Tuesday, April 7, 2009

रात के हमसफ़र थक के घर को चले....



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 45

क्ति सामंता एक ऐसे फिल्मकार थे जिन्हे हमेशा यह मालूम होता था कि लोग किस तरह की फिल्म देखना पसंद करते हैं. और यही वजह थी कि उनकी ज़्यादातर फिल्में सफल रहीं. 1964 में शम्मी कपूर और शर्मिला टैगोर को लेकर "कश्मीर की कली" बनाने के बाद वो इन दोनो को लेकर एक ऐसी फिल्म का निर्माण करना चाहते थे जो किसी विदेशी शहर की पृष्ठभूमि पर आधारित हो. शक्ति बाबू ने पैरिस को चुना और अपने फिल्म का शीर्षक "अन इवनिंग इन पैरिस" रखने का निश्चय किया. एक मुलाक़ात में उन्होने कहा था कि इस फिल्म की कहानी में कोई ख़ास बात नहीं थी. लेकिन दोस्तों, किसी साधारण कहानी को लेकर ऐसी सफल फिल्म बनाना भी तो एक ख़ास बात ही है. फिल्म की कहानी के अनुसार इस फिल्म का संगीत भी पाश्चात्य रंग में रंगा हुआ होना था. और उस ज़माने में पाश्चात्य 'ऑर्केस्ट्रेशन' के लिए शंकर जयकिशन का नाम सबसे उपर आता था. बस, फिर क्या था! शक्ति सामंता ने इस फिल्म के संगीत के लिए शंकर जयकिशन को नियुक्त किया, और इस जोडी के साथ साथ गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी भी शामिल हो गये. यूँ तो इस फिल्म के ज़्यादातर गीत रफ़ी साहब ने अकेले ही गाए हैं जो बेहद मशहूर भी हुए हैं. लेकिन एक युगल गीत ऐसा है जो इन सब गीतों से बिल्कुल अलग है. शैलेंद्रा का लिखा और आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी का गाया हुआ यही युगल गीत आज 'ओल्ड इस गोल्ड' की शान है.

जब हम फिल्मी युगल गीतों की बात करते हैं तो आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी की जोडी एक मशहूर जोडी रही है जिन्होंने असंख्य लाजवाब युगल गीत हमें दिए हैं. और "अन इवनिंग इन पैरिस" फिल्म का यह गीत भी इन्ही लाजवाब गीतों में शामिल है. रूमानियत और मादकता से भरपूर यह गीत किसी कविता से कम नहीं. शैलेंद्रा ने अपने ख्यालों को इस क़द्र शक्ल दिया है इस गाने में जो हमें किसी और ही दुनिया में ले जाती है. रात और सुबह का मानवीकरण बेहद सुंदर तरीके से किया गया है इस गीत में. और शंकर जयकिशन के संगीत के तो क्या कहने, जैसी ज़रूरत बिल्कुल वैसा ही संगीत उन्होने हमेशा दिया है. 'गिटार' का असरदार प्रयोग इस गीत में सुनने को मिलता है. अगर आपने इस गीत को पर्दे पर देखा है तो आपको याद होगा कि पूरे गीत के पार्श्व में रात का पॅरिस शहर नज़र आता है जिसमें जगमगाहट भी है लेकिन एक अकेलापन भी जो रूमानियत से भरे दो दिलों को और भी ज़्यादा जज़्बाती बना देते हैं. तो याद कीजिए पॅरिस की वो रंगीनियाँ और सुनिए यह खूबसूरत नग्मा.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. मजरूह साहब का लिखा एक शानदार गीत, नौशाद का संगीत है.
२. यूँ तो पूरा गाना मुकेश ने गाया है पर शुरू में कुछ ऊंचे नोट्स महेंद्र कपूर से गवाए गए हैं.
३. मुखड़े में शब्द युग्म है - "तेरी सदा".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
मनु जी राज की बात है आसान सिर्फ आपके लिए दी है हमने, ताकि काफी दिनों से आपका खोया हुआ "फॉर्म" लौट आये. खैर बधाई, अरे नीलम जी भी हैं और इस बार सौ फीसदी सही जवाब के साथ. आचार्य जी किशोर की आवाज़ में ये गीत वाकई बहुत मधुर है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.





मैं और मेरा साया - भूपेन दा का एक नायाब एल्बम.



बात एक एल्बम की # ०१

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


दोस्तों आज बात एक ऐसी शख्सियत की हो रही है जिनके बारे में कुछ कहने में ढेरों मुश्किलों से साक्षत्कार होना पड़ता है. इस एक शख्स में कई शख्सियत समायी हुई है ।बुद्धिजीवी संगीतकार, उत्कृष्ट गायक, सवेदनशील कवि, अभिनेता, लेखक, निर्देशक, समाज सेवक और न जाने कितने रूप. दोस्तों मै दादा साहेब फाल्के सम्मान से सम्मानित डॉक्टर भूपेन हजारिका के बारे में बात कर रहा हूँ .जब भी हिन्दी सिने जगत में लोकसंगीत की बात आएगी तो भूपेन दा के का नाम शीर्ष पर रहेगा. उन्होंने अपने संगीत के जरिये आसाम की मिट्टी की सोंधी खुश्बू कायनात में घोल दी है.


बचपन में पिता शंकर देव का उपदेश ज्यादातर गेय रूप में प्राप्त होता था. उन्ही दिनों उनके मन में संगीत ने अपना घर बना लिया और वे ज्योति प्रसाद अग्रवाल, विष्णु प्रसाद शर्मा और फणी शर्मा जैसे संगीतविदों के संपर्क में आकर लोकगीत की तालीम लेने लगे।

भूपेन दा के आवाज़ में वह बंजारापन है जो उस्तादों से लेकर आम जन -जन को अपने गिरफ्त में ले लेता हैं और अपनी आवाज़ को सबकी आवाज़ बना देता हैं। भूपेन दा की रचनाओं की वेदना की गहराई का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है जब वे एक दफ़ा नागा रिबेल्स से बात करने गए तो आपनी एक रचना 'मानुहे मनोहर बाबे' को वहां के एक नागा युवक को उन्हीं कि अपनी भाषा में अनुवाद करने को कहा और जब उन लोगों ने इस गीत को सुना तो सभी के आंखों में आँसू आ गए। भूपेन दा के इस गीत के बंगला अनुवाद 'मानुष मनुषेरे जन्में', को बी.बी.सी.की तरफ़ से 'सॉंग ऑफ द मिलेनियम,के खिताब से नवाजा गया. इस गीत के जरिये भूपेन दा का कवि रूप का चिंतन हमारे सामने आता है.

हमारे फीचर्ड आर्टिस्ट भूपेन दा पर होंगी और बातें अगले मंगलवार, फिलहाल सुनते हैं इस महीने की फीचर्ड एल्बम, "मैं और मेरा साया" से भूपेन हजारिका की आवाज़. भूपेन दा के मूल गीत का हिंदी अनुवाद किया है गुलज़ार साहब ने.



साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.



