानकारी है! शिखा जी, हमनें कोशिशें तो बहुत की थी कि इस गीत का विडिओ कहीं से ढूंढ सकें, लेकिन अफ़सोस कि कहीं पर हम इसे खोज नहीं पाये। भविष्य में कभी अगर हमारे हाथ लगा तो आप के साथ भी और अपने श्रोता-पाठकों के साथ भी ज़रूर बाँटेंगे। लेकिन फ़िल्हाल यहाँ पर हम अपने पाठकों को फ़िल्म 'मेहमान' का पोस्टर ज़रूर दिखा सकते हैं जिसे आपके सौजन्य से ही हमें प्राप्त हुआ है, जिसके लिए हम आपके आभारी हैं।

शिखा - पता है 'वरायटी पिक्चर्स' का जो लोगो था, उसे भी बाबा ने ही डिज़ाइन किया था, एक ढोलक के उपर विराजमान माँ सरस्वती, जिसके दोनों तरफ़ तानपुरे से सहारा दिया गया है। इस लोगो का एक रेप्लिका हमारे बैठकखाने की दीवार पर टंगा होता था।

सुजॊय - 'लाजवाब' फ़िल्म के बारे में कुछ बताइए।

शिखा - फ़िल्म 'लाजवाब' का निर्माण रेस-कोर्स में हुई जीत के पैसे से हुआ था। 'लाजवाब' नाम से एक घोड़ा था जिस पर ममा ने बाज़ी रखी थी। यह घोड़ा अभिनेता मोतीलाल जी का था। और इस तरह से फ़िल्म का नाम भी 'लाजवाब' रख लिया गया।

सुजॊय - यह तो वाक़ई दिलचस्प बात है। 'हमदर्द' फ़िल्म भी एक यादगार फ़िल्म थी अनिल दा के करीयर की। इस फ़िल्म से जुड़ी क्या यादें हैं आपकी?

शिखा - 'हमदर्द' की रचनात्मक रागमाला "ऋतु आये ऋतु जाये", जो बाबा की जीवनी का भी शीर्षक बना, हमारे घर में लगभग तीन हफ़्तों तक इसकी रिहर्सल चलती रही और तब जाकर बाबा आश्वस्त हुए रेकॊर्डिंग के लिए। वो बहुत ज़्यादा एक्साइटेड थे जब रेकॊर्डिंग के बाद गीत को बजाया जा रहा था। मन्ना दा के शब्दों में बाबा नृत्य करने लगे थे। मन्ना दा हम बच्चों को अंग्रेज़ी के शरारत भरे गीत सिखाया करते थे।

सुजॊय - जब 'हमदर्द' और मन्ना दा की बात चल ही पड़ी है तो क्यों ना यहाँ पर "ऋतु आये ऋतु जाये" का भी आनंद हम उठा ही लें!

शिखा - ज़रूर!

गीत - ऋतु आये ऋतु जाये (हमदर्द)


सुजॊय - फ़िल्म 'बड़ी बहू' के बारे में कुछ कहना चाहेंगी?

शिखा - 'बड़ी बहू' को बहुत सारे पुरस्कार मिले किसी फ़िल्म फ़ेस्टिवल में जो शायद शिमला या देहरादून में हुआ था। सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए बलराज साहनी जी को। मुझे याद है मैंने एक फ़ोटो देखा था जिसमें पूरी कास्ट अपने अपने पुरस्कारों के साथ खड़े हैं और ये पुरस्कार अशोक स्तंभ के सिंह की आकृति के थे।

सुजॊय - शिखा जी, क्या आप हमारे पाठकों को आशालता जी की कुछ तस्वीरें दिखा सकती हैं?

शिखा - अफ़सोस की बात है कि ममा की ज़्यादातर तस्वीरें उन्होंने किसी को दिया था जो पूना से आया हुआ था और जिसने वादा किया था उन्हें वापस करने का लेकिन नहीं किया। और बाद में वही तस्वीरें FTII में पायी गई जहाँ से मेरी बेटी ने एक "ख़रीदा" है।

सुजॊय - ओ हो हो! बहुत ही अफ़सोस की बात है! अच्छा शिखा जी, अभी हमने आशालता जी निर्मित जिन फ़िल्मों की चर्चा की, वो सभी अनिल दा के संगीत से सजे हुए थे। लेकिन 'बाज़ूबंद' फ़िल्म में संगीत मोहम्मद शफ़ी का था। ऐसा क्यों?

