Monday, November 7, 2011

सो जा तू मेरे राजदुलारे सो जा...लोरी की जिद करते बच्चे पिता को भी माँ बना छोड़ते हैं



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 782/2011/222

'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' - 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में कल से हमने शुरु की है पुरुष गायकों द्वारा गाई हुई फ़िल्मी लोरियों पर आधारित यह लघु शृंखला। लोरी, जिसे अंग्रेज़ी में ललाबाई (lullaby) कहते हैं। आइए इस 'ललाबाई' शब्द के उत्स को समझने की कोशिश करें। सन् १०७२ में टर्कीश लेखक महमूद अल-कशगरी नें अपनी किताब 'दीवानूल-लुगत अल-तुर्क' में टर्कीश लोरियों का उल्लेख किया है जिन्हें 'बालुबालु' कहा जाता है। ऐसी धारणा है कि 'बालुबालु' शब्द 'लिलिथ-बाई' (लिलिथ का अर्थ है अल्विदा) शब्द से आया है, जिसे 'लिलिथ-आबी' भी कहते हैं। जिउविश (Jewish) परम्परा में लिलिथ नाम का एक दानव था जो रात को आकर बच्चों के प्राण ले जाता था। लिलिथ से बच्चों को बचाने के लिए जिउविश लोग अपने घर के दीवार पर ताबीज़ टांग देते थे जिस पर लिखा होता था 'लिलिथ-आबी', यानि 'लिलिथ-बाई', यानि 'लिलिथ-अल्विदा'। इसी से अनुमान लगाया जाता है कि अंग्रेज़ी शब्द 'ललाबाई' भी 'लिलिथ-बाई' से ही आया होगा। और शायद यहीं से 'लोरी' शब्द भी आया होगा। है न दिलचस्प जानकारी! लोरी एक ऐसा गीत है जो यूनिवर्सल है, हर देश में, हर राज्य में, हर प्रान्त में, हर समुदाय में, हर घर में गाई जाती है। भारत के अलग अलग राज्यों में अलग अलग भाषाओं में लोरी का अलग अलग नाम है। असमीया में लोरी को 'निसुकोनी गीत' या 'धाईगीत' कहते हैं तो बंगला में 'घूमपाड़ानी गान' कहा जाता है; गुजराती में 'हल्लार्दु' तो कन्नड़ में 'जोगुला हाडु'; मराठी में 'अंगाई' और सिंधी में 'लोली' कहते हैं। दक्षिण भारत में मलयालम में 'थराट्टु पट्टू', तमिल में 'थालाट्टू' और तेलुगू में लोरी को 'लली पाटलू' कहा जाता है। दोस्तों, इन प्रादेशिक शब्दों को लिखने में अगर ग़लतियाँ हुईं हों तो क्षमा चाहूँगा।

और अब आज की लोरी। दोस्तों, यूं तो लोरी महिलाएँ गाती हैं, पर अगर पुरुषों से लोरियाँ गवाना हो तो इस बात का ज़रूर ध्यान रखा जाता है कि वह सुनने में कोमल, मुलायम लगे, सूदिंग लगे, जिससे बच्चा सो जाये। हर गायक की आवाज़ में लोरी सफल नहीं हो सकती। इसलिए फ़िल्मी संगीतकारों नें इस बात का ध्यान रखा है कि लोरियों के लिए ऐसे गायकों को चुना जाये जिनकी आवाज़ या तो मखमली हो या फिर वो ऐसे अंदाज़ में गायें कि सुनने में मुलायम लगे। आज हम जिस लोरी को सुनने जा रहे हैं उसे गाया है मखमली आवाज़ वाले तलत महमूद साहब नें। यह है १९५५ की फ़िल्म 'जवाब' की लोरी "सो जा तू मेरे राजदुलारे सो जा, चमके तेरी किस्मत के सितारे राजदुलारे सो जा"। गीतकार ख़ुमार बाराबंकवी की लिखी लोरी, जिसे स्वरबद्ध किया कमचर्चित संगीतकार नाशाद नें। 'इस्माइल फ़िल्म्स' के बैनर तले इस्माइल मेमन नें इस फ़िल्म का निर्माण व निर्देशन किया था और मुख्य भूमिकाओं में थे नासिर ख़ान, गीता बाली, जॉनी वाकर, मुकरी, अचला सचदेव, अशरफ़ ख़ान और बलराज साहनी। प्रस्तुत लोरी बलराज साहनी पर फ़िल्माया गई है। लोरी के शुरु होने से पहले बच्चा ज़िद करता है लोरी के लिए तो बलराज साहनी कहते हैं - "तू जीता मैं हारा, तू मुझे माँ बनाके ही छोड़ेगा"। तो आइए तलत साहब की मख़मली आवाज़ में सुनते हैं यह ख़ूबसूरत लोरी, पर ध्यान रहे, सो मत जाइएगा।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
भारत भूषण गायक बने राजमहल में लोरी सुना रहे हैं रानी की भूमिका में नूतन को सुलाने के लिए और सखियाँ और राजा दूर से चोरी-चोरी नज़ारा देख रहे हैं। किस गायक की आवाज़ में है यह लोरी?