Monday, April 6, 2009

मुखड़े पे गेसू आ गए आधे इधर आधे उधर...किशोर कुमार की मीठी शिकायत



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 44

दोस्तों, कुछ दिन पहले 'ओल्ड इस गोल्ड' में हमने आपको किशोर कुमार का गाया और सी रामचंद्र का संगीतबद्ध किया हुआ फिल्म "आशा" का मशहूर गीत सुनवाया था "ईना मीना डीका". यह गीत किशोर और सी रामचंद्र की जोडी का शायद सबसे लोकप्रिय गीत रहा है. यूँ तो इस गायक - संगीतकार की जोडी ने साथ साथ बहुत ज़्यादा काम नहीं किया, लेकिन एक और ऐसी फिल्म है जिसमें इन दोनो ने अपने अपने हुनर के जलवे दिखाए, और वो फिल्म है "पायल की झंकार". आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में एक बार फिर से किशोर कुमार और सी रामचंद्र को सलाम करते हुए आप की खिदमत में हम लेकर आए हैं पायल की झंकार फिल्म का एक बडा ही अनूठा सा गीत जिसे आपने बहुत दिनों से शायद सुना नहीं होगा. क़मर जलालाबादी ने इस गीत को लिखा था. सन 1966 में बनी फिल्म "पायल की झंकार" के मुख्य कलाकार थे किशोर कुमार, राजश्री और ज्योति लक्ष्मी. इसी शीर्षक से राजश्री प्रोडक्शन ने 1980 में एक फिल्म बनाई थी, और 1980 की इस फिल्म में गायिका अलका याग्निक ने अपना पहला हिन्दी फिल्मी गीत गाया था.

बहरहाल 1980 से हम वापस आते हैं 1966 की फिल्म "पायल की झंकार" पे. "मुखड़े पे गेसू आ गये आधे इधर आधे उधर". इस गीत को सुनते हुए आप यह महसूस करेंगे कि यूँ तो शास्त्रीय संगीत को आधार मानकर इस गीत को बनाया गया है लेकिन 'इंटरल्यूड म्यूज़िक' में एक पाश्चात्य रंग भी है. और अंतरे में फिर से वही शास्त्रीय रंग वापस आ जाता है. कुल मिलाकर इस गीत का संगीत संयोजन कमाल का है. क़मर साहब ने भी इस गीत में अपने शब्दों से जान डाल दी है, वो लिखते हैं "आज हमने रूप देखा चाँदनी के भेस में, एक परदेसी बेचारा लुट गया परदेस में, दिल के दुश्मन आ गये आधे इधर आधे उधर". नायिका के चेहरे की खूबसूरती को छुपाने वाले गेसुओं से शिकायत की गयी है इस गीत में लेकिन बडे ही खूबसूरत अंदाज़ में. इस गीत के लिए ज़्यादा कुछ कहने के बजाए यही बेहतर होगा कि इस गाने को सुना जाए और इसका आनंद उठाया जाए.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. शैलेन्द्र, आशा भोंसले, मोहम्मद रफी और शंकर जयकिशन की टीम.
२. पेरिस में शाम बिताते शम्मी कपूर और शर्मीला टैगोर.
३. अंतरे में पंक्ति है - "नींद तो अब तलक जाके लौटी नहीं..."

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी इकलौते विजेता रहे इस बार. मुश्किल था पर आपने क्या खूब पकडा. मज़ा आ गया. गले लग कर बधाई. शोभा जी, नीलम जी, राज भाटिया जी और शन्नो जी, आप सब ने गीत का आनंद लिया जानकार ख़ुशी हुई. मनु जी कोई बात नहीं आज कोशिश कीजिये, और किशोर कुमार का ये गाना कैसा लगा ये भी बताईयेगा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.





आबिदा और नुसरत एक साथ...महफिल-ए-ग़ज़ल में



महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०२

नकी नज़र का दोष ना मेरे हुनर का दोष,
पाने को मुझको हो चला है इश्क सरफ़रोश।


इश्क वो बला है जो कब किस दिशा से आए, किसी को पता नहीं होता। इश्क पर न जाने कितनी हीं तहरीरें लिखी जा चुकी हैं, लेकिन इश्क को क्या कोई भी अब तक जान पाया है। पहली नज़र में हीं कोई किसी को कैसे भा जाता है, कोई किसी के लिए जान तक की बाजी क्यों लगा देता है और तो और इश्क के लिए कोई खुद की हस्ती तक को दाँव पर लगा देता है। आखिर ऎसा क्यों है? अगर इश्क के असर पर गौर किया जाए तो यह बात सभी मानेंगे कि इश्क इंसान में बदलाव ला देता है। इंसान खुद के बनाए रस्तों पर चलने लगता है और खुद के बनाए इन्हीं रस्तों पर खुदा मिलते हैं। कहते भी हैं कि "जो इश्क की मर्जी वही रब की मर्जी " । तो फिर ऎसा क्यों है कि इन खुदा के बंदों से कायनात की दुश्मनी ठन जाती है। तवारीख़ गवाह है कि जिसने भी इश्क की निगेहबानी की है, उसके हिस्से में संग(पत्थर) हीं आए हैं। सरफ़रोश इश्क इंसान को सरफ़रोश बना कर हीं छोड़ता है,वहीं दूसरी ओर खुदा के रसूल हीं खुदा के शाहकार को पाप का नाम देने लगते हैं:

संग-दिल जहां मुझसे भले हीं अलहदा रहे,
काफ़ी है कि मेरी तरफ बस वो खु़दा रहे।


बेग़म आबीदा परवीन,जिनके लिए सितारा-ए-इम्तियाज़ की उपाधि भी छोटी है,की आवाज़ में खुदावंद ने एक अलग हीं कशिश डाली है। आईये अब हम इन्हीं की पुरकशिश आवाज़ में कराँची के हकीम नसीर की लिखी गज़ल सुनते हैं।



गुजरे पहर में रात ने जो ख़्वाब कत्ल किये,
अच्छा है उनको भूलना,शब भर न वे जिये।


इंसान ईश्वर का सबसे पेचीदा आविष्कार है। वह वर्तमान में जीता है, भविष्य के पीछे भागता है और भूत की होनी-अनहोनी पर सर खपाता रहता है। ना हीं वह माज़ी का दामन छोड़ता है और ना हीं मुस्तकबिल से नज़रें हटाता है। इसी माज़ी-मुस्तकबिल के पेंच में उलझा वह मौजूद की बलि देता रहता है। वह जब किसी की चाह पाल लेता है तो या तो उसे पाकर हीं दम लेता है या फिर हरदम उसी की राह जोहता रहता है। और वही इंसान अगर इश्क के रास्ते पर हो तो उसे एक हीं मंज़िल दीखती है,फिर चाहे वह मंजिल कितनी भी दूर क्यों न हो या फिर उस रास्ते की कोई मंजिल हीं न हो। वह उसी रास्ते पर मुसलसल चलता रहता है, ना हीं वह मंजिल को भूलता है और ना हीं रास्ता बदलता है। उस नासमझ को इस बात का इल्म नहीं होता कि "जिस तरह दुनिया बेहतरी के लिए बदलती रही है, उसी तरह इंसान से भी फ़िज़ा यही उम्मीद करती है कि वह बेहतरी के लिए बदलता रहे।" कहा भी गया है कि "छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए, यह मुनासिब नहीं आदमी के लिए" । काश यह बात हर इंसान की समझ में आ जाए:

शिकवा क्यों अपने-आप से, ग़र पास सब न हो,
किस्मत में मोहतरम के भी मुमकिन है रब न हो।


मौजूदा गज़ल में अमज़द इस्लाम अमज़द कहते हैं -
"कहाँ आके रूकने थे रास्ते, कहाँ मोड़ था उसे भूल जा,
वो जो मिल गया उसे याद रख, जो नहीं मिला उसे भूल जा।"

उस्ताद नुसरत फतेह अली खान की आवाज़ ने इस गज़ल को दर्द से सराबोर कर दिया है। आईये हम और आप मिलकर इस दर्द-ए-सुखन का लुत्फ उठाते हैं।



चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक ख़ास शब्द होगा जो मोटे अक्षर में छपा होगा. वही शब्द आपका सूत्र है. आपने याद करके बताना है हमें वो सभी शेर जो आपको याद आते हैं जिसके दो मिसरों में कहीं न कहीं वही शब्द आता हो. आप अपना खुद का लिखा हुआ कोई शेर भी पेश कर सकते हैं जिसमें आपने उस ख़ास शब्द का प्रयोग किया हो. तो खंगालिए अपने जेहन को और अपने संग्रह में रखी शायरी की किताबों को. आज के लिए आपका शेर है - गौर से पढिये -

जिंदगी तुझसे हर एक बात पे समझौता करूँ,
शौक जीने का है मुझको मगर इतना भी नहीं...