शिखा - १९५४ में बदक़िस्मती से मेरे ममा और बाबा एक दूसरे से अलग हो गये और अपनी अपनी राह पर चल निकले। और उनके व्यक्तिगत जीवन की यह जुदाई ज़ाहिर है प्रोफ़ेशनल लाइफ़ पर भी अपना असर चला गई। मोहम्मद शफ़ी को, जो पहले नौशाद साहब के सहायक हुआ करते थे, 'बाज़ूबंद' के लिए अनुबंधित कर लिया गया। इस फ़िल्म में उन्होंने कुछ पारम्परिक ठुमरियों को फ़िल्मी रूप में पेश किया, और इनमें इस फ़िल्म का शीर्षक गीत "बाज़ूबंद खुल खुल जाये" भी शामिल था।

सुजॊय - आगे बढ़ने से पहले हम 'बाज़ूबंद' के इस शीर्षक गीत को यहाँ पर सुनना चाहेंगे जिसे लोगों ने शायद एक अरसे से नहीं सुना होगा।

गीत - बाज़ूबंद खुल खुल जाये (बाज़ूबंद)


सुजॊय - और कोई फ़िल्म है जिसे आशालता जी ने प्रोड्युस किया था?

शिखा - उन्होंने 'मेहमान' फ़िल्म प्रोड्युस की थी जिसमें उन्होंने रामानंद सागर को बतौर निर्देशक अपना पहला ब्रेक दिया था। 'बाज़ूबंद' के बाद १९५५ में उन्होंने 'अंधेर नगरी चौपट राजा' फ़िल्म का भी निर्माण किया जिसमें गोप ने मुख्य भूमिका निभाई और चित्रा नायिका थीं। नायक का नाम याद नहीं आ रहा।

सुजॊय - आशालता जी एक अभिनेत्री/निर्मात्री थीं और अनिल दा एक सुप्रसिद्ध संगीतकार। ऐसे वातावरण में क्या आप भाई बहनों में किसी को भी फ़िल्म लाइन में जाने की आकांक्षा नहीं हुई? आपने कभी किसी फ़िल्म में अभिनय या गायन नहीं किया?

शिखा- मोतीलाल जी के अनुसार ६० के दशक की तीन नई नायिकाएँ होनी थी - अंजु महेन्द्रु, ज़हीदा, और शिखा बिस्वास। मुझे बहुत सारे बड़े प्रोडक्शन हाउसेस से ऒफ़र मिले जिनमें 'पड़ोसन' शामिल थी, और 'कश्मीर की कली' भी।'मेरे मेहबूब' के लिए मुझे याद है, एच.एस. रवैल मेरे दाँत कैप करवाना चाहते थे, कुछ दिनों के लिये 'ड्रमर' नामक फ़िल्म की शूटिंग भी की, जो 'वेस्ट-साइड स्टोरी' पर आधारित थी और जिसका निर्माण 'फ़िल्मालय' कर रहे थे देब मुखर्जी को लौंच करने के लिए। 'फिर वही आवाज़' की बात मैं कर चुकी हूँ, और मेरे जीवन की सब से बड़ी भूल कि मैंने 'धूप के साये में' नामक एक फ़िल्म के लिए "ना" कह दी जिसमें मेरे नायक होते संजीव कुमार। बाद में इस फ़िल्म के लिए हेमा मालिनी को ले लिया गया, लेकिन यह फ़िल्म नहीं बनीं या रिलीज़ नहीं हुई। फिर शम्मी कपूर जी एक फ़िल्म बनाना चाहते थे मुझे लेकर, जिसमें जय मुख्रजी नायक बनने वाले थे। इस तरह से और भी कई फ़िल्में थीं जो इस वक़्त मुझे याद नहीं आ रहे। लेकिन आख़िर में मैं कुछ व्यक्तिगत कारणों से फ़िल्म लाइन से बाहर निकल आई। वैसे मेरे दो भाई फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े, एक बतौर संगीतकार और दूसरा भाई जिसने पहली बार मुंबई में डिजिटल रेकॊर्डिंग् स्टुडिओ की स्थापना की।

सुजॊय - आशालता जी को एक माँ के रूप में आपने कैसा पाया? उनसे जुड़ी कुछ बातें बताइए जिनकी यादें आज भी आपके दिल में ताज़ी हैं।

