Tuesday, December 7, 2010

वो न आयेंगें पलट के, उन्हें लाख हम बुलाएं....मुबारक बेगम की आवाज़ में चंद्रमुखी के जज़्बात



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 543/2010/243

'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' - 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला के तीसरे खण्ड में इन दिनों आप सुन रहे हैं बिमल रॊय निर्देशित फ़िल्मों के गीत और बिमल दा के फ़िल्मी यात्रा का विवरण। कल बात आकर रुकी थी 'परिणीता' में। १९५४ से अब बात को आगे बढ़ाते हैं। इस साल बिमल दा के निर्देशन में तीन फ़िल्में आईं - 'नौकरी', 'बिराज बहू' और 'बाप-बेटी'। 'नौकरी' 'दो बीघा ज़मीन' का ही शहरीकरण था। फ़िल्म में किशोर कुमार को नायक बनाया गया था, लेकिन यह फ़िल्म 'दो बीघा ज़मीन' जैसा कमाल नहीं दिखा सकी, हालाँकि "छोटा सा घर होगा बादलों की छाँव में" गीत ख़ूब लोकप्रिय हुआ। 'बिराज बहू' भी शरतचन्द्र की इसी नाम की उपन्यास पर बनी थी जिसका निर्माण किया था हितेन चौधरी ने। 'नौकरी' और 'बिराज बहू' में सलिल दा का संगीत था, लेकिन 'बाप-बेटी' में संगीत दिया रोशन ने। फिर आया साल १९५५ और एक बार फिर शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की लोकप्रिय उपन्यास 'देवदास' पर बिमल रॊय ने फ़िल्म बनाई। १९३५ में प्रमथेश चन्द्र बरुआ ने पहली बार न्यु थिएटर्स में 'देवदास' का निर्माण किया था और उस समय बिमल दा उनके सहायक थे। इसके २० साल बाद, १९५५ में बिमल दा ने अपने तरीक़े से 'देवदास' को फ़िल्मी पर्दे पर उतारा। सहगल साहब की छवि देवदास की भूमिका में सब के दिल में बैठ चुकी थी। ऐसे में फिर से 'देवदास' बनाना ख़तरे से ख़ाली नहीं था। लेकिन बिमल दा ने यह रिस्क लिया और दिलीप कुमार को देवदास के रूप में उतारा। वैसे भी दिलीप साहब के अलावा किसी और की कल्पना उस वक़्त देवदास के रूप में नहीं की जा सकती थी। सबकी उम्मीदों पर खरा उतरकर दिलीप साहब को इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। सुचित्रा सेन और वैजयंतीमाला ने क्रम से पारो और चन्द्रमुखी की भूमिकाएँ निभाईं।

बिमल रॊय की शान में 'देवदास' के नायक दिलीप कुमार ने कहा है - "Nobody has ever mentioned that while shooting in the suburbs of Bombay – behind his own Mohan studio, in Andheri or other selected exteriors, Bimal Roy captured the very ethos of rural Bengal. He did not need to go there. To me it was an education to work with him. In my formative year it was important to work with a director who lead you gently under the skin of the character. Today we have institutions, they teach cinema, acting etc. We did not have these in our times. We had instead directors like Bimal Roy. Add to this my own application as an actor. Take making Devdas. The question often while doing my role was ‘not to do’ than do anything." फ़िल्म 'देवदास' के दो गीत हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं - "जिसे तू क़ुबूल कर ले" और "आन मिलो श्याम सांवरे"। आज हम आपको सुनवा रहे हैं मुबारक़ बेगम की आवाज़ में "वो ना आएँगे पलटकर, उन्हें लाख हम बुलाएँ, मेरी हसरतों से यह कहदो मेरे ख़्वाब भूल जाए"। यह गीत मुबारक़ बेगम की सब से लोकप्रिय गीतों में से एक है, हालाँकि यह गीत भी मुबारक़ बेगम के कई फ़िल्मों के कईगीतों की तरह इस फ़िल्म में भी पूरा नहीं लिया गया। राग खमाज पर आधारित इस मुजरे में सारंगी का सुंदर इस्तेमाल सुनने को मिलता है। यकीनन इस गीत को चंद्रमुखी (वैजयंतीमाला) पर फ़िल्माया गया होगा। फ़िल्म 'देवदास' में बिमल दा ने अपने साथी सलिल चौधरी को ना लेकर संगीतकार के रूप में चुना सचिन देव बर्मन को और गीतकार के रूप में शैलेन्द्र की जगह ले ली साहिर लुधियानवी ने। तो लीजिए इस ख़ूबसूरत मुजरे को सुनिए मुबारक़ जी की मिट्टी की सौंधी सौंधी ख़ुशबूदार आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि गायिका मुबारक़ बेगम को पढ़ना लिखना नहीं आता था, रेकॊर्डिंग् में उनकी बेटी उनके साथ जाती थी और गीत लिख लेती थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०४ /शृंखला ०५
गीत का इंटर ल्यूड सुनिए-


अतिरिक्त सूत्र - बिमल रॉय की एक और नायाब फिल्म.

सवाल १ - गायिका कौन हैं इस गीत की - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी ने एक बार फिर बढ़त बना ली है, रोमेंद्र जी सही कहा आपने, वाकई इस देवदास का जवाब नहीं...इंदु जी आप पर इल्जाम लगाएं....इतनी हिम्मत कहाँ हमने...और वैसे भी आप है ही इतनी प्यारी कि एक दिन भी न दिखें तो हमें कमी खलती है :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सुर्खियों से बुनती है मकड़ी की जाली रे.. "नो वन किल्ड जेसिका" के संगीत की कमान संभाली अमित-अमिताभ ने



सुजॉय जी की अनुपस्थिति में एक बार फिर ताज़ा-सुर-ताल की बागडोर संभालने हम आ पहुँचे हैं। जैसा कि मैंने दो हफ़्ते पहले कहा था कि गानों की समीक्षा कभी मैं करूँगा तो कभी सजीव जी। मुझे "बैंड बाजा बारात" के गाने पसंद आए थे तो मैंने उनकी समीक्षा कर दी, वहीं सजीव जी को "तीस मार खां" ने अपने माया-जाल में फांस लिया तो सजीव जी उधर हो लिए। अब प्रश्न था कि इस बार किस फिल्म के गानों को अपने श्रोताओं को सुनाया जाए और ये सुनने-सुनाने का जिम्मा किसे सौंपा जाए। अच्छी बात थी कि मेरी और सजीव जी.. दोनों की राय एक हीं फिल्म के बारे में बनी और सजीव जी ने "बैटन" मुझे थमा दिया। वैसे भी क्रम के हिसाब से बारी मेरी हीं थी और "मन" के हिसाब से मैं हीं इस पर लिखना चाहता था। अब जहाँ "देव-डी" और "उड़ान" की संगीतकार-गीतकार-जोड़ी मैदान में हो, तो उन्हें निहारने और उनका सान्निध्य पाने की किसकी लालसा न होगी।

आज के दौर में "अमित त्रिवेदी" एक ऐसा नाम, एक ऐसा ब्रांड बन चुके हैं, जिन्हें परिचय की कोई आवश्यकता नहीं। अगर यह कहा जाए कि इनकी सफ़लता का दर (सक्सेस-रेट), सफ़लता का प्रतिशत... शत-प्रतिशत है, तो कोई बड़बोलापन न होगा। "आमिर" से हिन्दी-फिल्म-संगीत में अपना पदार्पण करने वाले इस शख्स ने हर बार उम्मीद से बढकर (और उम्मीद से हटकर) गाने दिए हैं। इनके संगीत से सजी अमूमन सारी हीं फिल्में चली हैं, लेकिन अगर फिल्म फ़्लॉप हो तब भी इनके गानों पर कोई उंगली नहीं उठती, गाने तब भी उतने हीं पसंद किए जाते हैं। मुझे नहीं पता कि कितने लोगों ने "एडमिशन्स ओपन" नाम की फिल्म देखी है... मैंने नहीं देखी, लेकिन इसके गाने ज़रूर सुने हैं और ये मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इस फिल्म के गाने कई सारी बड़ी (और सफ़ल) फिल्मों के गानों से बढकर हैं। ऐसा कमाल है इस इंसान के सुर-ताल में... इसके वाद्य-यंत्रों में..