पिछले अंक में

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, November 6, 2011

धीरे से आजा री अँखियन में...सी रामचंद्र रचित एक कालजयी लोरी



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 781/2011/221

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी रसिक श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, ज़िन्दगी की शायद सबसे आनन्ददायक अनुभूति होती है माँ-बाप बनना। यह एक ऐसी ख़ुशी है जिसका शब्दों में बयान नहीं हो सकती। ईश्वर की परम कृपा से मुझे भी पिछले दिनों पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस नन्हे के आने से जैसे ज़िन्दगी की धारा ही बदल गई। रात-रात जाग कर बच्चे को सुलाना कुछ और ही आनन्द प्रदान करती है। पुराने ज़माने में मायें लोरियाँ गा कर अपने बच्चों को सुलाती थीं, पर अब यह प्रथा केवल माओं तक सीमित नहीं रही। पिता भी समान रूप से घर के काम-काज में योगदान देते हुए बच्चों को सुलाने तक में अपना योगदान देते हैं। दोस्तों, अब तक लोरियों की तरफ़ मेरा ज़्यादा ध्यान नहीं जाता था, पर अब तो जैसे रातों को लोरियाँ याद कर कर गाने को जी चाहता है। इसी से मुझे ख़याल आया कि क्यों न 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में एक ऐसी शृंखला चलाई जाए जिसमें पुरुष गायकों द्वारा गाई हुई लोरियों को शामिल किए जाएँ। गायिकाओं द्वारा गाई लोरियों की तो फ़िल्मों में कोई कमी नहीं है, पर गायकों की लोरियाँ फ़िल्मों में बहुत ज़्यादा सुनने को नहीं मिला। तो आइए आज से प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी'। इस शृंखला में दस अलग अलग गायकों की आवाज़ों में आप सुनेंगे दस बेहतरीन फ़िल्मी लोरियाँ, जिन्हें सुनते हुए आप के अन्दर भी वात्सल्य रस का संचार होने लगेगा।

फ़िल्मों में पुरुष लोरियों की बात करें तो सबसे पुरानी और सुपरहिट लोरी जो याद आ रही है, वह है कुंदनलाल सहगल की गाई १९४० की फ़िल्म 'ज़िन्दगी' की लोरी "सो जा राजकुमारी सो जा, सो जा मैं बलिहारी सो जा"। सहगल साहब की मख़मली आवाज़ में इस लोरी की कुछ और ही अलग जगह है। इसके बाद १९४३ में अनिल बिस्वास के संगीत में अशोक कुमार नें फ़िल्म 'किस्मत' में गाई थी एक और कामयाब लोरी "धीरे धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है, शोरगुल न मचा"। ये दोनों ही लोरियाँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हम बजा चुके हैं। इसलिए हम सीधे आ जाते हैं ५० के दशक में। 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' की पहली कड़ी में प्रस्तुत है चितलकर की आवाज़ में १९५१ की फ़िल्म 'अलबेला' की लोरी "धीरे से आजा री अँखियन में निन्दिया आजा री आजा, धीरे से आजा"। राजेन्द्र कृष्ण का लिखा गीत है और सी. रामचन्द्र का संगीत। इस लोरी के फ़िल्म में दो संस्करण हैं, एक लता जी की एकल आवाज़ में, और दूसरा एक डुएट था चितलकर और लता के युगल स्वरों में। रहमान और गीता बाली पर फ़िल्माई इस युगल लोरी का फ़िल्मांकन अलग हट के है। एक तरफ़ रहमान और गीता बाली कार में जाते हुए रहमान यह लोरी गाते हैं ख़ुश-मिज़ाज में और गीता बाली सुनते हुए सो जाती हैं। गीत के मध्य भाग में दूसरी तरफ़ बिमला कुमारी अपने पिता के साथ दिखती हैं दर्द भरे अंदाज़ में इस लोरी को गाती हुईं। इस तरह से एक ही लोरी में चितलकर ख़ुशी-ख़ुशी इसे गाते हैं जबकि लता जी वाला हिस्सा दर्दीला है। बहुत ही मशहूर लोरी है और सी. रामचन्द्र नें राग पीलू और दादरा ताल में कितना मीठा इसे कम्पोज़ किया है, आइए सुनते हैं इस कालजयी लोरी को।