शिखा - मेरी माँ एक सशक्त महिला थीं, एक फ़ेमिनिस्ट जो अपने समय से काफ़ी आगे बढ़ के थीं। और इनके साथ साथ एक बहुत ही ख़ूबसूरत औरत, न केवल बाहरी रूप से दिखने में, बल्कि मन की भी बहुत सुंदर थीं। उनके जैसा इमानदार इंसान मैंने आज तक नहीं पाया। उनका ऐटिट्युड, सीधी बात कहने की उनकी अदा, बहुत ही डाउन-टू-अर्थ और हिपोक्रिसी से कोसों दूर, ये सब उनकी कुछ विशेषताएँ थीं। मुझे उनकी कपड़ों और गहनों में हमेशा दिलचस्पी रही; वो एक राजकुमारी की तरह दिखतीं थीं और जब किसी कमरे में प्रवेश करतीं तो वहाँ की मध्यमणि बन जातीं। हम सब उनसे बहुत ज़्यादा प्रभावित थे। उनके गुस्से और भड़क उठने की बातें मशहूर थीं इंडस्ट्री में, लेकिन किसी भी ग़लती या अन्याय का वो हमेशा पूरा पूरा न्याय करतीं। व्यस्तता की वजह से वो हमें ज़्यादा समय नहीं दे पातीं, लेकिन हमारी ज़रूरतों का पूरा ख़याल रखतीं। उनकी बड़प्पन का एक उदाहरण देना चाहूँगी। एक बार उनका कोई पूर्व ड्राइवर उनके पास गाड़ी ख़रीदने के लिए लोन माँगने आया। लेकिन क्योंकि वह एक शनिवार की शाम थी और अगले दिन भी बैंक बंद होते, इसलिए उन्होंने अपने सोने के कंगन हाथों से निकाल लिए और उस ड्राइवर को दे दिया। लोग शायद उन्हें कुछ भी कहें, लेकिन जिस तरह से बाहर और घर, दोनों को अकेले उन्होंने सम्भाला है, चार चार बच्चों को अकेले बड़ा किया है, उनके लिए हमारा सर इज़्ज़त से झुक जाता है। यही नहीं, ५० वर्ष की उम्र में तैराकी सीखी और लगभग उसी समय खाना बनाने के बहुत से तरीकें खोज निकाली, नये नये रेसिपीज़ इजाद किये, और फिर मेरी बेटियों के लिए भी एक केयरिंग नानी के रूप में अपने आप को साबित किया। बस उनकी जो एक कमज़ोरी थी, वह था जुआ। लेकिन कोई भी इंसान पर्फ़ेक्ट तो नहीं होता न! हर इंसान में बहुत सारी कमज़ोरियाँ और ख़ामियाँ होती हैं, और उनमें बस कुछ ही थे। उनकी एक और कमज़ोरी यह थी कि वो बहुत जल्द किसी की बातों पर यकीन कर लेती थीं, और क्योंकि वो एक दुखभरी कहानी की नरम पात्र थीं, बहुत से लोग इस बात पर उनका फ़ायदा उठाने की कोशिश करते। उनकी जिस याद को मैं सब से ज़्यादा चेरिश करती हूँ, वह यह कि उन्होंने हम सभी बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाई और यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है, यहाँ तक कि मेरे पिता के नाम और शोहरत से भी बहुत बहुत ज़्यादा। मुझे बहुत दुख होता था उन्हें अल्ज़ाइमर्स से तड़पते देख कर; उनकी ख़ूबसूरती और वैभव का वक़्त के साथ साथ गिरते जाना भी कम दुखदायी नहीं था। एक बार, जब उनकी आर्थिक अवस्था बहुत ज़्यादा ख़राब हो चुकी थीं, वो अपना सर्वस्व हार चुकी थीं, मैं दिल्ली से उनके यहाँ आई; उन्होने अपने रुमाल की गांठ खोल कर एक जीर्ण २० रुपय का नोट निकालकर अपनी कामवाली बाई को दिया और उससे मछली ख़रीद लाने को कहा क्योंकि वो जानती थीं कि मुझे 'सी-फ़ूड' बहुत पसंद था। यकीन मानिए, उस वक़्त उनकी जो हालत थी, उसमें पैसा ही एक ऐसा चीज़ था जो वो सब से कम खर्च कर सकती थी। ये थी "आशालता"।

सुजॊय - शिखा जी, जिस तरह से आपने आशालता जी का परिचय आज करवाया है, इन सब बातों को सुन कर मेरी आँखें भी नम हो गईं हैं और मुझे पूरा यकीन है कि जो छवि आज तक लोगों के दिल में आशालता जी की रही हैं, आज ये सब पढ़कर वो दुबारा अपने मन में मंथन करने पर मजबूर हो जाएँगे। और भी कुछ कहना चाहेंगी अपनी माँ के बारे में जो शायद आज तक आप कहना चाह रही होँगी लेकिन कभी मौका नहीं मिला?

शिखा - मैं जिस बात पर सब से ज़्यादा ज़ोर डालना चाहती हूँ, वह यह है कि मेरी जन्मदात्री माँ आशालता के बारे में लोगों को बहुत कम मालूमात है। और बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि वो अनिल बिस्वास की पत्नी थीं। लोग सोचते हैं कि मीना कपूर उनकी पत्नी हैं, लेकिन हक़ीक़त यह है कि उन्हीं की वजह से मेरे ममा और बाबा अलग हो गये। ये सब बातें अब पुरानी हो चुकी हैं और इन सब का मुझ पर और कोई प्रभाव नहीं होता। जिस बात को मैं सब से ज़्यादा ज़रूरी मानती हूँ, वह यह कि लोग आशालता के बारे में नहीं जानते, उनके उल्लेखनीय जीवन की कहानी नहीं जानते, उनके बलिदान और शक्ति के बारे में नहीं जानते। मैं एक काल्पनिक उपन्यास लिख रही हूँ उनके जीवन के संघर्ष को आधार बनाकर और आशा करती हूँ कि यह उपन्यास किसी दिन पब्लिश होगा और लोगों को असली कहानी का पता चलेगा।