जहाँ लोग "अमित त्रिवेदी" के नाम से इस कदर परिचित हैं, वहीं एक शख्स है (अमिताभ भट्टाचार्य), जो हर बार अमित के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता रहा है, अब भी चल रहा है, लेकिन उसे बहुत हीं कम लोग जानते हैं। इतना कम कि अंतर्जाल पर इनके बारे में कहीं भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है (विकिपीडिया भी मौन है)। यह वो इंसान है, जिसने देव-डी का "नयन तरसे" लिखा, "इमोसनल अत्याचार" के रूप में युवा-पीढी को उनका ऐंथम दिया, जिसने उड़ान के सारे गाने लिखे ("आज़ादियाँ", "उड़ान", "नया कुछ नया तो ज़रूर है", "कहानी खत्म है"), जिसने अमित के साथ मिलकर "आमिर" में उम्मीदों की "एक लौ" जलाई, जिसने "वेक अप सिड" में रणबीर का दर्द अपने शब्दों और अपनी आवाज़ के जरिये "इकतारा" से कहवाये... (ऐसे और भी कई उदाहरण हैं)। बुरा लगता है यह जानकर कि इस इंसान को कुछ गिने-चुने लोग हीं पहचानते हैं। कहीं इसकी वज़ह ये तो नहीं कि "यह इंसान" एक गीतकार है.. संगीतकार या गायक होता तो लोग इसे हाथों-हाथ लेते... गाने में एक गीतकार का महत्व जाने कब जानेंगे लोग!!

अमित और अमिताभ की बातें हो गईं.. अब सीधे चला जाए आज की फिल्म और आज के गानों की ओर। मुझे उम्मीद है कि हमारे सभी पाठक और श्रोता "जेसिका लाल हत्याकांड" से वाकिफ़ होंगे, किस तरह उनकी हत्या की गई थी, किस तरह उनकी बहन शबरीना ने मीडिया का सहयोग लेकर न्याय पाने के लिए एंड़ी-चोटी एक कर दी और किस तरह आखिरकार न्यायपालिका ने हत्याकांड के मुख्य आरोपी "मनु शर्मा" को अंतत: दोषी मानते हुए कठिनतम सज़ा का हक़दार घोषित किया। ये सब हुआ तो ज़रूर, लेकिन इसमें दसियों साल लगे.. इस दौरान कई बार शबरीन टूटी तो कई बार मीडिया। "केस" के शुरूआती दिनों में जब सारे गवाह एक के बाद एक मुकर रखे थे, तब खुन्नस और रोष में "टाईम्स ऑफ़ इंडिया" ने यह सुर्खी डाली थी- "नो वन किल्ड जेसिका"। राजकुमार गुप्ता" ने यही नाम चुना है अपनी अगली फिल्म के लिए।

चलिए तो इस फिल्म का पहला गाना सुनते हैं। अदिति सिंह शर्मा, श्रीराम अय्यर और तोची रैना की अवाज़ों में "दिल्ली, दिल्ली"। "परदेशी" के बाद तोची रैना अमित के लिए नियमित हो गए हैं। अदिति सिंह शर्मा भी देव-डी से हीं फिल्मों में नज़र आनी शुरू हुईं। अमित की "दिल्ली-दिल्ली" रहमान की "ये दिल्ली है मेरे यार" से काफी अलग है। "मेरा काट कलेजा दिल्ली.. अब जान भी ले जा दिल्ली" जहाँ दिल्ली में रह रहे एक इंसान का दर्द बयान करती है (भले हीं तेवर थोड़े मज़ाकिया हैं), वहीं "ये दिल्ली है मेरे यार" में दिल्ली (विशेषकर दिल्ली-६) की खूबियों के पुल बाँधे गए थे। संगीत के मामले में मुझे दोनों गाने एक जैसे हीं लगे.. "पेप्पी".. जिसे आप गुनगुनाए बिना नहीं रह सकते। "दिल्ली.. दिल्ली" आप ज्यादा गुनगुनाएँगे क्योंकि इसके शब्द जमीन से अधिक जुड़े हैं.. दिल्ली की हीं भाषा में "दिल्ली-दिल्ली" के शब्द गढे गए हैं (दिल्ली-६ में प्रसून जोशी दिल्ली का अंदाज़ नहीं ला पाए थे)। इस गाने का एक "हार्डकोर वर्सन" भी है, जिसमें संगीत को कुछ और झनकदार (चटकदार) कर दिया गया है। मुझे इसके दोनों रूप पसंद आए। आप भी सुनिए:

दिल्ली


दिल्ली हार्डकोर


अमिताभ भट्टाचार्य जब भी लिखते हैं, उनकी पूरी कोशिश रहती है कि वे मुख्यधारा के गीतकारों-सा न लिखें। वे हर बार अपना अलग मुकाम बनाने की फिराक में रहते हैं और इसी कारण "अन-कन्वेशनल" शब्दों की एक पूरी फौज़ उनके गानों में नज़र आती है। "बैंड बाजा बारात" के सभी गाने उनकी इसी छाप के सबूत हैं। मुमकिन है कि दूसरे संगीतकारों के साथ काम करते वक़्त उन्हें इतनी आज़ादी न मिलती हो, लेकिन जब अमित त्रिवेदी की बात आती है तो लगता है कि उनकी सोच की सीमा हीं समाप्त हो गई है। "जहाँ तक और जिस कदर सोच को उड़ान दे सकते हो, दे दो" - शायद यही कहना होता है अमित का, तभी तो "आली रे.. साली रे", जैसे गाने हमें सुनने को नसीब हो रहे हैं। "भेजे में कचूंबर लेकिन मुँह खोले तो गाली रे", "राहु और केतु की आधी घरवाली रे".. और ऐसे कितने उदाहरण दूँ, जो मुझे अमिताभ का मुरीद बनने पर बाध्य कर रहे हैं। यहाँ अमित की भी दाद देनी होगी, जिस तरह से उन्होंने गाने को "ढिंचक ढिंचक" से शुरू किया है और कई मोड़ लेते हुए "पेपर में छपेगी" पर खत्म किया है.. एक साथ एक हीं गाने में इतना कुछ करना आसान नहीं होता। मुझे इस गाने में "सुर्खियों से बुनती है मकड़ी की जाली रे" ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया। चूँकि यह गाना रानी मुखर्जी पर फिल्माया गया है जो एक "न्यूज़ रिपोर्टर" का किरदार निभा रही हैं तो वह रिपोर्टर "सुर्खियों" (सुर्खियों में...) से हीं अपने आस-पास की दुनिया बुनेगी। है ना?

आली रे


चलिए अब तीसरे गाने की ओर चलते हैं। इस गाने को अपनी आवाज़ें दी हैं जानेमाने लोकगायक "मामे खान" और जानेमाने रॉकस्टार "विशाल दादालनी" ने। इन दोनों का साथ दिया है रॉबर्ट ओमुलो (बॉब) ने। लोकगायक और रॉकस्टार एक साथ..कुछ अजीब लगता है ना? इसी को तो कहते हैं प्रयोग.. मैं पक्के यकीन के साथ कह सकता हूँ कि अमित इस प्रयोग में सफ़ल हुए हैं। अंग्रेजी बोलों के साथ रॉबर्ट गाने की शुरूआत करते हैं, फिर विशाल "पसली के पार हुआ ऐतबार", "चूसे है खून बड़ा खूंखार बन के" जैसे जोशीले और दर्दीले शब्दों को गाते हुए गाने की कमान संभाल लेते हैं और अंत में "दिल ऐतबार करके रो रहा है.. " कहते-कहते मामे खान गाने को "फ़ोक" का रंग दे देते हैं। गाने में वो सब कुछ है, जो आपको इसे एकाधिक बार सुनने पर मजबूर कर सकता है। तो आईये शुरूआत करते हैं:

ऐतबार


फिल्म का चौथा गाना है अमिताभ भट्टाचार्य, जॉय बरुआ, मीनल जैन (इंडियन आईडल फेम) और रमन महादेवन की आवाज़ों में "दुआ"। ये अलग किस्म की बेहतरीन दुआ है। "खोलो दिल की चोटों को भी" .. "खुदा के घर से, उजालें न क्यों बरसे" जैसे बेहद उम्दा शब्दों के सहारे "अमित-अमिताभ" ने लोगों से ये अपील की है कि रास्ते रौशन हैं, तुम्हें बस आगे बढने की ज़रूरत है, अपने दिल के दर्द को समझो, हरा करो और आगे बढो। और अंत में "मीनल जैन" की आवाज़ में "दुआ करो - आवाज़ दो" की गुहार "सोने पे सुहागा" की तरह काम करती है। आईये हम सब मिलकर यह दुआ करते हैं:

दुआ


देखते-देखते हम अंतिम गाने तक पहुँच गए हैं। "आमिर" के "एक लौ" की तरह हीं शिल्पा राव "ये पल" लेकर आई हैं। "एकल गानों" में शिल्पा राव का कोई जवाब नहीं होता। यह बात ये पहले भी कई बार साबित कर चुकी हैं। इसलिए मेरे पास नया कुछ कहने को नहीं है। अमित और अमिताभ का कमाल यहाँ भी नज़र आता है। "मृगतृष्णा" जैसे शब्दों का इस्तेमाल लोग विरले हीं गानों में करते हैं। "रेंगते केंचुओं से तो नहीं थे".. अमिताभ इस गाने में भी अपनी छाप छोड़ने में कामयाब हुए हैं। अमित का "हूँ हूँ" गाने को एक अलग हीं लेवल पर ले जाता है। इस तरह से, एक पल क्या... हर पल में उसी शांति, उसी चैन का माहौल तैयार करने में ये तीनों कामयाब हुए हैं।

ये पल


तो इस तरह से मुझे "अमित-अमिताभ" की यह पेशकश बेहद अच्छी लगी। आप इस समीक्षा से कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं, यह ज़रूर बताईयेगा। अगली बार मिलने के वादे के साथ आपका यह दोस्त आपसे विदा लेता है। नमस्कार!