इरशाद ....


प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.



Sunday, April 5, 2009

निगाहें मिलाने को जी चाहता है...एक श्रेष्ठ फ़िल्मी कव्वाली



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 43

हाँ तक फिल्मी क़व्वालियों का सवाल है, तो फिल्म संगीत में क़व्वाली को लोकप्रिय बनाने में संगीतकार रोशन का महत्वपूर्ण और सराहनीय योगदान रहा है. यूँ तो उनसे पहले भी फिल्मों में कई क़व्वालियाँ आईं, लेकिन उनमें फिल्मी रंग की ज़रा कमी सी थी जिसकी वजह से वो आम जनता में लोकप्रिय तो हुए लेकिन वो मुकाम हासिल ना कर सके जो दूसरे साधारण गीतों ने किये. रोशन ने क़व्वालियों में वो फिल्मी अंदाज़, वो फिल्मी रंग भरा जो सुननेवालों के दिलों पर ऐसा चढा कि आज तक उतरने का नाम नहीं लेता. हुआ यूँ कि एक बार रोशन ने पाकिस्तान में एक क़व्वाली सुन ली "यह इश्क़ इश्क़ है". यह उन्हे इतनी पसंद आई कि अनुमति लेकर उन्होने इस क़व्वाली को अपनी अगली फिल्म "बरसात की रात" में शामिल कर लिया. यह क़व्वाली इतना लोकप्रिय हुई कि अगली फिल्म "दिल ही तो है" में निर्माता ने उनसे एक और ऐसी ही क़व्वाली की माँग कर बैठे. और एक बार फिर से रोशन ने अपने इस हुनर का जलवा बिखेरा "निगाहें मिलाने को जी चाहता है" जैसी क़व्वाली बनाकर. जी हाँ, आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में सुनिए यही मशहूर क़व्वाली.

फिल्म "दिल ही तो है" बनी थी सन् 1963 में. बी एल रावल निर्मित और सी एल रावल और पी एल संतोषी निर्देशित इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे राज कपूर और नूतन. इस फिल्म का संगीत बेहद मक़बूल हुआ और मन्ना डे का गाया "लागा चुनरी में दाग" तो एक मील का पत्थर है इस गीत से जुडे हर एक कलाकार के संगीत सफ़र की. आशा भोंसले और साथियों का गाया "निगाहें मिलाने को जी चाहता है" एक मशहूर क़व्वाली के रूप में आज भी याद किया जाता है. इस क़व्वाली को लिखा था साहिर लुधियानवी ने, जिन्होने बरसात की रात की क़व्वाली भी लिखी थी. फिल्म "दिल ही तो है" की इस क़व्वाली के फ़िल्मांकन की अगर हम बात करें तो नूतन ने अपना बहुत ही अलग और खूबसूरत अंदाज़ इसमें पेश किया है. नूतन नृत्यांगना नहीं थी और ना ही इस तरह के पात्र उन्होने निभाए थे. बावजूद इसके, उन्होने बहुत ही अच्छे तरीके से इस जमीला बानो के चरित्र को निभाया जिसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया. अब शायद आपका भी "जी चाह रहा" होगा इस क़व्वाली को सुनने का, तो पेश-ए-खिदमत है...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. सी रामचंद्र के संगीत में किशोर की आवाज़.
२. कमर जलालाबादी ने बोल लिखे हैं और परदे पर किशोर कुमार ने निभाया है गीत को.
३. गीत शुरू होता है इस शब्द से -"मुखड़े पे..."

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
पारुल जब भी आती है बाजी मार ले जाती है, मनु और नीरज जी आप सब को भी बधाई, सही कहा आपने रोशन साहब हिंदी फिल्म संगीत के कव्वाली किंग हैं. आचार्य जी आशा के कुछ गीत ऐसे हैं जिन्हें उनके आलावा कोई दूसरा गा ही नहीं सकता.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (1)



सुनिए १९४९ में आयी फिल्म "बाज़ार" से लता के कुछ दुर्लभ गीत

रविवार की अलसाई सुबह का आनंद और बढ़ जाता है जब सुबह सुबह की कॉफी के साथ कुछ ऐसे दुर्लभ गीत सुनने को मिल जाएँ जिसे कहीं गाहे बगाहे सुना तो था, पर फिर कभी सुनने का मौका नहीं मिला -

एक पुराना मौसम लौटा , यादों की पुरवाई भी,
ऐसा तो कम ही होता है, वो भी हो तन्हाई भी...

चलिए आपका परिचय कराएँ आवाज़ के एक संगीत प्रेमी से. अजय देशपांडे जी नागपुर महाराष्ट्र में रहते हैं, आवाज़ के नियमित श्रोता हैं और जबरदस्त संगीत प्रेमी हैं. लता मंगेशकर इनकी सबसे प्रिय गायिका है, और रोशन साहब को ये संगीतकारों में अव्व्वल मानते हैं. मानें या न मानें इनके पास १९३५ से लेकर १९६० तक के लगभग ८००० गीतों का संकलन उपलब्ध है, जाहिर है इनमें से अधिकतर लता जी के गाये हुए हैं. आवाज़ के श्रोताओं के साथ आज वो बंटाना चाहते हैं १९४९ में आई फिल्म "बाज़ार" से लता और रफी के गाये कुछ बेहद मधुर गीत. फिल्म "बाज़ार" में संगीत था श्याम सुंदर का, दरअसल १९४९ का वर्ष श्याम सुंदर के लिए सर्वश्रेष्ठ रहा, "बाज़ार" के आलावा "लाहौर" में भी उनका संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ. हालाँकि उनके काम को तो १९४५ में आई फिल्म "गाँव की गोरी" के बाद से ही सराहना मिलनी शुरू हो चुकी थी पर "बाज़ार" में आया लता की आवाज़ में गीत "साजन की गलियां छोड़ चले..." शायद उनके कैरियर का सर्वोत्तम गीत था. लता के भी अगर सर्वश्रेष्ठ गीतों की बात की जाए तो इस गाने का जिक्र अवश्य किया जायेगा. श्याम सुंदर ने इसके बाद "कमल के फूल", "काले बादल", "ढोलक" और १९५३ में आई "अलिफ़ लैला" में भी एक से एक हिट गीत दिए. उनके संगीत पर किसी परंपरा या जमाने का असर नहीं था. उनकी शैली पूर्णतया मौलिक थी, और धुनों में जो मिठास थी वो अदभुत ही थी.

"बाज़ार" के इन दुर्लभ गीतों को सुनने से पहले ज़रा उन गीतों की फेहरिस्त देखिये जो श्याम सुंदर के मधुर संगीत से रोशन हुई - "ज़रा सुन लो...", "शहीदों तुमको मेरा सलाम... "(बाज़ार), "बैठी हूँ तेरी याद में...", "किस तरह भूलेगा दिल..."(गाँव की गोरी), "बहारें फिर भी आयेंगीं..", "युहीं रोता हुआ दिल...", "टूटे हुए अरमानों की..."(लाहौर), "खामोश क्यों हो तारों..."(अलिफ़ लैला), "चोरी चोरी आग सी दिल में..."(ढोलक). दोस्तों ऐसे गीत आजकल कहीं सुनने को नहीं मिल पाते. पर आवाज़ की अब ये कोशिश रहेगी कि इन दुर्लभ मोतियों को आप तक निरंतर पहुंचाए. इस कार्य में हमें आपका भी सहयोग चाहिए. आप भी अपने संकलन से कुछ दुर्लभ गीत हमें भेजें और अन्य श्रोताओं के साथ बांटे.