सुजॊय - ज़रूर शिखा जी, हम दिल से यह दुआ करते हैं कि आपको ईश्वर इस राह में आपका हमसफ़र बनें और आपको अपनी मंज़िल जल्द ही दिखाई दे।

शिखा - शुक्रिया! एक और बात जिस पर ध्यान देना आवश्यक है, वह यह कि मेरे बाबा ने अपना सब से मीठा काम तभी किया है जब वो मेरी ममा के साथ थे। १९५४ में मेरी ममा से अलग होने के बाद उनका करीयर ग्राफ़ भी ढलान पर उतरने लगा था।

सुजॊय - वाक़ई सोचने वाली बात है। अच्छा शिखा जी, हमने आशालता जी के बारे में बहुत सारी बातें की। आपके दिल में उनकी क्या जगह है आपने हमें बताया, लेकिन अपने पिता और मशहूर संगीतकार अनिल बिस्वास जी के लिए आपके दिल में किस तरह की फ़ीलिंग्स है, उसके बारे में कुछ बताना चाहेंगी?

शिखा - एक प्रतिभाशाली संगीतकार के रूप में मेरे दिल में अपने पिता के लिए बहुत ज़्यादा सम्मान है। मुझे बहुत गर्व होता है उनकी सांगीतिक खोजों के बारे में जानकर और जिस तरह से उन्होंने एक पायनियरिंग् म्युज़िक डिरेक्टर की भूमिका निभाई और अगली पीढ़ी के संगीतकारों के लिए रास्ता बनाया, यह वाक़ई गर्व करने लायक बात है। उनके कम्पोज़िशन्स बहुत ही मीठे और दिव्य हुआ करते और उनके गीतों को बार बार सुनने पर भी जैसे दिल नहीं भरता। हम दोनों में पिता-पुत्री का रिश्ता भी बहुत प्यारा था। उन्होंने मुझे जीवन के मूल्यों के बारे में सिखाया; ग़ज़ल, काव्य और साहित्य के प्रति जो मेरी रुचि है, वो सब उन्हीं की देन है। उनका अनुशासन, सब से जुनियर म्युज़िशियन या कोरस सिंगर के लिए उनका सम्मान, अड्डेबाज़ी में उनका लगाव, ये सब उनकी बातें मुझे प्रभावित करतीं। उनकी एक मित्र-मण्डली हुआ करती थी जो अगर रविवार को जमा होती और तरह तरह के विषयों पर चर्चा करते। एक बार ऐसी ही एक "राजकीय" गोष्ठी में जमा हुए थे पंडित नरेन्द्र शर्मा, फणी मजुमदार, के.ए. अब्बास, रामानंद सागर, प्रेम धवन, कोल कैविश, महेश कौल, सफ़्दार आह सितापुरी, पंडित चन्द्रशेखर और अभिनेता जयराज जैसे गण्य मान्य व्यक्ति। उन सब ने रामायण पर चर्चा की और शायद यहीं से रामानंद सागर जी के मन में उस महत्वाकांक्षी टीवी धारावाहिक को बनाने की प्रेरणा मिली होगी। और मेरा जो शब्दकोश है, यह भी उन्हीं के साथ स्क्रैबल खेलने की वजह से है। मेरे लिए उनकी जो फ़रमाइश होती, वह थी एक अच्छे हेड-मसाज की!!!

सुजॊय - बहुत ख़ूब!

शिखा - मैं इन दिनों दिल्ली में एक म्युज़िक सोसायटी चलाती हूँ उनकी और सभी बड़े संगेतकारों की स्मृति में, जिसका नाम है 'संगीत स्मृति'। हम गुज़रे ज़माने के फ़िल्म संगीत पर स्टेज शोज़ करते हैं।

सुजॊय - वाह! बहुत अच्छा लगा शिखा जी, अब बारी है एक गीत सुनवाने की। हम एक ऐसा गीत आप से सुनवाना चाहेंगे अपने पाठकों व श्रोताओं को, जो आप अपनी माँ आशालता जी और अपने पिता अनिल दादा को एक साथ डेडिकेट कर सकें। बताइए कौन से गीत से आप इन दोनों को याद करना चाहेंगी?

शिखा - ममा और बाबा को जोड़ने के लिए जो गीत मेरे दिमाग में आता है, वह है तलत महमूद साहब का गाया फ़िल्म 'दोराहा' का "मोहब्बत तर्क की मैंने"। यह ममा का फ़ेवरीट गीत था बाबा की कम्पोज़िशन में। और मेरी ममा ने ही मुझे पहली बार यही गीत सिखाया था।

सुजॊय - आइए सुनते हैं...

गीत - मोहब्बत तर्क की मैंने (दोराहा)


शिखा - साथ ही 'गजरे' का "घर यहाँ बसाने आये थे" भी उन्हीं से मैंने सीखा था। इस गीत की धुन "सीने में सुलगते हैं अरमान" गीत की धुन से बहुत ज़्यादा मिलती-जुलती है, लेकिन बहुत कम लोगों को इसका पता है। क्या इस गीत को भी आप सुनवा सकते हैं?