Monday, December 6, 2010

चली राधे रानी, आँखों में पानी....भक्ति और प्रेम का समावेश है ये गीत



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 542/2010/242

"With his very first film Udayer Pathe (Hamrahi in Hindi), Bimal Roy was able to sweep aside the cobwebs of the old tradition and introduce a realism and subtely that was wholly suited to the cinema. He was undoubtedly a pioneer. He reached his peak with a film that still reverberates in the minds of those who saw it when it was first made. I refer to Do Bigha Zamin, which remains one of the landmarks of Indian Cinema."~ Satyajit Ray

सत्यजीत रे के इन उद्गारों के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की आज की महफ़िल की हम शमा जला रहे हैं। बिमल रॊय के फ़िल्मी सफ़र की कहनी कल आकर रुकी थी न्यु थिएटर्स में उनके द्वारा किए गये छायांकन वाले फ़िल्मों तक। इस तरह से तक़नीकी सहायक के रूप में कार्य करने के बद बिमल दा को पहली बार फ़िल्म निर्देशन का मौका मिला सन् १९४४ में, और वह बंगला फ़िल्म थी 'उदयेर पौथे' (उदय के पथ पर)। इसी फ़िल्म का हिंदी में अगले ही साल निर्माण हुआ जिसका शीर्षक रखा गया था 'हमराही'। यह फ़िल्म श्रेणी विभाजन (class discrimination) के मुद्दे को लेकर बनाई गई थी। 'उदयेर पौथे' बंगाल में बहुत ज़्यादा चर्चित हुई थी क्योंकि उस समय इतनी ज़्यादा तकनीकी रूप से विकसीत फ़िल्म नहीं बनी थी बंगला में। बिमल दा निर्देशित ४० के दशक की दो और बंगला फ़िल्में हैं - अंजानगढ़ (१९४८) और 'मंत्रमुग्ध' (१९४९)। 'अंजानगढ़' को हिंदी में भी उसी साल बनाया गया था। १९५० में न्यु थिएटर्स ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और उनके 'आज़ाद हिंद फ़ोर्स' को लेकर एक फ़िल्म निर्देशित की 'पहला आदमी', जिसके संगीतकार थे आर. सी. बोराल। इसी विषय को लेकर इसी साल बम्बई में फ़िल्मिस्तान ने बनाई 'समाधि'। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बंगाल का राजनैतिक दृश्य कुछ ऐसा हो गया था कि वहाँ कि फ़िल्म कंपनियाँ बंद होने के कगार पर आ गई थी। ऐसे में बहुत से बड़े कलाकार बम्बई स्थानांतरित हो गए। बिमल रॊय भी उन्हीं में से एक थे। बम्बई आकर बिमल दा बॊम्बे टॊकीज़ से जुड़ गए और १९५२ में उन्होंने दो फ़िल्में निर्देशित कीं - 'मोरध्वज' और 'माँ'। इन दोनों फ़िल्मों में संगीत एस. के. पाल का था। वह बॊम्बे टॊकीज़ का अंतिम समय था। इसलिए बिमल दा ने यह निर्णय लिया कि ख़ुद की एक फ़िल्म कंपनी खोली जाए। और इस तरह से स्थापना हुई 'बिमल रॊय प्रोडक्शन्स' की। इस बैनर की पहली फ़िल्म हेतु बिमल दा ने एक कम बजट की फ़िल्म बनाने की सोची। इसलिए अपने कलकत्ते के तीन और दोस्त - सलिल चौधरी, नवेन्दु घोष और असित सेन, इन सबों को लेकर सलिल चौधरी की उपन्यास 'रिक्शावाला' पर आधारित 'दो बीघा ज़मीन' बनाने की योजना बनाई। उसके बाद क्या हुआ, यह इतिहास बन चुका है। १९५३ में बनी 'दो बिघा ज़मीन' के बारे में एक बार बताया था सलिलदा की बेटी अंतरा चौधरी ने जिसे हमने आप तक पहुँचाया था 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ९१-वीं कड़ी में। इसलिए आज उसे यहाँ नही दोहरा रहे हैं। बल्कि सीधे बढ़ जाते हैं उनकी अगली फ़िल्म 'परिणीता' पर।

इसी साल १९५३ में बिमल दा ने 'परिणीता' का निर्देशन किया था, लेकिन यह 'बिमल रॊय प्रोडक्शन्स' की प्रस्तुति नहीं थी। अभिनेता अशोक कुमार, जिनका हिमांशु राय और देविका रानी के साथ बहुत अच्छा संबंध था, हमेशा चाहा कि बॊम्बे टॊकीज़ अपनी आर्थिक समस्याओं से बाहर निकले, और इस मकसद से उन्होंने कुछ फ़िल्में प्रोड्युस की। हालाँकि इन फ़िल्मों को सफलता ज़रूर मिली, लेकिन बॊम्बे टॊकीज़ में चल रहे अस्थिरता को ख़त्म नहीं कर सके और १९५२ में बॊम्बे टॊकीज़ में हमेशा के ताला लग गया। अशोक कुमार ने फिर अपनी निजी कंपनी 'अशोक कुमार प्रोडक्शन्स' की नींव रखी और इस बैनर तले पहली फ़िल्म 'परिणीता' का निर्माण किया। शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की मशहूर उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म में मीना कुमारी शीर्षक भूमिका में नज़र आईं थीं और साथ में थे अशोक कुमार और नासिर हुसैन। इस फ़िल्म का एक मुख्य आकर्षण बिमल रॊय का निर्देशन भी था। दादामुनि अशोक कुमार ने बाद में बिमल दा की शान में ये शब्द कहे थे - "In my long experience in this industry I really have not come across another director like Bimal Roy… such commitment to cinema, to perfection. I regret we have few like him today." गायक अरुण कुमार मुखर्जी, जो अशोक कुमार के मौसेरे भाई थे, और अशोक कुमार का प्लेबैक करने के लिए जाने जाते थे ('बंधन', 'झूला', 'क़िस्मत' जैसी फ़िल्मों में इन्होंने दादामुनि के लिए गाया था), तो दादामुनि ने अरुण कुमार को 'परिणीता' में सगीत देने का मौका दिया। भरत व्यास का लिखा और मन्ना डे का गाया इस फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत था "चले राधे रानी अखियों में पानी, अपने मोहन से मुखड़ा मोड़ के"। इसके अलावा इस फ़िल्म में आशा भोसले ने "गोरे गोरे हाथों में मेहंदी", "कौन मेरी प्रीत के पहले जो तुम" तथा किशोर दा के साथ एक युगल गीत "ऐ बंदी तुम बेगम बनो" गाया था। गीता रॊय की आवाज़ में "चांद है वही सितारें वो ही, गगन फिर भी क्यों उदास है" भी एक सुंदर रचना है। लेकिन फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत "चले राधे रानी" ही है, और इसीलिए आज हम आपको यही गीत सुनवा रहे है, सुनिए...



क्या आप जानते हैं...
कि अरुण कुमार का ६ दिसम्बर १९५५ को दिल का दौरा पड़ने से असामयिक निधन हो गया था जब वे अशोक कुमार के साथ फ़िल्म 'बंदिश' का ट्रायल शो देख कर कार में वापस लौट रहे थे। यह भी अजीब इत्तेफ़ाक़ की बात है कि जिस अशोक कुमार ने उन्हें फ़िल्मों में अवसर दिलाया, उन्हीं की गोद में सिर रख कर उनका निधन हुआ।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०३ /शृंखला ०५
गीत की एक झलक सुनिए-


अतिरिक्त सूत्र - बिमल रॉय की एक और नायाब फिल्म.