अब सुनिए फिल्म "बाज़ार" से ये दुर्लभ गीत -

साजन की गलियां छोड़ चले...


ऐ मोहब्बत उनसे...


बसा लो अपनी निगाहों में...


ऐ दिल उनको याद न करना...


यदि कोई गीत, खास कर लता जी का गाया (1940-1960)आप सुनना चाहते हैं तो हमें लिखे हम आपका सन्देश अजय जी तक अवश्य पहुंचाएंगे.



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.



Saturday, April 4, 2009

सुनो कहानी: मंटो की एक लघुकथा



मंटो की एक लघुकथा

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने शन्नो अग्रवाल की आवाज़ में प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'बड़े घर की बेटी' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं मंटो की एक लघुकथा, जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 2 मिनट।

संचिका पर इस कहानी का टेक्स्ट उपलब्ध कराने के लिए हम लवली कुमारी जी के आभारी हैं

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



पागलख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो ख़ुद को ख़ुदा कहता था.
~ सआदत हसन मंटो (१९१२-१९५५)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए एक नयी कहानी

लोग लुटा हुआ माल डर के मारे अँधेरे में बाहर फेंकने लगे. कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने मौका पाकर अपना माल भी अपने से अलग कर दिया ताकि कानूनी गिरफ्त से बचे रहें.
(मंटो की लघुकथा से एक अंश)


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#Fifteenth Story, Laghukatha: Sa'adat Hasan Manto/Hindi Audio Book/2009/10. Voice: Anurag Sharma

कर ले प्यार कर ले के दिन हैं यही...आशा का जबरदस्त वोईस कंट्रोल



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 42

हेलेन का अंदाज़ और आशा भोंसले की आवाज़. ऐसा लगता है जैसे आशाजी की आवाज़ हेलेन के अंदाज़ों की ही ज़ुबान है. इसमें कोई शक़ नहीं कि अपनी आवाज़ से अभिनय करनेवाली आशा भोंसले ने हेलेन के जलवों को पर्दे पर और भी ज़्यादा प्रभावशाली बनाया है. चाहे ओ पी नय्यर हो या एस डी बर्मन, या फिर कल्याणजी आनांदजी, हर संगीतकार ने समय समय पर इस आशा और हेलेन की जोडी को अपने दिलकश धुनों से बार बार सजीव किया है हमारे सामने. आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में आशा भोंसले, हेलेन और एस डी बर्मन मचा रहे हैं धूम फिल्म "तलाश" के एक 'क्लब सॉंग' के ज़रिए. ऐसे गीतों के लिए उस ज़माने में आशा भोंसले के अलावा किसी और गायिका की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. लेकिन आशाजी के लिए बर्मन दादा का यह गीत इस अंदाज़ का पहला गीत नहीं है. क्या आप को पता है कि आशाजी ने बर्मन दादा के लिए ही पहली बार एक 'कैबरे सॉंग' गाया था फिल्म टॅक्सी ड्राइवर (1953) में? इतना ही नहीं, आशाजी का गाया हुआ बर्मन दादा के लिए यह पहला गाना भी था. याद है ना आपको वो गीत? चलिए हम याद दिला देते हैं, वो गीत था टॅक्सी ड्राइवर फिल्म का जिसके बोल थे "जीने दो और जियो...मारना तो सब को है जीके भी देख ले, चाहत का एक जाम पी के भी देख ले". इसके बाद जुवेल थीफ में "रात अकेली है" गीत बेहद मशहूर हुआ था. और फिर उसके बाद फिल्म तलाश का यह मचलता नग्मा.

दोस्तों, फिल्म तलाश के बारे में हमने कुछ दिन पहले भी ज़िक्र किया था जब हमने आपको बर्मन दादा का गाया "मेरी दुनिया है माँ तेरे आँचल में" सुनवाया था. इसलिए आज हम इस फिल्म की बात यहाँ नहीं करेंगे. बल्कि आज आपको हम यह बताएँगे की बर्मन दादा ने आशा भोंसले के बारे में अमीन सयानी के कार्यक्रम संगीत के सितारों की महफ़िल में क्या कहा था. साल था 1972, मौका आशा भोंसले के फिल्मी गायन के 25 साल पूरा हो जाने का जश्न. उस जश्न में एस डी बर्मन ने कहा था: "मैने जब भी कोई धुन बनाकर आशा को सुनाया, उन्हे बहुत जल्दी याद हो गया. 'सिंगर' में यह बहुत बडा गुण है. आशा बहुत महान कलाकार है, हर तरह का गीत गाने की योग्यता है उनमें, 'दर्द भरे सॉंग, हैप्पी सॉंग, कैबरे सॉंग, रोमांटिक सॉंग', सब कुछ गा सकना आशा के 'वर्सटाइल' होने का 'प्रूफ' है. 'वोईस कंट्रोल' ऐसा है कि गीत के एक ही 'लाइन' में 'हस्की वोईस' में गा सकती है और उसी में ज़ोर से चिल्ला भी सकती है. मेरा एक गाना है जिसमें यह ज़बरदस्त 'वौइस् कंट्रोल' का 'उदाहरण' मैं आपको सुनाता हूँ...". जी हाँ दोस्तों, और ये कहकर बर्मन दा ने यही गीत सबको सुनवाया था. आप भी सुनिए...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. संगीतकार रोशन की बेहद यादगार सदाबहार कव्वाली.
२. फिल्म का नाम "दिल" शब्द से शुरू होता है.
३. इसी फिल्म में मन्ना डे साहब ने एक गीत गाया था जिसके नाम पर रानी मुखर्जी की एक फिल्म भी बनी थी.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
जब इतने मशहूर गानों पर हमारे धुरंधर चूक जाते हैं तब दुःख होता है. अभिषेक जी जब भी समस्या आये पृष्ठ को रिफ्रेश कर दिया कीजिये. राज सिंह जी आपने बहुत अच्छा याद दिलाया. फिल्म की नायिका तरला के बारे में अधिक कुछ जानकारी उपलब्ध नहीं है. राज भाटिया जी हमें यकीन था ये गीत आपको अवश्य अच्छा लगेगा. मनु जी क्लब सोंग्स की फेहरिस्त बहुत लम्बी है. सुनने शुरू कर दीजिये. इनमें बहुत विविधतता है. अब आज का ही गीत लें. आज भी कोई इस गीत में आशा को टक्कर नहीं दे सकेगा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




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Friday, April 3, 2009

जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम....खेल अधूरा छूटे न...



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 41

हते हैं कि "ज़िंदगी हर क़दम एक नयी जंग है, जीत जाएँगे हम तू अगर संग है". हमसफ़र का अगर साथ हो तो ज़िंदगी की कोई भी बाज़ी आसानी से जीती जा सकती है, ज़िंदगी का सफ़र बडे ही सुहाने ढंग से तय किया जा सकता है. चाहे दुनिया कितनी भी रुकावटें खडी करें, चाहे कितनी भी परेशानियाँ दीवार बनकर सामने आए, अगर कोई सच्चा साथी साथ में हो तो ज़िंदगी के हर खेल को पूरा खेला जा सकता है. कुछ इसी तरह की बात कही गयी है आज के 'ओल्ड इस गोल्ड' में शामिल गीत में. मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर की आवाज़ों में "शोला और शबनम" फिल्म से आज हम लेकर आए हैं "जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम". शोला और शबनम रमेश सहगल की फिल्म थी जिसे उन्होने 1961 में बनाया था. अभी भट्टाचार्य और विजयलक्ष्मी अभिनीत इस फिल्म में ज़बरदस्त 'स्टारकास्ट' तो नहीं थी, लेकिन अच्छी कहानी, अच्छा अभिनय, बेहतरीन निर्देशन और मधुर गीत संगीत की वजह से इस फिल्म को लोगों ने सराहा और आज भी इस फिल्म के गाने बडे चाव से सुने जाते हैं, ख़ास कर ये गीत.