सुजॊय - ज़रूर! बल्कि हम दोनों गीतों को सुनना व सुनवाना चाहेंगे एक के बाद एक...

गीत - सीने में सुलगते अरमान (तराना)


गीत - घर यहाँ बसाने आये (गजरे)


सुजॊय - शिखा जी, किन शब्दों में मैं आपका शुक्रिया अदा करूँ समझ नहीं आ रहा। जिन लोगों को आशालता जी के बारे में मालूमात नहीं थी या ग़लत धारणा थी, मुझे पूरा विश्वास है कि इस साक्षात्कार के माध्यम से उनकी असली छवि को हमने यहाँ आज प्रस्तुत किया है आपके सहयोग से। मैं अपनी तरफ़ से, अपने तमाम पाठकों की तरफ़ से और 'हिंद-युग्म' की तरफ़ से आपका शुक्रिया अदा करता हूँ, और भविष्य में फिर से आप से बातचीत करने की उम्मीद रखता हूँ, बहुत बहुत धन्यवाद!

शिखा- बहुत बहुत धन्यवाद! मुझे भी बहुत ख़ुशी हुई अपनी माँ के बारे में बताते हुए।

अनुराग शर्मा की कहानी "जाके कभी न परी बिवाई"



'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने नीरज बसलियाल की कहानी "फेरी वाला" का पॉडकास्ट अनुराग शर्मा की आवाज़ में सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा की एक सामयिक कहानी "जाके कभी न परी बिवाई", जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। कहानी "जाके कभी न परी बिवाई" का कुल प्रसारण समय 7 मिनट 43 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा का टेक्स्ट बर्ग वार्ता ब्लॉग पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

कहानी कहानी होती है, उसमें लेखक की आत्मकथा ढूँढना ज्यादती है।
~ अनुराग शर्मा

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी
"घातक हृदयाघात हुआ था पापा को ... और ... उन दुकानदारों ने जो कहा उस पर आज भी यकीन नहीं आता है"
(अनुराग शर्मा की "जाके कभी न परी बिवाई" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#121st Story, jake kabhi na pari bivai: Anurag Sharma/Hindi Audio Book/2011/4. Voice: Anurag Sharma

Thursday, March 3, 2011

मुकाबला हमसे करोगे तो तुम हार जाओगे...देखिये चुनौती का एक रंग ये भी



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 605/2010/305

स्ट्रेलिया, इंगलैण्ड, वेस्ट इंडीज़, पाकिस्तान, भारत, न्युज़ीलैण्ड, श्रीलंका और ईस्ट-अफ़्रीका; इन आठ देशों को लेकर १९७५ में पहला विश्वकप क्रिकेट आयोजित हुआ था। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार, और फिर एक बार विश्वकप क्रिकेट की कुछ बातें लेकर हम हाज़िर हैं इन दिनों चल रही लघु शृंखला 'खेल खेल में' में। पहले के तीन विश्वकप इंगलैण्ड में आयोजित की गई थी। १९८३ में भारत के विश्वकप जीतने के बाद १९८७ का विश्वकप आयोजित करने का अधिकार भारत ने प्राप्त कर लिया। इस बारे में विस्तार से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के उस वक़्त के प्रेसिडेण्ट एन.के.पी. साल्वे ने अपनी किताब 'The Story of the Reliance Cup' में लिखा है। साल्वे साहब ने उस किताब में लिखा है कि १९८३ में लॊर्ड्स के उस ऐतिहासिक विश्वकप फ़ाइनल के लिए उन्हें दो टिकट दिए गये थे। और जब भारत ने फ़ाइनल के लिए क्वालिफ़ाइ कर लिया तो उन्होंने MCC से दो और टिकटों के लिए आग्रह किया भारत से आये उनके दो दोस्तों के लिए। MCC ने उनकी माँग ठुकरा दी। यह बात साल्वे साहब को चुभ गई और वो जी जान से जुट गये अगला विश्वकप भारत में आयोजित करवाने के लिए। उनकी मेहनत रंग लायी और १९८७ मे भारत और पाकिस्तान ने युग्म रूप से इस प्रतियोगिता को आयोजित किया और इस तरह से विश्वकप क्रिकेट आयोजित करने वाले इंगलैण्ड के आधिपत्य को ख़त्म किया। और इसके बाद दूसरे देशों को भी मौका मिला मेज़बानी का। क्रिकेट विश्वकप अपने आप में एक बहुत बड़ा एवेण्ट है, ख़ुद ICC के वेबसाइट पर प्रकाशित शब्दों में "the Cricket World Cup is the showpiece event of the cricket calendar."