सवाल १ - गायिका पहचानें - २ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी को २ अंक और इंदु-रोमेंद्र जी को १-१ अंक की बधाई, इंदु जी और रोमेंद्र जी दोनों ही नियमित नहीं रह पाते और अगर अवध जी भी सही समय पर पहुँच पायें तो मुकाबला और दिलचस्प बन जायेगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, December 5, 2010

आजा री आ, निंदिया तू आ......कहाँ सुनने को मिल सकती है ऐसी मीठी लोरी आज के दौर में



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 541/2010/241

मस्कार! दोस्तों, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस नई सप्ताह में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में जारी है लघु शृंखला 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ'। इसके पहले और दूसरे खण्डों में आपने क्रम से वी. शांताराम और महबूब ख़ान के फ़िल्मी सफ़र की कहानी जानी और साथ ही इनके पाँच पाँच फ़िल्मों के गानें सुनें। आज से हम शुरु कर रहे हैं इस शृंखला का तीसरा खण्ड, और इस खण्ड के लिए हमने चुना है एक और महान फ़िल्मकार को, जिन्हें हम बिमल रॊय के नाम से जानते हैं। बिमल रॊय हिंदी सिनेमा के बेहतरीन निर्देशकों में से एक हैं जिनकी फ़िल्में कालजयी बन गईं हैं। उनकी सामाजिक और सार्थक फ़िल्मों, जैसे कि 'दो बिघा ज़मीन, परिणीता', 'बिराज बहू', 'मधुमती', 'सुजाता' और 'बंदिनी' ने उन्हें शीर्ष फ़िल्मकारों में दर्ज कर लिया। आइए बिमल दा क्ली कहानी शुरु करें शुरु से। बिमल रॊय का जन्म १२ जुलाई १९०९ के दिन ढाका के एक बंगाली परिवार में हुआ था। उस समय ढाका ब्रिटिश भारत का हिस्सा हुआ करता था, और जो अब बांगलादेश की राजधानी है। भारत की आज़ादी और देश विभाजन के बाद यह हिस्सा पाक़िस्तान में चली गई थी, और तभी बिमल दा का परिवार भारत स्थानांतरित हो गया। दरसल हुआ युं था कि बिमल दा एक ज़मीनदार घराने के पुत्र थे। उनके पिता की मृत्यु के बाद ज़मीनदारी की देख रेख कर रहे एस्टेट मैनेजर ने बिमल दा के परिवार का सर्वस्व बेदखल कर लिया। अपना सर्वस्य हार कर बिमल दा अपनी विधवा माँ और छोटे छोटे भाइयों के साथ कलकता आ गए। और यहाँ आकर उन्होंने काम पाने की तलाश शुरु कर दी। ऐसे में न्यु थिएटर्स के प्रमथेश बरुआ ने बिमल दा को एक पब्लिसिटि फ़ोटोग्राफ़र की हैसीयत से काम पर रख लिया। लेकिन जल्द ही बिमल रॊय को नितिन बोस के ऐसिस्टैण्ट कैमरामैन बना दिया गया। उनकी रचनात्मक्ता, और छाया व रोशनी के तालमेल को समझने की उनकी क्षमता से हर कोई प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाया, और जल्द ही उनका नाम हो गया। उनकी इस रचनात्मक्ता की मिसालें हैं ३० के दशक की 'मुक्ति' और 'देवदास' जैसी फ़िल्में। बहुत कम लोगों को यह मालूम है कि बिमल रॊय ने ब्रिटिश सरकार के लिए दो बेहतरीन वृत्तचित्र (डॊकुमेण्टरी) बनाये थे - 'रेडियो गर्ल' (१९२९) और 'बेंगॊल फ़ैमीन' (१९४३), लेकिन दुर्भाग्यवश इन दोनों फ़िल्मों के चिन्ह आज कहीं नहीं मिलते। उनकी १९५६ में बनाई हुई वृत्तचित्र 'गौतम - दि बुद्ध' को बहुत तारीफ़ें मिली थीं कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में।

दोस्तों, बिमल दा के शुरुआती दिनों का हाल आज हमने प्रस्तुत किया। आगे की कहानी कल फिर आगे बढ़ाएँगे, अब वक़्त हो चला है आज के गीत के बारे में आपको बताने का। सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'दो बिघा ज़मीन' से लता मंगेशकर की आवाज़ में एक मीठी सी, प्यारी सी लोरी, "आजा री आ, निंदिया तू आ"। सलिल चौधरी का सुमधुर संगीत और शैलेन्द्र के बोल। वैसे तो कोई भी यही अपेक्षा रखेगा कि बिमल दा पर केन्द्रित इस शृंखला में 'दो बिघा ज़मीन' के "धरती कहे पुकार के" या फिर "हरियाला सावन ढोल बजाता आया" गीत ही शामिल हों, लेकिन क्या करें, ये दोनों ही गीत हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर बजा चुके हैं। और इस फ़िल्म के किसी गीत को सुनवाये बग़ैर भी नहीं रह सकते। 'दो बिघा ज़मीन' १९५३ की फ़िल्म थी, और उससे दो साल पहले फ़िल्म 'अल्बेला' में ही सी. रामच्न्द्र ने एक बेहद लोकप्रिय लोरी बनाई थी "धीरे से आजा री अखियन में"। इस लोरी की अपार शोहरत के बाद किसी और लोरी का इससे भी ज़्यादा मशहूर हो पाना आसान काम नहीं था। फिर भी शैलेन्द्र और सलिल दा ने पूरी मेहनत और लगन से इस लोरी की रचना की। भले ही यह लोरी बहुत ज़्यादा नहीं सुनी गई, और 'अलबेला' की लोरी की तरह मक़बूल भी नहीं हुई, लेकिन गुणवत्ता में किसी तरह की कोई ख़ामी नज़र नहीं आती। शैलेन्द्र ने भी कितने ख़ूबसूरत शब्दों से इस लोरी को सजाया है। गीत सुनने से पहले लीजिए इस लोरी के बोलों पर एक नज़र दौड़ा लीजिए...

आ जा री आ, निंदिया तू आ,
झिलमिल सितारों से उतर आँखों में आ, सपने सजा।

सयी कली, सोया चमन, पीपल तले सोयी हवा,
सब रंगा इक रंग में, तूने ने ये क्या जादू किया, आ जा।

संसार की रानी है तू, राजा है मेरा लादला,
दुनिया है मेरी गोद में, सोया हुआ सपना मेरा, आ जा।



क्या आप जानते हैं...
कि ख़्वाजा अहमद अब्बास ने बिमल रॊय के लिए कैसे उद्गार व्यक्त किए थे, ये रहे - "Bimal Roy was Bengal’s gift to Bombay. His first film, Udayer Pathey (Hamrahi) had already established him in this region as a filmmaker of rare perfection. But the film which left a permanent impact on the Indian cinema was his Do Bigha Zamin. That was not merely an outstanding Indian film but received International recognition."

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०२ /शृंखला ०५
गीत की एक झलक सुनिए-


अतिरिक्त सूत्र - बिमल रॉय की एक और नायाब फिल्म.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - आवाज़ पहचानें - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
इस बार शरद जी निकले हैं कमर कस कर....इंदु जी अगर गीत सुनने में अब भी कोई समस्या आये तो बात कीजियेगा http://get.adobe.com/flashplayer/ ये लिंक खोलियेगा....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, December 4, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (१९) - ई मेल तो नहीं पर आज बात एक खत की जो किशोर दा ने लिखा था लता को



'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है इस साप्ताहिक विशेषांक में। युं तो हम इसमें 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' पेश किया करते हैं, लेकिन आज इसमें हम आपके लिए कुछ अलग चीज़ लेकर आये हैं। यह ईमेल तो नहीं है, लेकिन ख़त ज़रूर है। वही ख़त, जिसे हम काग़ज़ पर लिखा करते हैं। और पता है आज जिस ख़त को यहाँ हम शामिल करने वाले हैं, उसे किसने लिखा है और किसको लिखा है? यकीन करेंगे आप अगर हम कहें कि किशोर कुमार ने यह ख़त लिखा है लता मंगेशकर को? दिल थाम के बैठिए दोस्तों, पिछले दिनों लता जी ने किशोर दा के एक ख़त को स्कैन कर ट्विटर पर अपलोड किया था, तो मैंने सोचा कि क्यों ना उसे डाउनलोड करके अपनी उंगलियों से टंकित कर आपके लिए इस स्तंभ में पेश करूँ। तो चलिए अब मैं बीच में से हट जाता हूँ, ये रहा किशोर दा का ख़त लता जी के नाम...