फिल्म शोला और शबनम के संगीतकार थे ख़य्याम. 1949 में शर्मा जी के नाम से उन्होने पहली बार फिल्म "परदा" में संगीत दिया था. इसी नाम से उन्होने 1950 की फिल्म "बीवी" में भी एक गीत को स्वरबद्ध किया था. उस वक़्त के सांप्रदायिक तनाव के चलते उन्होने अपना नाम बदलकर शर्मा जी रख लिया था. लेकिन 1953 में जिया सरहदी की फिल्म "फुटपाथ" में ख़य्याम के नाम से संगीत देकर वो फिल्म संगीत संसार में छा गये. इसके बाद कुछ सालों तक वो फिल्मों में संगीत तो देते रहे लेकिन कुछ बात नहीं बनी. 1958 में फिल्म "फिर सुबह होगी" उनके फिल्मी सफ़र में एक बार फिर से सुबह लेकर आई और उसके बाद उन्हे अपार शोहरत हासिल हुई. शोला और शबनम भी उनके सफ़र का एक महत्वपूर्ण पडाव था. ख़य्याम के संगीत की ख़ासीयत थी कि वो कम साज़ों का इस्तेमाल करते और उनके संगीत में एक ग़ज़ब का ठहराव होता था जो मन को एक अजीब सुकून से भर देता था. इस गीत में भले बहुत ज़्यादा ठहराव ना हो, लेकिन जहाँ तक सुकून का सवाल है, तो यह गीत भी उसी श्रेणी में शामिल होता है. गीत के शुरू में 'पियानो' का सुंदर प्रयोग हुआ है. तो लीजिए पेश है 'ओल्ड इस गोल्ड' में "जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम". गीतकार हैं कैफ़ी आज़मी.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. हेलन के लिए आशा का गाया एक और क्लब सोंग.
२. बर्मन दा सीनियर का संगीत.
३. मुखड़े में शब्द है -"पगले"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
पारुल ने तो रंग ही जमा दिया इस बार, मनु जी आप हर बार पीछे छूट जाते हैं...:), शोभा जी आते रहिये, महफिल आप से ही रोशन है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




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रामराज्य बापू का सपना, इस धरती पर लाओ राम



रामनवमी पर सुनिए अमीर खुसरो, कबीर, तुलसी और राकू को

वैष्णव हिन्दू हर वर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को अपने भगवान श्रीराम के जन्मदिवस का त्योहार मनाते हैं। वर्ष २००९ में यह तिथि ३ अप्रैल को आयी है, इस दिवस पर रामनवमी नाम का त्यौहार मनाया जाता है। पुराण-कथाओं के अनुसार श्री राम को विष्णु का सातवाँ अवतार माना जाता हैं। मान्यता है कि तीनों लोकों में धर्म की स्थापना के लिए ब्रह्म, विष्णु और महेश (शिव) नामक तीन तंत्र हैं और इनके काउँटरपार्टों की भी संकल्पना की गई है।

रामनवमी का त्योहार इस बात की याद दिलाता है कि मनुष्य को धर्म में आस्था कभी नहीं छोड़नी चाहिए। अधर्म कितना भी अपना अंधकार फैला ले, भगवान देर ही सही अभय प्रकाश लेकर ज़रूर अवतरित होते हैं। रामायण की कथा में महर्षि वाल्मिकी लिखते हैं कि अयोध्या के राजा दशरथ की तीन पत्‍नियाँ होने के बावज़ूद उन्हें कोई पुत्र नहीं था। दशरथ को अपने राजवंश के खत्म होने का डर था। शंका से ग्रस्त राजा दशरथ को वशिष्ठ ऋषि ने आशा का छोर न छोड़ने की सलाह दी और पुत्र-प्राप्ति के लिए यज्ञ करने का रास्ता दिखलाया। पुत्र-कामेष्टि यज्ञ के अनुष्ठान के फलस्वरूप दशरथ को ४ पुत्रों का प्रसाद मिला था, जिसमें सबसे पहले भगवान विष्णु ने राम के रूप में कौशल्या के गर्भ में अवतार लिया था।
प्रतीक रूप में इस त्योहार को मनाने का एक उद्देश्य यह भी है कि मनुष्य को अधर्म के खिलाफ जंग ज़ारी रखनी चाहिए, क्योंकि ईश्वर के यहाँ देर है, अंधेर नहीं है।

सुन लो मेरी मेरे रघुराई
लगादो पार नैइया मेरे रघुराई
भव-सागर को पार करा दो
सुन लो मेरी दुहाई
लगादो...............................
जन्म मरन का बंधन टूटे
छुट जाए आवा जाई
लगादो ............................
तेरे दरस को नैना तरसे
तुझसे लौ जो लगाई
लगादो ............................
आँख पड़ा है लोभ का परदा
देता कुछ न दिखाई
लगादो ..........................
वचन की खातिर वन को चल गए
रघुकुल रीत निभाई
लगादो पार....................

-रचना श्रीवास्तव
महाकाव्य रामायण के तुलसी-संस्करण 'राम चरित मानस' के राम भारत के जन-जन में बसे हैं। राम भारत का इतना प्रभावशाली व्यक्तित्व है कि इसने भारत के भूत और वर्तमान दोनों को बराबर रूप में प्रभावित किया है। राम चरित मानस के बराबर साहित्य की कोई और कृति दुनिया में कहीं भी इस तरह से लोगों की रूह में नहीं समा सकी।

शोखी-ए-हिन्दू ब बीं, कुदिन बबुर्द अज खास ओ आम,
राम-ए-मन हरगिज़ न शुद हर चंद गुफ्तम राम राम।
-------अमीर खुसरो,
(हर आम और खास जान ले कि राम हिंद के शोख, शानदार शख्सियत हैं। राम मेरे मन में हैं और हरगिज़ न अलग होंगे, जब भी बोलूँगा राम राम बोलूँगा।)

क्रांतिकारी कवि कबीर ने भी राम को तरह-तरह के प्रतीकों में इस्तमाल किया। एक दोहा देखें

राम मिले निर्भय भय ,रही न दूजी आस
जाई सामना शब्द में राम नाम विस्वास
..........संत कबीर दास

तुलसीदास ने कहा-

नीलाम्बुजं श्यामलकोमलांगम्, सीतासमारोपितवामभागम्।
पाणौमहासायकचारुचापम्, नमामिरामम् रघुवंशनाथम्।।


नमामि रामम्
लेकिन हम बात करने जा रहे हैं एक ख़ास गीत की जिसमें महात्मा गाँधी का रामराज्य के सपने को याद किया गया है। इस गीत के संकल्पनाकर्ता राजकुमार सिंह 'राकू' अपने श्रीराम से कृपा करने की गुहार लगा रहे हैं। कह रहे हैं कि 'रामराज्य बापू का सपना, इस धरती पर लाओ राम'। सुनें-


(हमेशा सुनने के लिए डाऊनलोड करें)
इस गीत में शुरू में अमीर खुसरों के बोल हैं। उसके बाद कबीरदास के, फिर तुलसीदास के और शेष गीत राकू ने खुद लिखा है।