और अब आज के गीत की बारी। कल के गीत में ज़रा सा ओवर-कॊन्फ़िडेन्स था, और आज के गीत में तो ओवर-कॊन्फ़िडेन्स की सारी हदें ही पार कर दी हैं नायिका ने। "हम से मुक़ाबला करोगे हाये, हम से मुक़ाबला करोगे तो, तुम हार जाओगे, हम जीत जाएँगे..."। लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर की युगल आवाज़ों में यह है फ़िल्म 'बद और बदनाम' का गीत। यह सन् १९८४ में निर्मित फ़िल्म है जिसमें संजीव कुमार, शत्रुघ्न सिंहा, अनीता राज, परवीन बाबी ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई। फ़ीरोज़ शिनोय निर्देशित इस फ़िल्म का निर्माण किया था के. शोरे ने; फ़िल्म में संगीत दिया लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने और गीत लिखे आनंद बक्शी नें। आज का यह गीत फ़िल्माया गया है परवीन बाबी और संजीव कुमार पर एक पार्टी में। ८० के दशक के मध्य भाग तक आते आते फ़िल्म संगीत एक बुरे वक़्त में प्रवेश कर चुका था। फ़िल्मों की कहानियाँ कुछ ऐसी करवट ले चुकी थी कि गीतकार और संगीतकारों के लिए अच्छा स्तरीय काम दिखा पाना ज़रा मुश्किल सा हो रहा था। इसके बावजूद समय समय पर कुछ यादगार गानें भी आते गये। और जब फ़िल्मकार ने चाहा कि लता जी से गीत गवाया जाये, तो फिर कहानी या सिचुएशन जैसा भी हो, गाना उन्हीं को ध्यान में रखकर बनाया जाता था क्योंकि इंडस्ट्री में सब को यह बात मालूम थी कि लता जी ऐसा वैसा गीत कभी नहीं गातीं। इसलिए उस दौर की फ़िल्मों के बाक़ी गीत चाहे जैसा भी बनें, लता जी वाले गानें सुनने लायक ज़रूर होते थे, और आज का प्रस्तुत गीत भी कोई व्यतिक्रम नहीं है। और उस पर सुर साधक सुरेश वाडकर की आवाज़। पता नहीं क्यों, मुझे व्यक्तिगत रूप से हमेशा ऐसा लगता है कि सुरेश वाडकर ग़लत समय पर इंडस्ट्री में आये। फ़िल्मी गीतों का स्तर इतना गिर चुका था कि उनके स्तर के गानें ही बनने बंद हो गये, और वो एक बहुत ही अंडर-रेटेड गायक बन कर रह गये। तो आइए लता जी और सुरेश जी की आवाज़ों में सुनते हैं फ़िल्म 'बद और बदनाम' का यह गीत, और २०११ क्रिकेट विश्वकप के खिलाड़ियों से ओवर-कॊन्फ़िडेण्ट ना होने की सलाह देते हैं :-)



क्या आप जानते हैं...
कि ८० के दशक में लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर की जोड़ी से सब से ज़्यादा युगल गीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने गवाये, जिनमें 'क्रोधी', 'प्रेम रोग', 'प्यासा सावन', 'बद और बदनाम', 'सिंदूर', 'नाचे मयूरी', 'सुर संगम', 'कभी अजनबी थे' जैसी फ़िल्में शामिल हैं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 06/शृंखला 11
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - आसान है.

सवाल १ - किस अभिनेता निर्माता निर्देशक की आवाज़ है इस क्लिप्पिंग में - १ अंक
सवाल २ - गीत में उदित नारायण ने किस नवोदित अभिनेता (उन दिनों के) का प्लेबैक किया था - ३ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
ये मुकाबला तो अवध जी सही कहते हैं एक दम आखिरी दौर तक जाएगा....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, March 2, 2011

मुकाबला हमसे न करो....कभी कभी खिलाड़ी अपने जोश में इस तरह का दावा भी कर बैठते हैं



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 604/2010/304

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार और स्वागत है आप सभी का इस स्तंभ में। तो कहिए दोस्तों, कैसा चल रहा है आपका क्रिकेट विश्वकप दर्शन? आपको क्या लगता है कौन है फ़ेवरीट इस बार? क्या भारत जीत पायेगा २०११ क्रिकेट विश्वकप? किन खिलाड़ियों से है ज़्यादा उम्मीदें? ये सब सवाल हम सब इन दिनों एक दूसरे से पूछ भी रहे हैं और ख़ुद भी अंदाज़ा लगाने की कोशिशें रहे हैं। लेकिन हक़ीक़त सामने आयेगी २ अप्रैल की रात जब विश्वकप पर किसी एक देश का आधिपत्य हो जायेगा। पर जैसा कि पहली कड़ी में ही हमने कहा था, जीत ज़रूरी है, लेकिन उससे भी जो बड़ी बात है, वह है पार्टिसिपेशन और स्पोर्ट्समैन-स्पिरिट। इसी बात पर आइए आज एक बार फिर कुछ रोचक तथ्य विश्वकप क्रिकेट से संबंधित हो जाए!