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28.11.65

बहन लता,

अच्छी तो हो! अचानक एक मुसीबत में आ फंसा हूँ। तुम ही मेरी जीवन नैय्या पार लगा सकती हो। घबराने की बात नहीं पर घबराने की बात भी है!!! सुनो, ज़िंदगी में पहली मर्तबा फ़ौजी भाइयों की सेवा करने जा रहा हूँ। तुम तो जानती हो कि मैं कभी किसी समारोह या गैदरिंग् में भाग नहीं लेता, लेकिन यह एक ऐसा अवसर है जिसे मैं टाल नहीं पा रहा हूँ ... हाँ, तो मैं कह रहा था कि अगर आज का गाना तुम अपनी मर्ज़ी से किसी दूसरी तारीख़ पे रखवा दो तो मैं तुम्हारा उपकार ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगा... यह एक भाई की विनती है अपनी बहिन से। आशा है तुम मेरी बात को समझ गई होगी। महाराज कल्याणजी आनंदजी के साथ मुझे गाने का बेहद शौक है और साथ में तुम हो तो सोने पे सुहागा। कैसा अच्छा है ये प्रेम का धागा... टूटने ना पाए.. अंग्रेज़ी में लिखना चाहता था मगर एक हिंदुस्तानी होने के नाते मैंने हिंदी में ही लिखना उचित समझा। मैं जानता हूँ तुम्हे कठिनाई होगी, लेकिन मेरे लिए किसी प्रकार बात को बना दो। और क्या लिखूँ, बस तुम सब सम्भाल लेना। दिसंबर दो, तीन, चार, पाँच तक किसी भी दिन, किसी भी वक़्त रिकार्डिंग् रखवा दो। मैंने रात को फ़ोन किया था लेकिन तुम निद्रा में मग्न थी। मैंने जगाना उचित नहीं समझा।

अच्छा बहन, लौटने के बाद फिर भेंट होगी। मेरा प्यार, बड़ों को प्रणाम, छोटों को स्नेहाशीष,

तुम्हारा ही भाई,

किशोर दा
"गड़बड़ी"


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दोस्तों, देखा आपने लता जी और किशोर दा के बीच किस तरह का भाई-बहन का रिश्ता था! आइए इसी रिश्ते को सलाम करते हुए आज आपको दो ऐसे गीत सुनवाए जाएँ जो अपने आप में बेहद अनूठे हैं। अनूठे इसलिए कि पहले गीत के संगीतकार हैं लता मंगेशकर और गायक हैं किशोर कुमार, और दूसरे गीत के संगीतकार हैं किशोर कुमार और गायिका हैं लता मंगेशकर। क्यों, एक बार फिर से चौंक गए ना आप? हिंदी में तो नहीं, लेकिन बंगला के दो ऐसे गीत ज़रूर हैं। तो लीजिए एक के बाद एक इन दोनों गीतों को सुनिए, हमें पूरी उम्मीद है कि अलग ही अनुभूति आपको मिलेगी।

पहले ये रहा लता जी के संगीत निर्देशन में किशोर दा की आवाज़...

गीत - तारे आमि चोखे देखिनी, तार ऒनेक गॊल्पो शुनेछी


इस गीत के मुखड़े का तरजुमा कुछ इस तरह का है - "उसे मैंने अपनी आँखों से तो नहीं देखा, पर उसकी बहुत सारी बातें लोगों से सुनी है, और इन बातों को सुनने के बाद मैं उससे थोड़ा थोड़ा प्यार करने लगा हूँ"।

और ये है किशोर दा के संगीत में लता जी की आवाज़...

गीत - की लिखी तोमाये, तुमि छाड़ा आर कोनो किछु भालो लागेना आमार


गीत के मुखड़े का भाव यह था कि "क्या लिखूँ तुम्हे, तुम्हारे बिना और कुछ भी मुझे अच्छा नहीं लगता, क्या लिखूँ तुम्हे"। देखिए दोस्तों, हमने किशोर दा के लिखे ख़त से शुरुआत की थी, और अब इस अंक का समापन भी एक ऐसे गीत से हुआ जिसमें भी ख़त में कुछ लिखने की बात कही गई है। आप भी हमें ज़रूर लिख भेजिएगा कि कैसा लगा आपको 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का आज का यह साप्ताहिक विशेषांक। हमारी कोशिश हमेशा यही रहती है कि अच्छे से अच्छा और मनोरंजक प्रस्तुति हम आपके लिए तैयार कर सकें। इसमें आप भी अपना अमूल्य योगदान हमें दे सकते हैं बस एक ईमेल के बहाने। तो लिख भेजिएगा अपनी यादों के ख़ज़ाने oig@hindyugm.com के पते पर। अगले शनिवार आपसे फिर मुलाक़ात होगी इस साप्ताहिक विशेषांक में, लेकिन 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमित कड़ी के साथ कल शाम को ही हम हाज़िर होंगे, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

सुजॉय चट्टर्जी

मृणाल पाण्डेय की कहानी 'लड़कियाँ'



'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की संस्मरणात्मक कहानी "नसीब अपना अपना" का पॉडकास्ट उन्हीं की आवाज़ में सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं मृणाल पाण्डेय की कहानी "लड़कियाँ", जिसको स्वर दिया है प्रीति सागर ने। कहानी "लड़कियाँ" का कुल प्रसारण समय 18 मिनट 23 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

"अगर प्रोफेशनल दुराचरण साबित होने पर एक डॉक्टर या चार्टर्ड अकाउंटेंट नप सकता है, तो एक गैरजिम्मेदार पत्रकार क्यों नहीं?"
~ मृणाल पाण्डेय

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी
"जब तुम लोग लड़कियों को प्यार नहीं करते तो झूठ मूठ में दिखावा क्यों करते हो?"
(मृणाल पाण्डेय की कहानी 'लड़कियाँ' से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#114th Story, Ladkiyan: Mrinal Pandey/Hindi Audio Book/2010/46. Voice: Priti Sagar

Thursday, December 2, 2010

दिल तोड़ने वाले तुझे दिल ढूंढ रहा है....महबूब खान ने दिल तो नहीं तोडा मगर दिल उन्हें ढूंढ रहा है आज भी शायद



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 540/2010/240

'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ'। इस शृंखला के दूसरे खण्ड में इन दिनों आप सुन रहे हैं फ़िल्मकार महबूब ख़ान के फ़िल्मों के गानें और महबूब साहब के फ़िल्मी यात्रा का संक्षिप्त विवरण। आज हम आ पहुँचे हैं इस खण्ड की अंतिम कड़ी पर। कल हमारी चर्चा आकर रुकी थी महबूब साहब की सब से मशहूर फ़िल्म 'मदर इण्डिया' पे आकर। आइए 'मदर इण्डिया' फ़िल्म से जुड़े कुछ और रोचक तथ्य आपको बताएं। फ़िल्म के ओपेनिंग् सीक्वेन्स में एक हथोड़ा और कटारी दिखाया जाता है, जो कि महबूब साहब की कंपनी का लोगो था। लेकिन क्योंकि इस फ़िल्म को ऒस्कर में शामिल किया जा रहा था और ऐण्टि-कम्युनिस्ट का दौर था, इसलिए इस सीक्वेन्स को फ़िल्म से हटा दिया गया था। शुरु शुरु में सुनिल दत्त द्वारा निभाया गया बिरजु का किरदार साबू द्वारा निभाया जाना था, जो कि भारतीय मूल के एक मशहूर हॊलीवूड ऐक्टर थे। शूटिंग के दौरान एक अग्निकांड के सीक्वेन्स में नरगिस आग के घेरे में आ गईं थीं और आग बेकाबू हो गयी था। ऐसे में ख़ुद सुनिल दत्त ने एक कम्बल के सहारे नरगिस को आग से बाहर निकाला था। और यहीं से दोनों में प्रेम संबंध शुरु हुआ और एक साल के अंदर दोनों ने शादी भी कर ली। ये तो थी कुछ दिलचस्प बातें 'मदर इण्डिया' के बारे में। आइए अब महबूब साहब की फ़िल्मी सफ़र के अगले पड़ाव की ओर बढ़ा जाए। 'मदर इण्डिया' के बाद ६० के दशक में उन्होंने एक और महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'सन ऒफ़ इण्डिया' की योजना बनाई। उनका यह सपना था कि यह फ़िल्म 'मदर इण्डिया' को भी पीछे छोड़ दे, लेकिन निशाना चूक गया और बदकिस्मती से यह महबूब ख़ान की सबसे कमज़ोर फ़िल्मों में से एक साबित हुई। यह १९६२ की फ़िल्म थी। इसके दो साल बाद, महबूब ख़ान कशमीर की कवयित्री-रानी हब्बा ख़ातून पर एक फ़िल्म बनाने की परियोजना बना रहे थे, लेकिन काल के क्रूर हाथों ने उन्हें हम सब से हमेशा हमेशा के लिए जुदा कर दिया। २८ मई, १९६४ को महबूब ख़ान इस दुनिया-ए-फ़ानी से कूच कर गए, और पीछे छोड़ गए अपनी रचनात्मक्ता, अपने उद्देश्यपूर्ण फ़िल्मों की अनमोल धरोहर। फ़िल्म जगत कर्ज़दार है महबूब ख़ान के उनके अमूल्य योगदान के लिए।