राकू
राकू ने इस गीत को 'नाममि रामम्' नाम दिया है। राकू कहते हैं-
" 'नमामि रामम्' एक विनम्र आदरांजलि है हमारी अमर धरोहर श्री राम कों जो वस्तुतः किसी भी धर्म, भाषा, क्षेत्र से परे हैं। अमीर खुसरो, कबीर और संत तुलसीदास जैसे महान कवियों ने हमारी इस सांस्कृतिक पहचान के प्रति अगाध श्रद्धा, प्रेम और सम्मान व्यक्त किया है।'नमामि रामम्'संगीत के माध्यम से उसी मान,निष्ठा और श्रद्धा को समर्पित अभिव्यक्ति है।"

इस गीत के एल्बम का लोकार्पण गांधी निर्वाण के दिन (३० जनवरी २००८ को) बापू के साबरमती आश्रम में, आश्रम के मुख्य ट्रस्टी ललित भाई मोदी के हाथों संपन्न हुआ था। जिसमें देश-विदेश से आये बहुत सारे महानुभाओं ने हिस्सा लिया और प्रार्थना सभा के बाद चर्चा भी की।

मुख्य बात जो कही गयी कि इस गीत में ' रामराज्य' लाने की कही गयी है और वह 'रामराज्य' बापू के ही रामराज्य की परिकल्पना है।

बापू के 'रामराज्य' की परिकल्पना
राष्ट्रपिता बापू के संघर्ष का लक्ष्य था 'रामराज्य', जिसकी शुरूआत 'अन्त्योदय' से होनी थी यानी समाज के सबसे पिछडे की सेवा सर्वप्रथम, का वादा था। इसी क्रम से सम्पूर्ण समाज के सम्पूर्ण उदय का दर्शन था ' सर्वोदय'।

गीत की टीम
प्रार्थना- अमीर खुसरो, संत कबीर और संत तुलसी दास
निवेदन और गीत- राजकुमार सिंह 'राकू'
संगीत- विवेक अस्थाना एवं राकू

गायक- राजा हसन तथा सुमेधा [२००७ के सा रा गा मा के अंतिम चरण के विजेता]
प्रोग्रामिंग तथा डिजाइन- न्रिपंशु शेखर
रिकॉर्डिस्ट- साहिल खान
वाद्य:
सितार-
उमाशंकर शुक्ल, बांसुरी- विजय ताम्बे, हारमोनियम- फिरोज़ खान
रिदम- मकबूल खान व ताल वाद्य- शेखर
कोरस(साथी गायक)- नीलेश ब्रह्मभट्ट, संगम उपाध्याय, हिमांशु भट्ट, शोभा सामंत, सुगन्धा लाड, संजय कुमार
रिकॉर्डिंग- आर्यन्स स्टूडियो (मुंबई)

अमीर खुसरो (१२५३-१३२५)- एक संक्षिप्त परिचय
कवी, संगीतज्ञ, इतिहासकार, बहुभाषा शास्त्री और इन सब से बढ़ एक सूफी संगीत वाहक, जिसने शांति, सद्‍भाव, भाईचारा और सर्वधर्म समभाव को बताया और जिया। फारसी, तुर्की, अरबी और संस्कृत के विद्वान जिसने हिंदी-उर्दू (जिसे वे 'हिंदवी' कहते थे) में ही रचनाएँ नहीं की बल्कि हिंदी की बोलियों ब्रज और अवधी वगैरह में भी गीत लिखे। फारसी में लिखा उनका विशाल भंडार भी है। ' हिंदवी' के पहले कवी जिन्होंने न इस भाषा को गढ़ा बल्कि हजारों गीतों, दोहों, पहेलियों, कह्मुकर्नियों आदि हर विधा में लिखा और गाया भी। उसमें समाई मानवीय करुणा से सबका मन जीता और अस्सीम सम्मान और प्यार पाया।
बहुत ही आला संगीत प्रेमी जिन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रतिमान गढ़े, जो आज तक निरंतर बने हुए हैं। उन्होंने पखावज से तबले का इज़ाद किया और वीणा को सितार का रूप दिया। महान सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया के प्रिय शिष्य रहे। जिन्होंने उनके भीतर समग्र मानवता के लिए एक गहरी सोच, करुणा, स्नेह और प्रेम भर दिया। यही 'खुसरो' को उस उच्चता पर प्रतिष्ठित करता है जिसकी अगली कड़ियाँ कबीर, सूर, तुलसी, नानक, मीरा, नामदेव, रैदास आदि उच्च संतों में प्रतिध्वनित होती हैं। यही भारत के इस महानतम पुत्र की उच्चता का पड़ाव है। ' खुसरो' खुद को 'तुतिये हिंद' यानी हिंद का तोता कहते थे, जो मीठा बोलता है.............. ' राम-राम' बोलता है। महान कवि ग़ालिब ने ये पूछे जाने पर की उनकी शायरी में इतनी मिठास कैसे? लिखा...........

" ग़ालिब मेरे कलाम में क्यूं कर मजह न हो,
पीता हूँ धो के खुसरावो शीरीं सुखन के पाँव।"



Thursday, April 2, 2009

है इसी में प्यार की आबरू....लता की आवाज़ में कसक दर्द की



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 40

हते हैं कि प्यार अंधा होता है. दिमाग़ कहता है कि वो बेवफा है, लेकिन दिल है कि उनसे वफ़ा पे वफ़ा किये जा रहा है. शायद इसलिए कि दिल यह नहीं चाहता कि उसका प्यार बदनाम हो, बे-आबरू हो. "वो मेरे यादों से जाते नहीं हैं, नींद भी अब एक पल को आती नहीं है, गम की बातों में बस डूबा है दिल, बात कोई और दिल को भाती नहीं है". दर्द में कोई मौसम प्यारा नहीं होता, दिल हो प्यासा तो पानी से गुज़ारा नहीं होता, कोई देखे तो हमारी बेबसी, हम सभी के हो जाते हैं, पर कोई हमारा नहीं होता. मुझे गम भी उनका अज़ीज़ है, यह उन्ही की दी हुई चीज़ है. दिल तो वफ़ा पे वफ़ा किये जा रहा है लेकिन वो वफ़ा भी अगर रिश्ते को बचा ना सके तो फिर दिल क्या करे! कुछ ऐसी ही बात कही गयी है हमारे आज के 'ओल्ड इस गोल्ड' के गीत में. और इतनी खूबसूरत अंदाज़ में कहा गया है कि गीत एक सदाबहार नग्मा बनकर रह गया है. रजा मेहंदी अली खान, मदन मोहन, लता मंगेशकर, और एक फिल्मी ग़ज़ल, और क्या चाहिए दोस्तों, कमाल तो होना ही था!

1962 की फिल्म "अनपढ़" में ऐसे ही दो ग़ज़लें लताजी की थी जिन्हे पर्दे पर माला सिन्हा ने गाया था. "आपकी नज़रों ने समझा प्यार के क़ाबिल मुझे" और "है इसी में प्यार की आबरू, वो जफ़ा करे मैं वफ़ा करूँ". इससे पहले कि आप ग़ज़ल सुने, ज़रा पढिये तो सही कि नौशाद साहब ने विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में इन दो ग़ज़लों के बारे में क्या कहा था - "मैने एक बार 'रेडियो' सुन रहा था, उसमें बहुत ही दिलकश ग़ज़ल आ रही थी, फिल्म थी अनपढ़, ग़ज़ल के बोल थे "है इसी में प्यार की आबरू". मैने 'म्यूज़िक डाइरेक्टर' का नाम पता किया, मरहूम मदन मोहन साहब. मैने उनसे 'अपायंटमेंट' लिया और उनके घर पहुँच गया. मैने उनसे कहा कि मैं यह कहने आया हूँ कि आपकी अनपढ़ फिल्म की यह दो ग़ज़लें मुझे बहुत पसंद आयी, आपकी यह दो ग़ज़लें एक तरफ और मेरे सारे गाने एक तरफ. यह सुनकर मदन मोहन मेरे गले लगकर रोने लगे, कहा कि आप मुझसे काफ़ी 'सीनियर' हैं, मैं तो आपका 'जूनियर' हूँ. मैने कहा कि 'नहीं, जो सच है वो सच है, और मैं यह सबके सामने भी कहूँगा'. कुछ दिनों बाद एक 'ग्रामोफोन कंपनी' के जलसे में 'प्रेस' और पूरी 'पब्लिक' के सामने मैने यही बात कही." देखा दोस्तों आपने कि उस ज़माने में एक फनकार दूसरे फनकार की किस तरह से क़द्र किया करते थे! यही तो है सच्चे फनकार की निशानी. तो अब सुनिए "है इसी में प्यार की आबरू".