• पहला विश्वकप मैच जो जनता के असभ्य व्यवहार की वजह से बीच में ही रोक देना पड़ा था, वह था १९९६ में कलकत्ते का भारत-श्रीलंका सेमी-फ़ाइनल मैच।
• १९९६ में श्रीलंका पहली टीम थी जिसने बाद में बैटिंग कर विश्वकप फ़ाइनल मैच जीता।
• २००३ विश्वकप में पाकिस्तान के शोएब अख़्तर ने क्रिकेट इतिहास में पहली बार १०० माइल प्रति घण्टे की रफ़्तार से गेंद डाली इंगलैण्ड के निक नाइट के ख़िलाफ़।
• २००३ विश्वकप में कनाडा के जॊन डेविसन ने ६७ गेंदों में शतक लगाई वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़, जो विश्वकप इतिहास का 'फ़ास्टेस्ट' शतक था।
• सचिन तेन्दुलकर विश्वकप में कुल आठ बार 'मैन ऒफ़ दि मैच' बनें; उनके बाद विवियन रिचार्ड्स पाँच बार, ब्रायन लारा चार बार और गॊर्डन ग्रीनिज तीन बार इस ख़िताब को जीता।
• २००२/२००३ विश्वकप में केवल १७ वर्ष और ७ दिन की उम्र में खेलने वाले बंगलादेश के तल्हा ज़ुबैर विश्वकप क्रिकेट इतिहास के सब से कम उम्र के खिलाड़ी हुए।
• १९९५/१९९६ में नेदरलैण्ड्स के एन.ई. क्लार्क विश्वकप के इतिहास के सब से प्रवीण खिलाड़ी थे, उस वक़्त उनकी आयु थी ४७ वर्ष और २५७ दिन।

इस 'खेल खेल में' शृंखला की कल की कड़ी में आपने सुना था "आ देखें ज़रा, किसमें कितना है हम", यानी कि चैलेंज से लवरेज़ एक जोशिला गीत। किसी को चैलेंज करने में कोई बुराई नहीं जब तक इंसान में आत्मविश्वास है, साहस है, कॊन्फ़िडेन्स है। लेकिन जब कॊन्फ़िडेन्स ओवर-कॊन्फ़िडेन्स में बदल जाता है, और साहस दुस्साहस में, तो ज़रा मुश्किल वाली बात हो सकती है, मंज़िल करीब आते आते दूर ही रह जाती है। आज हम जिस गीत को सुनवाने के लिए ले आये हैं, उससे भी ओवर-कॊन्फ़िडेन्स की थोड़ी सी बू जैसी आ रही है। १९६९ की फ़िल्म 'प्रिंस' का यह गीत है "मुक़ाबला हमसे ना करो, मुक़ाबला हमसे ना करो, हम तुम्हे अपने रंग में रंग डालेंगे एक ही पल में"। पर्दे पर तीन ज़बरदस्त डान्सर्स - शम्मी कपूर, वैजयंतीमाला और हेलेन, और उनके प्लेबैक के लिए तीन लेजेंडरी आवाज़ें - मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर और आशा भोसले। शंकर जयकिशन का धमाकेदार संगीत और सिचुएशन के मुताबिक पुर-असर अल्फ़ाज़ हसरत जयपुरी साहब के। कुल मिलाकर प्रतियोगितामूलक गीतों के जौनर का एक मीलस्तंभ गीत। तो आइए २०११ विश्वकप क्रिकेट के उत्साह और जोश को थोड़ा सा और बढ़ावा देते हैं इस जोशीले नग़मे के ज़रिए।



क्या आप जानते हैं...
कि लता मंगेशकर और आशा भोसले के किसी तीसरे गायक के साथ गाये गीतों की फ़ेहरिस्त में आख़िरी गाना था फ़िल्म 'आइना' का शीर्षक गीत "आइना है मेरा चेहरा" जिसे मंगेशकर बहनों ने सुरेश वाडकर के साथ मिलकर गाया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 05/शृंखला 11
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक आवाज़ है लता जी की.

सवाल १ - फिल्म के निर्देशक कौन है - ३ अंक
सवाल २ - सह गायक कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
क्या बात है तीन नाम लगभग एक मिनट से भी पहले बता दिए गए, दोनों योद्धाओं के द्वारा....कमाल है...बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, March 1, 2011