और अब आज का गीत। आज हम आपको सुनवा रहे हैं लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी के गाये हुए युगल गीतों में से चुन कर एक बेहद लोकप्रिय गीत फ़िल्म 'सन ऒफ़ इण्डिया' से - "दिल तोड़ने वाले तूझे दिल ढूंढ़ रहा है, आवाज़ दे तू कौन सी नगरी में छुपा है"। महबूब साहब की और तमाम फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म में भी शक़ील और नौशाद की जोड़ी ने गीत संगीत का पक्ष सम्भाला था। महबूब ख़ान द्वारा निर्मित व निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे कमलजीत और सिमी गरेवाल। महबूब साहब के बेटे साजिद ख़ान ने बाल कलाकार की भूमिका निभाई थी जिन पर शांति माथुर के गाये "नन्हा मुन्ना राही हूँ" और "आज की ताज़ा ख़बर" गीत फ़िल्माये गये थे। ये दोनों ही गीत हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं। महबूब साहब को इस फ़िल्म के निर्देशन के लिए उस साल के 'फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार' के लिए नॊमिनेट किया गया था। तो लीजिए लता-रफ़ी की आवाज़ों में यह जुदाई वाला गीत सुना जाए। हम भी महबूब साहब के लिए यही कहते हैं कि तूझे दिल ढूंढ़ रहा है, आवाज़ दे तू कौन सी नगरी में छुपा है!!! इसी के साथ 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' शृंखला का दूसरा खण्ड अब यहीं सम्पन्न होता है जिसमें हमने महबूब ख़ान को फ़ीचर किया। रविवार से इस शृंखला के तीस्रे खण्ड में एक और महान फ़िल्मकार का फ़िल्मी सफ़र लेकर हम पुन: उपस्थित होंगे, और शनिवार को 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में तशरीफ़ लाना ना भूलिएगा। अब दीजिए इजाज़त, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि साजिद ख़ान महबूब ख़ान के गोद लिए हुए पुत्र थे, जो 'मदर इण्डिया' और 'सन ऒफ़ इण्डिया' में बतौर बालकलाकार नज़र आये। १९८३ की फ़िल्म 'हीट ऐण्ड डस्ट' में वो आख़िरी बार नज़र आये थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०१ /शृंखला ०५
गीत के अंतरे से ये हिस्सा सुनें -


अतिरिक्त सूत्र - आवाज़ लता जी की है.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - बताएं कि बातें अब किस फिल्मकार की होंगीं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
कल दरअसल मुझे कार्यालय जल्दी जाना पड़ा, सोचा था कि वहाँ जाकर अपडेट कर दूँगा, मगर कुछ यूँ फंसा काम में कि याद ही नहीं रहा.....लगभग शाम ८-९ बजे तक फ्री हुआ, तब जाकर शरद जी का कमेन्ट पढ़ा. माफ़ी चाहूँगा....खैर एक समाधान है अगर आप सब को मंजूर हो तो....कल की पहेली से पहले श्याम जी के १२ अंक थे और शरद जी के १०. कल सबसे पहले शरद जी उपस्थित हुए और जाहिर है उन्होंने गीत पहचान लिया था, वो २ अंकों वाले सवाल का सही जवाब देते इस पर उनके अब तक रिकॉर्ड को देखकर जरा भी संशय नहीं किया जा सकता. श्याम जी उनके बाद आये और उन्होंने गायक का नाम भी बता ही दिया, यानी कि अगर कोई १ अंक वाला जवाब होता तो वो भी जरूर बता देते. तो इस तरह अगर शरद जी २ अंक कमा भी लेते तो भी श्याम जी उनसे १ अंक से आगे रहते. अब अगर पहेली को निरस्त भी किया जाए तो उस स्तिथि में भी श्याम जी ही विजेता ठहरेगें. तो हम चौथी शृंखला के विजेता के रूप में श्याम जी नाम रखते हैं, अगर चूंकि ये भूल हुई है, तो आप सब की राय अपेक्षित है.....आज से नयी शृंखला आरंभ हो रही है....शुभकामनाएँ

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, December 1, 2010

दुःख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे.....एक क्लास्सिक फिल्म का गीत जिसके निर्देशक थे महबूब खान



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 539/2010/239

हबूब ख़ान की फ़िल्मी यात्रा पर केन्द्रित इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' का दूसरा खण्ड आप पढ़ और सुन रहे हैं। इस खण्ड की आज चौथी कड़ी में हम रुख़ कर रहे हैं महबूब साहब के ५० के दशक में बनीं फ़िल्मों की तरफ़। वैसे पिछले तीन कड़ियों में हमने गानें ५० के दशक के ही सुनवाए हैं, जानकारी भी दी है, लेकिन महबूब साहब के फ़िल्मी सफ़र के ३० और ४० के दशक के महत्वपूर्ण फ़िल्मों का ज़िक्र किया है। आइए आज की कड़ी में उनकी बनाई ५० के दशक की फ़िल्मों को और थोड़े करीब से देखा जाए। इस दशक में उनकी बनाई तीन मीलस्तंभ फ़िल्में हैं - 'आन', 'अमर' और 'मदर इण्डिया'। 'आन' १९५२ की सफलतम फ़िल्मों में से थी, जिसे भारत के पहले टेक्नो-कलर फ़िल्म होने का गौरव प्राप्त है। दिलीप कुमार, निम्मी और नादिर अभिनीत इस ग्लैमरस कॊस्ट्युम ड्रामा में दिखाये गये आलिशान राज-पाठ और युद्ध के दृष्य लोगों के दिलों को जीत लिया। 'आन' बम्बई के रॊयल सिनेमा में रिलीस की गयी थी । इस फ़िल्म के सुपरहिट संगीत के लिए नौशाद ने कड़ी मेहनत की थी। उन्होंने १०० पीस ऒरकेस्ट्रा का इस्तेमाल किया पार्श्वसंगीत तैयार करने के लिए। उस ज़माने में ऐसा बहुत कम ही देखा जाता था। केवल शंकर जयकिशन ने १०० पीस ऒरकेस्ट्रा का इस्तेमाल किया था 'आवरा' में। नौशाद साहब की आदत थी कि वो अपने नोटबुक में गानों के नोटेशन्स लिख लिया करते थे। और इसी का नतीजा था कि 'आन' का पार्श्वसंगीत लंदन में री-रेकॊर्ड किया जा सका। अमेरिका में एक पुस्तक भी प्रकाशित की गई है 'आन' के नोटेशन्स की, और जिसे नौशाद साहब के हाथों ही जारी किया गय था। इस तरह का सम्मान पाने वाले नौशाद पहले भारतीय संगीतकार थे। 'आन' के बाद १९५४ में महबूब ख़ान ने बनाई 'अमर' जिसमें दिलीप कुमार और निम्मी के साथ मधुबाला को लिया गया। शक़ील - नौशाद ने एक बार फिर अपना कमाल दिखाया। इस फ़िल्म के ज़्यादातर गानें शास्त्रीय रागों पर आधारित थे। लेकिन ५० के दशक में महबूब ख़ान की सब से महर्वपूर्ण आई १९५७ में - 'मदर इण्डिया', जो हिंदी सिनेमा का एक स्वर्णिम अध्याय बन चुका है। अपनी १९४० की फ़िल्म 'औरत' का रीमेक था यह फ़िल्म। नरगिस, सुनिल दत्त, राज कुमार और राजेन्द्र कुमार अभिनीत यह फ़िल्म १४ फ़रवरी के दिन प्रदर्शित किया गया था। 'मदर इण्डिया' की कहानी राधा (नरगिस) की कहानी थी, जिसका पति (राज कुमार) एक दुर्घटना में अपने दोनों हाथ गँवाने के बाद उससे अलग हो जाता है। राधा अपने बच्चों को बड़ा करती है हर तरह की सामाजिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करते हुए। उसका एक बेटा बिरजु (सुनिल दत्त) बाग़ी बन जाता है जबकि दूसरा बेटा रामू (राजेन्द्र कुमार) एक आदर्श पुत्र है। अंत में राधा बिरजु की हत्या कर देती है और उसका ख़ून उनकी ज़मीन को उर्वर करता है। 'मदर इण्डिया' के लिए महबूब ख़ान को फ़िल्मफ़ेयर के 'सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म' और 'सर्वश्रेष्ठ निर्देशक' के पुरस्कर मिले थे। नरगिस को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था। इसके अलावा फ़रदून ए. ईरानी को सर्वश्रेष्ठ सिनेमाटोग्राफ़र और कौशिक को सर्वश्रेष्ठ ध्वनिमुद्रण का पुरस्कार मिला था।