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. खय्याम साहब ने इस फिल्म में शर्मा जी के नाम से संगीत दिया था.
२. रफी लता का क्लासिक दोगाना, गीतकार हैं कैफी आज़मी.
३. मुखड़े में शब्द है - "खेल"

पिछली पहेली का परिणाम -
हमें लगा नौशाद साहब का नाम आने से सुविधा हो जायेगी. पर सब अंदाजे ही लगाते रहे. फिर भी नीरज जी ने दूसरी कोशिश में कैच लपक ही लिया. बहुत बढ़िया. दिलीप जी जानकारी को आगे बढ़ाने के लिए धन्येवाद. आपकी आवाज़ में अगर इस गीत की कोई रिकॉर्डिंग उपलब्ध हों तो भेजें.

कुछ याद आया...?



खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

अखियाँ नु चैन न आवें....नुसरत बाबा का रूहानी अंदाज़ महफ़िल-ए-ग़ज़ल में



महफ़िल-ए-ग़ज़ल # ०१

ब तो आ जा कि आँखें उदास बैठी हैं,
भूलकर होश-औ-गुमां बदहवास बैठी हैं।


इश्क की कशिश हीं ऎसी है कि साजन सामने हो तो भी कुछ न सूझे और दूर जाए तब भी कुछ न सूझे। इश्क की तड़प हीं ऎसी है कि साजन आँखों में हो तो दिल को सुकूं न मिले और दिल में हो तो आँखों में कुछ चुभता-सा लगे। रूह तब तक मोहब्बत के रंग में नहीं रंगता जब तक पोर-पोर में साजन की आमद न हो। लेकिन अगर दिल की रहबर "आँखें" हीं साजन के दरश को प्यासी हों तो बिन मौसम सावन न बरसे तो और क्या हो। यकीं मानिए सावन बारहा मज़े नहीं देता :

आँखों से अम्ल बरसे जो दफ़-अतन कभी,
छिल जाए गीली धरती,खुशियाँ जलें सभी।


बाबा नुसरत ने कुछ ऎसे हीं भावों को अपने मखमली आवाज़ से सराबोर किया है। "बैंडिट क्वीन" से यह पंजाबी गीत आप सबके सामने पेशे खिदमत है।



शाइर वो क्या जो न झांके खुद के अंदर में,
क्या रखा है खल्क-खुल्द, माह-औ-मेहर में?


साहिर ने प्यासा में कहा है: "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है" । इस सुखन के हरेक हर्फ़ से कई मायने निकलते हैं,जो ज़िंदगी को सच्चाई का आईना दिखाते हैं । एक मायना यह भी निकलता है कि "अगर बशर(इंसान) को अपनी खुदी पर यकीं न हो , अपनी हस्ती का दंभ न हो, तो चाहे उसे सारी दुनिया हीं यों न मिल जाए , इस उपलब्धि का कोई फायदा नहीं।" जब तक इंसान अपने अंदर न झांके ले और अपनी ताकत का गुमां न पाल ले, तवारीख़ गवाह है कि उसे कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। जो इंसान अपने दिल की सुनता है और खुद के बनाए रास्तों पर चलता है उसे सारी दुनिया एक तमाशे जैसी लगती है और सारी दुनिया को वह कम-अक्ल से ज़्यादा कुछ नहीं। फिर सारी दुनिया उसे नसीहतें
देनी शुरू कर देती है। सच हीं है:

मेरी खु़दी से रश्क जो मेरा खु़दा करे,
नासेह न बने वो तो और क्या करे।


मिर्जा असदुल्लाह खां "गालिब" ने कहा है कि -
"मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
ये देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।"

ग़ालिब की इस गज़ल को कई सारे गुलूकारों ने अपनी आवाज़ से सजाया है। आईये आज हम इस गज़ल को "मोहम्मद रफ़ी" की आवाज़ में सुनते हैं और महसूस करते हैं कि इस गज़ल के एक-एक शेर में कितनी कहानियाँ छिपी हुई हैं।



चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक ख़ास शब्द होगा जो मोटे अक्षर में छपा होगा. वही शब्द आपका सूत्र है. आपने याद करके बताना है हमें वो सभी शेर जो आपको याद आते हैं जिसके दो मिसरों में कहीं न कहीं वही शब्द आता हो. आप अपना खुद का लिखा हुआ कोई शेर भी पेश कर सकते हैं जिसमें आपने उस ख़ास शब्द का प्रयोग क्या हो. तो खंगालिए अपने जेहन को और अपने संग्रह में रखी शायरी की किताबों को. आज के लिए आपका शेर है - गौर से पढिये -

बदला न अपने आपको जो थे वही रहे,
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे.

उदहारण के लिए उपरोक्त शे'र में जो बोल्ड शब्द है वो है "अजनबी" अब एक और शे'र जिसमें "अजनबी" शब्द आता है वो ये हो सकता है -
हम कुछ यूँ अपनी जिंदगी से मिले,
अजनबी जैसे अजनबी से मिले...

चलिए अब कुछ आप अर्ज करें...

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -'शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, April 1, 2009

एक चतुर नार करके शृंगार - ऐसी मस्ती क्या कहने...



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 39

ज तो 'ओल्ड इस गोल्ड' की महफ़िल में होने जा रहा है एक ज़बरदस्त हंगामा, क्योंकि आज हमने जो गीत चुना है उसमें होनेवाला है एक ज़बरदस्त मुक़ाबला. यह गीत ना केवल हंगामाखेज है बल्कि अपनी तरह का एकमात्र गीत है. इस गीत के बनने के बाद आज 40 साल गुज़र चुके हैं, लेकिन इस गीत को टक्कर दे सके, ऐसा कोई गीत अब तक ना बन पाया है और लगता नहीं भविष्य में भी कभी बन पाएगा. ज़्यादा भूमिका ना बढाते हुए आपको बता दें कि यह वही गीत है फिल्म "पड़ोसन" का जिसे आप कई कई बार सुन चुके होंगे, लेकिन जितनी बार भी आप सुने यह नया सा ही लगता है और दिल थाम कर गाना पूरा सुने बगैर रहा नहीं जाता. जी हाँ, आज का गीत है "एक चतुर नार करके शृंगार". 1968 में फिल्म पड़ोसन बनी थी जिसमें किशोर कुमार, सुनील दत्त, सायरा बानो और महमूद ने अभिनय किया था. अभिनय क्या किया था, इन कलाकारों ने तो जैसे कोई हास्य आंदोलन यानी कि 'लाफ रोइट्स' ही छेड दिया था. 'सिचुयेशन' यह थी कि सुनील दत्त अपनी पडोसन सायरा बानो पर मार मिटे थे लेकिन सायरा बानो उन्हे भाव भी नहीं दे रही थी. तो जब संगीत मास्टर के रूप में महमूद सायरा बानो को गाना सिखाने आते हैं तो सुनील दत्त अपने दोस्तों के साथ मिलकर उन्हे परेशान करते हैं. और इन दोस्तों में शामिल थे कोई और नहीं बल्कि हमारे किशोर-दा. ऐसे असाधारण 'सिचुयेशन' पर एक कामयाब गीत लिखना और उससे लोगों के दिलों तक पहुँचाना कोई आसान काम नहीं था. लेकिन पड़ोसन की पूरी 'टीम' ने जो कमाल इस गाने में कर दिखाया है उसका शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता. इसका सिर्फ़ और सिर्फ़ सुनकर ही आनंद उठाया जा सकता है.