आ देखे जरा, किस में कितना है दम....अब जब मैदान में आ ही गए हैं तो हो जाए मुकाबला



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 603/2010/303

'खेल खेल में' - इन दिनों विश्वकप क्रिकेट के नाम हम कर रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल इसी लघु शृंखला के ज़रिए। आज है इस शृंखला की तीसरी कड़ी। कल की कड़ी में हमने विश्वकप क्रिकेट से जुड़े कुछ रोचक तथ्य आपको दिए, आइए आज उसी को आगे बढ़ाया जाये!
• विश्वकप के इतिहास में दो देशों के लिए खेलने वाले एकमात्र खिलाड़ी हैं केप्लर वेसेल्स। वेसेल्स ने १९८३ का विश्वकप ऒस्ट्रेलिया के लिए खेला, और १९९२ में साउथ अफ़्रीका के कैप्टन बनें।
• इंगलैण्ड तीन बार विश्वकप फ़ाइनल तक पहूँचे (१९७९, १९८७, १९९२), लेकिन कभी जीत नहीं सके।
• वेस्ट इंडीज़ और ऒस्ट्रेलिया दो ऐसे देश हैं जिन्होंने विश्वकप पर एकाधिक बार अधिकार जमाया है।
• लंदन वह शहर है जिसने सब से ज़्यादा विश्वकप फ़ाइनल होस्ट किये है (४ बार)।
• तीसरे अम्पायर का कॊन्सेप्ट १९९६ के विश्वकप से लागू हुआ था।
• पहले एक-दिवसीय मैच ६० ओवर्स के होते थे। १९८७ के विश्वकप में इसे ६० से ५० ओवर का कर दिया गया और उस साल विश्वकप भारत और पाकिस्तान ने होस्ट किया था।
• "पिंच-हिटर" उस बल्लेबाज़ को कहा जाता है जिसे मैदान पर उतारा जाता है पहली ही गेंद से शॊट्स लगाने के लिए। विश्व का पहला पिंच-हिटर न्युज़ीलैण्ड के मार्क ग्रेटबैच हैं जिन्होंने १९९२ में कुल ७ मैचों में ३५६ गेंदों में ३१३ रन बनाये, जिसमें ३२ चौके और १३ छक्के शामिल थे।

दोस्तों, २०११ का विश्वकप ज़ोर पकड़ने लगा है और लोगों में उत्साह बढ़ता जा रहा है। सिर्फ़ घरों तक ही अब ये मैचेस सीमित नहीं है, बल्कि दफ़्तरों, स्कूल-कालेजों, सार्वजनिक जगहों में भी आजकल इसी के चर्चे हैं। टीवी के दुकानों के सामने भीड़ जमने लगी हैं, और ग़रीब से लेकर अमीर तक, सभी इस क्रिकेट-बुखार की चपेट में हैं। आज के और अगले दो अंकों में हम जिन गीतों को बजाने जा रहे हैं, उनमें है प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्धा के भाव। पिछले दो गीतों में हमने प्रतिस्पर्धा से उपर उठकर अपने आप पर जीत हासिल करने और हार-जीत को सहजता से लेने की बात कही थी, लेकिन अब अगले तीन गीतों में थोड़ा सा जोश है, कम्पीटिशन है, थोड़ी सी मस्ती भी है, थोड़ा शरारत भी। लेकिन जो भी है, है तो एक हेल्दी-कम्पीटिशन ही। फ़िल्म 'रॊकी' में आशा भोसले, किशोर कुमार, और राहुल देव बर्मन का गाया एक बड़ा ही ज़बरदस्त गीत था "आ देखें ज़रा, किसमें कितना है दम, जम के रखना क़दम, मेरे साथिया"। फ़िल्म में यह गीत एक प्रतियोगितामूलक गीत था और दो टीमें थीं संजय दत्त-रीना रॊय तथा शक्ति कपूर-टीना मुनिम की। एक बार फिर बक्शी साहब के बोल और पंचम दा का संगीत। फ़िल्म में इस प्रतियोगिता के जज के रूप में शम्मी कपूर नज़र आये जिन्होंने अपना ही, यानी शम्मी कपूर का ही किरदार निभाया। तो आइए, इस गीत के बोलों का ही सहारा लेकर हम २०११ विश्वकप क्रिकेट के सभी खिलाड़ियों से यही दोहराएँ कि "जम के रखना क़दम, all the best!"



क्या आप जानते हैं...
कि १९८१ की फ़िल्म 'रॊकी' सुनिल दत्त निर्मित व निर्देशित फ़िल्म थी, जिसका निर्माण उन्होंने अपने बेटे संजय दत्त को लौंच करने के लिए किया था। फ़िल्म के रिलीज़ के चंद हफ़्ते पहले सुनिल दत्त की पत्नी और संजय की माँ नरगिस जी का लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया और वो अपने पुत्र की इस फ़िल्म में कामयाबी देख नहीं पायीं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 11
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -तीन आवाजों में है ये गीत.

सवाल १ - किन तीन कलाकारों पर फिल्माया गया है ये गीत - ३ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी ने एक अंक की बढ़त ली है, कल अंजाना जी और विजय जी का टाई हुआ, लगता है एक अंक वाला सवाल किसी को नहीं चाहिए :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

संग्रहालय

25 नई सुरांगिनियाँ

ओल्ड इज़ गोल्ड शृंखला

महफ़िल-ए-ग़ज़लः नई शृंखला की शुरूआत

भेंट-मुलाक़ात-Interviews

संडे स्पेशल

ताजा कहानी-पॉडकास्ट

ताज़ा पॉडकास्ट कवि सम्मेलन