आज की कड़ी में हम आपको सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'मदर इण्डिया' का गीत "दुख भरे दिन बीते रे भइया अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया लायो रे"। मोहम्मद रफ़ी, शम्शाद बेग़म, आशा भोसले और मन्ना डे की आवाज़ें, और शक़ील-नौशाद की जोड़ी। इस गीत के बनने की कहानी ये रही मन्ना दा के शब्दों में (सौजन्य: 'हमारे महमान', विविध भारती) - "जब हम 'मदर इण्डिया' के गा रहे थे वह "दुख भरे दिन बीते रे भइया...", अभी मैं, रफ़ी साब, आशा, गा रहे थे सब लोग, और शम्शाद बाई थीं, और कोरस। रिहर्सल करने के बाद, नौशाद साहब के घर में हो रहा था रिहर्सल, तो बोले कि 'अच्छा मन्ना साहब, कल फिर कितने बजे?' तो मैंने बोला कि 'ठीक है नौशाद साहब, मैं आ जाऊँगा १० बजे'। तो रफ़ी साहब, बहुत धीरे बोलते थे, कहने लगे, 'दादा, कल सवेरे रेकॊर्डिंग् है'। बोला कि 'नौशाद साहब, रफ़ी साहब की कल रेकॊर्डिंग् है'। नौशाद साहब बोले कि 'ठीक है शाम को बैठते हैं'। तो आशा ने कहा, 'शाम को तो मैं नहीं आ सकती, शाम को रेकोर्डिंग् है मेरी'। 'अच्छा फिर परसों बैठते हैं'। तो परसों का तय हो गया। तो परसों सब फिर मिले और फिर से "दुख भरे दिन...", फिर से सब किया। कुछ तीन तीन घंटे रिहर्सल। अब फिर कब करना है? तो किसी ने पूछा कि 'और भी रिहर्सल करना है?' 'क्या बात कर रहे हैं?', नौशाद साहब। 'नहीं साहब, दो एक रिहर्सल चाहिए'। 'तो फ़लाना दिन बैठते हैं, ठीक है न रफ़ी मियाँ?' 'हाँ'। 'क्यों शम्शाद बाई?' 'आशा बाई, ठीक है ना?' 'मन्ना जी तो आएँगे'। ऐसे हम फिर मिले। इस तरह से रेकोडिंग् करते थे। पूरी तरह से तैयार करने के बाद जम के रेकोडिंग् 'स्टार्ट' हुई। नौशाद साहब पहुँच गए रेकॊर्डिंग् बूथ में। रेकोडिस्ट के पास जाकर बैठ गए। नौशाद साहब के रिहर्सल्स इतने पर्फ़ेक्ट हुआ करते थे कि रेकॊर्डिंग् के बीच में कभी कट नहीं होते थे। लेकिन इस गाने में 'रेडी वन टू थ्री फ़ोर स्टार्ट', "दुख भरे दिन बीते रे भइया अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया लायो रे", "कट", सब चुप। नौशाद साहब बाहर आये, 'वाह वाह वाह वाह, बेहतरीन, नंदु, तुमने वह क्या बजाया उधर?' वो कहता है, 'नौशाद साहब, मैंने यह बजाया'। 'वह कोमल निखार, वह ज़रा सम्भाल ना, वह ज़रा ठीक नहीं है, एक मर्तबा और'। 'अरे रफ़ी साहब, वह कौन सा नोट लिया उपर? "देख रे घटा घिर के आई, रस भर भर लाई, हो ओ ओ ओ ओ...", इसको ज़रा सम्भालिए, यह फिसलता है उधर'। 'एक मर्तबा और'। और फिर अंदर चले गए।" तो देखा दोस्तों, कि किस तरह से इस गीत की रेकॊर्डिंग् हुई थी। तो लीजिए इस अविस्मरणीय फ़िल्म का यह अविस्मरणीय गीत सुनते हैं महबूब ख़ान को सलाम करते हुए।



क्या आप जानते हैं...
कि 'मदर इण्डिया' को ऒस्कर पुरस्कारों के अंतर्गत सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म की श्रेणी में नामांकन मिला था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली १० /शृंखला ०४
गीत का प्रील्यूड सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान है इसलिए कोई अन्य सूत्र नहीं.

सवाल १ - किन किन पुरुष गायकों की आवाज़ है इस समूह गीत में - २ अंक
सवाल २ - महिला गायिकाओं के नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी २ अंक अभी भी पीछे हैं यानी आज अगर श्याम जी एक अंक वाले सवाल का भी जवाब दे देते हैं तो बाज़ी उन्हीं के हाथ रहेगी...देखते हैं क्या होता है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

छल्ला कालियां मर्चां, छल्ला होया बैरी.. छल्ला से अपने दिल का दर्द बताती विरहणी को आवाज़ दी शौकत अली ने



महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०४

यूँतो हमारी महफ़िल का नाम है "महफ़िल-ए-ग़ज़ल", लेकिन कभी-कभार हम ग़ज़लों के अलावा गैर-फिल्मी नगमों और लोक-गीतों की भी बात कर लिया करते हैं। लीक से हटने की अपनी इसी आदत को ज़ारी रखते हुए आज हम लेकर आए हैं एक पंजाबी गीत.. या यूँ कहिए पंजाबी लोकगीतों का एक खास रूप, एक खास ज़ौनर जिसे "छल्ला" के नाम से जाना जाता है। इस "छल्ला" को कई गुलुकारों ने गाया है और अपने-अपने तरीके से गाया है। तरीकों के बदलाव में कई बार बोल भी बदले हैं, लेकिन इस "छल्ला" का असर नहीं बदला है। असर वही है, दर्द वही है... एक "विरहणी" के दिल की पीर, जो सुनने वालों के दिलों को चीर जाती है। आखिर ये "छल्ला" होता क्या है, इसके बारे में "एक शाम मेरे नाम" के मनीष जी लिखते हैं (साभार):

जैसा कि नाम से स्पष्ट है "छल्ला लोकगीत" के केंद्र में वो अंगूठी होती है, जो प्रेमिका को अपने प्रियतम से मिलती है। पर जब उसका प्रेमी दूर देश चला जाता है तो वो अपने दिल का हाल किससे बताए? और किससे? उसी छल्ले से जो उसके साजन की दी हुई एकमात्र निशानी है। यानि कि छल्ला लोकगीत छल्ले से कही जाने वाली एक विरहणी की आपबीती है। छल्ले को कई पंजाबी गायकों ने समय-समय पर पंजाबी फिल्मों और एलबमों में गाया है। इस तरह के जितने भी गीत हैं उनमें रेशमा, इनायत अली, गुरदास मान, रब्बी शेरगिल और शौकत अली के वर्ज़न काफी मशहूर हुए।

तो आज हम अपनी इस महफ़िल को शौकत अली के गाए "छल्ला" से सराबोर करने वाले हैं। हम शौकत अली को सुनें, उससे पहले चलिए इनके बारे में कुछ जान लेते हैं। (सौजन्य: विकिपीडिया)

शौकत अली खान पाकिस्तान के एक जानेमाने लोकगायक हैं। इनका जन्म "मलकवल" के एक फ़नकरों के परिवार में हुआ था। शौकत ने अपने बड़े भाई इनायत अली खान की मदद से १९६० के दशक में हीं अपने कॉलेज के दिनों में गाना शुरू कर दिया था। १९७० से ये ग़ज़ल और पंजाबी लोकगीत गाने लगे। १९८२ में जब नई दिल्ली में एशियन खेलों का आयोजन किया गया था, तो शौकत अली ने वहाँ अपना लाईव परफ़ारमेंश दिया। इन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च सिविलियन प्रेसिडेंशियल अवार्ड भी प्राप्त है। अभी हाल हीं में आए "लव आज कल" में इनके गाये "कदि ते हंस बोल वे" गाने (जो कि अब एक लोकगीत का रूप ले चुका है) की पहली दो पंक्तियाँ इस्तेमाल की गई थी। शौकत अली साहब के कई गाने मक़बूल हुए हैं। उन गानों में "छल्ला" और "जागा" प्रमुख हैं। इनके सुपुत्र भी गाते हैं, जिनका नाम है "इमरान शौकत"।