कहा जाता है कि भले ही राजेंदर कृष्ण ने यह गीत लिखा है और आर डी बर्मन ने संगीतबद्ध किया है, लेकिन इस गीत में किशोर कुमार ने भी कई चीज़ें अपनी ओर से डाली थी और इस गाने का जो अलग अंदाज़ नज़र आता है वो उन्ही की बदौलत है. इस गीत में मन्ना डे को महमूद के लिए 'प्लेबॅक' करना था. क्योंकि महमूद फिल्म में एक शास्त्रिया गायक के चरित्र में थे और उन दिनों मन्ना डे उनके लिए पार्श्वगायन किया करते थे, इसलिए जब महमूद और उस पर शास्त्रिया संगीत की बात आई तो मन्ना डे के अलावा किसी और के बारे में सोचा तक नहीं गया. लेकिन मन्ना डे को एक बात खटक रही थी की उस गीत में जो मुक़ाबला होता है उसमें महमूद हार जाते हैं. उन्हे यह बात ज़रा पसंद नहीं आई की एक अच्छा शास्त्रिया गायक होने के बावजूद उन्हे एक ऐसे गायक किशोर से हारना होगा जिसे शास्त्रिया संगीत नहीं आती. लेकिन वो आखिर मान गये और हमें मिला हास्य गीतों का यह सरताज गाना. एक बात और आपको यहाँ बता दें कि किशोर कुमार का जो चरित्र इस फिल्म में था वो प्रेरित था शास्त्रीय गायक धनंजय बेनर्जी से जो कि उन्ही के रिश्तेदार थे. लेकिन ऐसा भी पढ्ने सुनने में आता है कि किशोर ने अपनी आँखों की मुद्राएँ खेमचंद प्रकाश से नकल की, जो एक अच्छे नर्तक भी थे. और चलने का अंदाज़ उन्होने नकल किया बर्मन दादा, यानी कि एस डी बर्मन का. दोस्तों, आप शायद बेक़रार हो रहे होंगे इस गीत को सुनने के लिए, तो मैं और ज़्यादा आपका वक़्त ना लेते हुए पेश करता हूँ आज का 'ओल्ड इस गोल्ड', सुनिए...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. ये वो ग़ज़ल है जिस पर नौशाद साहब मर मिटे थे.
२. लता - मदन मोहन की बेमिसाल टीम.
३. कुछ और कहने की जरुरत है क्या ? :)

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर पारुल ने सबको मात दी, पारुल के साथ साथ नीरज जी, मनु जी को भी सही गीत पहचानने की बधाई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.





नयी शृंखलाओं से आबाद होगा "आवाज़" अब



आवाज़ पर संगीत के दो कामियाब सत्र पूरे हो चुके हैं. तीसरे सत्र को हम एक विशाल आयोजन बनाना चाहते हैं. अतः कुछ रुक कर ही इसे शुरू करने का इरादा है. जैसा की हम बता चुके हैं कि दूसरे सत्र के विजेताओं को फरवरी 2010 में पुरस्कृत किया जायेगा और तभी हिंद युग्म अपना दूसरा संगीत एल्बम भी जारी करेगा. आवाज़ प्रतिदिन कम से कम 2 संगीतभरी/आवाज़भरी प्रस्तुतियाँ प्रसारित करता है। आवाज़ पर मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रकार से तथा निम्नलिखित प्रकार के आयोजन होते हैं।

संगीतबद्ध गीत- हिन्द-युग्म आवाज़ के माध्यम से इंटरनेट पर ही संगीत तैयार करता आया है। इसके अंतर्गत आवाज़ के नियंत्रक व संपादक सजीव सारथी गीतकार, संगीतकार और गायकों को जोड़ते रहे हैं। इस परम्परा की शुरूआत सर्वप्रथम हिन्द-युग्म के सजीव सारथी ने ही की। जब सजीव ने इस माध्यम से बना अपना पहला गीत 'सुबह की ताज़गी' को इंटरनेट पर रीलिज किया। इस गीत में हैदराबाद के इंजीनियर संगीतकार ऋषि एस॰ ने संगीत दिया था और गीत को गाया था नागपुर के सुंदर गायक सुबोध साठे ने। जल्द ही हिन्द-युग्म इस माध्यम से बना अपना पहला एल्बम 'पहला सुर' को विश्व पुस्तक मेला 2008 में रीलिज किया। इस एल्बम में 10 संगीतबद्ध गीतों के साथ-साथ 10 कविताओं को भी संकलित किया गया। पूरा एल्बम यहाँ सुनें

संगीतबद्ध गीतों के रीलिज करने के दूसरे सत्र की शुरूआत 4 जुलाई 2008 से हुई। तब से लेकर 31 दिसम्बर 2008 तक हिन्द-युग्म ने प्रत्येक शुक्रवार को एक नया संगीतबद्ध गीत ज़ारी किया। इस सत्र में कुल 27 गीतों को ज़ारी किया। जिसमें से 5 निर्णायकों के सहयोग से बेहतर 10 गीत चुनने का काम किया गया। सरताज़ गीत का चयन हुआ। श्रोताओं की पसंद से भी एक गीत का चुनाव हुआ। पूरा परिणाम यहाँ देखें।
सभी 27 संगीतबद्ध गीतों की सूची यहाँ है।

संगीतबद्ध गीतों की यह शृंखला यही नहीं खत्म होती। इसके अतिरिक्त आवाज़ समय-समय पर नये-नये संगीतकारों-कलाकारों को लॉन्च करता रहा है। इस कड़ी में कुछ और गीत यहाँ सुने जा सकते हैं-

अभी सिलसिला ज़ारी है।

ओल्ड इज़ गोल्ड- सुजोय चटर्जी द्वारा संचालित "ओल्ड इस गोल्ड" आवज़ का बहुत ही लोकप्रिय स्तम्भ है। प्रतिदिन शाम ६.३० पर प्रसारित होने वाले इस कार्यक्रम में हम रोज एक पुराने सदाबहार गीत को सुनते हैं और उसपर कुछ चर्चा भी करते हैं। गीत से जुड़ी दुर्लभ जानकारियाँ लेकर आते हैं सुजोय। इसकी शुरूआत 20 फरवरी 2009 को 'आपको प्यार छुपाने की बुरी आदत है' गीत की चर्चा से हुई। इस शृंखला में अब तक 60 गीतों की चर्चा हो चुकी है। पूरी सूची यहाँ देखें।

महफ़िल-ए-ग़ज़ल- ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -'शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

बात एक एल्बम की - "बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार, तो हर मंगलवार इस आयोजन का हिस्सा अवश्य बनें.

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत- "रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

इन नयी श्रृंखलाओं के अलावा अनुराग शर्मा द्वारा संचालित "सुनो कहानी" का प्रसारण हर शनिवार और माह के अंतिम रविवार को मृदुल कीर्ति द्वारा संचालित होने वाले "पॉडकास्ट कवि सम्मलेन" का प्रसारण तथावत जारी रहेगा. हम उम्मीद करेंगे कि श्रोताओं को आवाज़ का ये नया रूप पसंद आएगा. अपने विचारों से हमें अवगत कराते रहें.



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