"छल्ला" गाना अभी हाल में हीं इमरान हाशमी अभिनीत फिल्म "क्रूक" में शामिल किया गया था। वह छल्ला "लोकगीत वाले सारे छ्ल्लों" से काफ़ी अलग है। अगर कुछ समानता है तो बस यह है कि उसमें भी "एक दर्द" (आस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीयों का दर्द) को प्रधानता दी गई है। उस गाने को बब्बु मान ने गाया है और संगीत दिया है प्रीतम ने। प्रीतम ने उस गाने के लिए "किसी लोक-धुन" को क्रेडिट दी है, लेकिन सच्चाई कुछ और है। दो महिने पहले जब मैंने और सुजॉय जी ने "क्रूक" के गानों की समीक्षा की थी, तो उस पोस्ट की टिप्पणी में मैंने सच्चाई को उजागर करने के लिए यह लिखा था: वह गाना बब्बु मान ने नहीं बनाया था, बल्कि "बब्बल राय" ने बनाया था "आस्ट्रेलियन छल्ला" के नाम से... वो भी ऐं वैं हीं, अपने कमरे में बैठे हुए। और उस वीडियो को यू-ट्युब पर पोस्ट कर दिया। यू-ट्युब पर उस वीडियो को इतने हिट्स मिले कि बंदा फेमस हो गया। बाद में उसी बंदे ने यह गाना सही से रीलिज किया .. बस उससे यह गलती हो गई कि उसने रीलिज करने के लिए बब्बु मान के रिकार्ड कंपनी को चुना... और आगे क्या हुआ, यह हम सबके सामने है। कैसेट पर कहीं भी बब्बल राय का नाम नहीं है, जबकि गाना पूरा का पूरा उसी से उठाया हुआ है। यह पूरा का पूरा पैराग्राफ़ आज की महफ़िल के लिए भले हीं गैर-मतलब हो, लेकिन इससे दो तथ्य तो सामने आते हीं है: क) हिन्दी फिल्मों में पंजाबी संगीत और पंजाबी संगीत में छल्ला के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। ख) हिन्दी फिल्म-संगीत में "कॉपी-पेस्ट" वाली गतिविधियाँ जल्द खत्म नहीं होने वाली और ना हीं "चोरी-सीनाजोरी" भी थमने वाली है।

बातें बहुत हो गईं। चलिए तो अब ज्यादा समय न गंवाते हुए, "छल्ला" की ओर अपनी महफ़िल का रूख कर देते हैं और सुनते हैं ये पंजाबी लोकगीत। मैं अपने सारे पंजाबी भाईयों और बहनों से यह दरख्वास्त करूँगा कि जिन्हें भी इस नज़्म का अर्थ पता है, वो हमसे शेयर ज़रूर करें। हम सब अच्छे गानों और ग़ज़लों के शैदाई हैं, इसलिए चाहते हैं कि जो भी गाना, जो भी ग़ज़ल हमें पसंद हो, उसे समझे भी ज़रूर। बिना समझे हम वो आनंद नहीं ले पाते, जिस आनंद के हम हक़दार होते हैं। उम्मीद है कि आप हमारी मदद अवश्य करेंगे। इसी विश्वास के साथ आईये हम और आप सुनते हैं "छल्ला":

जावो नि कोई मोर लियावो,
नि मेरे नाल गया नि लड़ के,
अल्लाह करे आ जावे सोणा,
देवन जान कदमा विच धर के।

हो छल्ला बेरीपुर ए, वे वतन माही दा दूरे,
जाना पहले पूरे, वे गल्ल सुन छल्लया
ओ छोरा,
दिल नु लावे झोरा/छोरा

हो छल्ला कालियां मर्चां, ओए मोरा पी के मरसां,
सिरे तेरे चरसां, वे गल्ल सुन छल्लया,
ओ ढोला,
वे तैनु कागा होला/ओला

हो छल्ला नौ नौ थेवे, पुत्तर मित्थे मेवे,
अल्लाह सब नु देवे, छल्ला छे छे
ओ पाया,
ओए दिया तन/धन ने/दे पराया

हो छल्ला पाया ये गहने, दुख ज़िंदरी ने सहने,
छल्ला मापे ने रहने, गल सुन _____
ढोला,
ओए सार के कित्ते कोला

हो छल्ला होया बैरी, सजन भज गए कचहरी,
रोवां शिकर दोपहरी, ओ गल सुन छलया
पावे,
बुरा वेला ना आवे

हो छल्ला हिक वो कमाई, ओए जो बहना दे भाई,
अल्लाह अबके जुदाई, परदेश....
ओ गल्ल सुन छलया
ओ सारां (?),
वीरा नाल बहावां




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "मेहरबानी" और शेर कुछ यूँ था-

ज़िंदगी की मेहरबानी,
है मोहब्बत की कहानी,
आँसूओं में पल रही है... हो..

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

बहुत शुक्रिया बडी मेहरबानी
मेरी जिन्दगी मे हजूर आप आये

ज़िन्दगी से हम भी तर जाते,
जीते जी ही हम मर जाते,
पर उनकी नज़रों की ज़रा सी मेहरबानी न हो सकी (प्रतीक जी)

चीनी से भी ज्यादा मीठी माफ़ी ,
महफिल सजा के की मेहरबानी (मंजु जी)

शमा के नसीब में तो बुझना ही लिखा है
मेहरबानी है उसकी जो जला के बुझाता है. (शन्नो जी)

दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मेहरबानी चाहिए

ऐ मेरे यार ज़रा सी मेहरबानी कर दे
मेरी साँसों को अपनी खुशबु की निशानी कर दे (अवनींद्र जी)

मेहरवानी थी उनका या कोई करम था ,
या खुदा ये उनको कैसा भरम था (नीलम जी)

अवध जी, माफ़ कीजिएगा.. अगर समय पर मैं एक शब्द गायब कर दिया होता तो शायद आप हीं पिछली महफ़िल की शान होते। हाँ, लेकिन आपका शुक्रिया ज़रूर अदा करूँगा क्योंकि आपने समय पर हमें जगा दिया। सुमित भाई, आप "महफ़िल में फिर आऊँगा" लिखकर चल दिए तो हमें लगा कि इस बार भी आप एक-दो दिन के लिए नदारद हो जाएँगे और "शान" की उपाधि से कोई और सज जाएगा। लेकिन आप ६ मिनट में हीं लौट आए और "शान-ए-महफ़िल" बन गए। बधाई स्वीकारें। प्रतीक जी, हमारी मेहनत को परखने और प्रोत्साहित करने के लिए आपका तह-ए-दिल से आभार! मंजु जी, बड़े हीं नायाब तरीके से आपने हमारी प्रशंसा कर दी। धन्यवाद स्वीकारें! शन्नो जी, आपकी डाँट भी प्यारी होती है। आपने कहा कि "कितनी हीं पंजाबी कुड़ियाँ इत-उत मंडराती होगी" तो मैं उन कुड़ियों में से एकाध से अपील करूँगा कि वो हमारी महफ़िल में तशरीफ़ लाएँ और हमें "छल्ला" का अर्थ बता कर कृतार्थ करें :) वैसे, वे अगर महफ़िल में न आना चाहें तो हमसे अकेले में हीं मिल लें। इसी बहाने मेरी पंजाबी थोड़ी सुधर जाएगी। :) अवध जी, शेर तो आपने बहुत हीं जबरदस्त पेश किया, लेकिन शायर का नाम मैं भी नहीं ढूँढ पाया। अवनींद्र जी, मुझे भी आप लोगों से वापस मिलकर बेहद खुशी हुई। कोशिश करूँगा कि अपने ये मिलने-मिलाने का कार्यक्रम यूँ हीं चलता रहें। और हाँ, आपको तो पंजाबी आती है ना? तो ज़रा हमें "छल्ला गाने" का मतलब बता दें। बड़ी कृपा होगी। :) नीलम जी, क्या बात है, दो-दो शेर.. वो भी स्वरचित :) चलिए मैंने अपने पसंद का एक चुन लिया।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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25 नई सुरांगिनियाँ

ओल्ड इज़ गोल्ड शृंखला

महफ़िल-ए-ग़ज़लः नई शृंखला की शुरूआत

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