अगला गीत पहचानें, हिंट ये है
तलत महमूद की मखमली आवाज़ में यह लोरी सज रही है उस अभिनेता पर जिन पर मन्ना डे की गाई हुई एक अन्य लोरी भी फ़िल्माई गई है। बताइए तलत महमूद की गाई यह कौन सी लोरी है?

पिछले अंक में

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

मौसिकी अर्श के आफताब : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ



सुर संगम- 42 – उन्हे मैसूर दरबार से “आफताब-ए-मौसिकी” (संगीत के सूर्य) की उपाधि से नवाजा गया


भारतीय संगीत के प्रचलित घरानों में जब भी आगरा घराने की चर्चा होगी तत्काल एक नाम जो हमारे सामने आता है, वह है- आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ। ‘सुर संगम’ के आज के अंक में हम इन्हीं महान गायक कलासाधक को श्रद्धा-सुमन अर्पित करेंगे। पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में करते हैं उस्ताद फ़ैयाज़ खान उन्ही में से एक थे। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा, सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें कुशलता प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस-वर्षा कर देते थे।

फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा रँगीले घराना’ के नाम से विख्यात ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बनाया और पालन-पोषण के साथ-साथ संगीत-शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित हो चुके थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई। आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के ‘नोम-तोम’ के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। आइए आपको भी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में राग ‘तिलंग’ में नोम-तोम का आलाप सुनवाते हैं।

उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ : आलाप नोम-तोम – राग तिलंग


फ़ैयाज़ खाँ के नाना का घराना खयाल गायकों का था। नाना ने बचपन से ही कठोर रियाज़ कराया। संगीत के घरानों में संगीत-शिक्षा के लिए एक कठोर व्रत का पालन शिष्य से कराया जाता है, जिसे ‘चिल्ला’ कहा जाता है। इस व्रत के अनुसार शिष्य को निरन्तर बारह वर्षों तक प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक संगीत का अभ्यास करना होता है। प्रशिक्षण की इस अवधि में फ़ैयाज़ खाँ ने स्वर-साधना, ध्रुवपद और होरी गायन का कठिन अभ्यास किया। २५ वर्ष की आयु तक वे लोकप्रिय होने लगे थे। उनकी गायकी पर अपने नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ के अतिरिक्त तत्कालीन महान गायक नत्थन खाँ, जयपुर के अब्दुल खाँ और सेनिया घराने के अमीर खाँ का भी प्रभाव था। आइए अब हम आपको उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में राग ‘भंखार’ में आलाप और तीनताल में एक खयाल सुनवाते हैं, जिसके बोल हैं –“हे करतार...”।

उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ : खयाल - आलाप और बन्दिश – राग भंखार


पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक के चार दशकों तक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ देश में आयोजित होने वाले संगीत समारोहों के प्राण हुआ करते थे। संगीत-प्रेमियों को सम्मोहित कर लेने की अद्भुत क्षमता उनकी गायकी में थी। उस दौर में उन्हें जनसामान्य की ओर से ‘महफिल के बादशाह’ के नाम से पुकारा जाता था। १९३० के आसपास उस्ताद ने कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर के निवास स्थान जोरासांकों ठाकुरबाड़ी में आयोजित संगीत समारोह में भाग लिया था। समारोह के दौरान वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर से अत्यन्त प्रभावित हुए और उन्हें “हिंदुस्तान का सबसे बड़ा शायर” की उपाधि दे दी। अपने प्रभावशाली संगीत से उन्होने देश के सभी संगीत केन्द्रों में खूब यश अर्जित किया। उनकी ख्याति के कारण बड़ौदा राज-दरबार में संगीतज्ञ के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। १९३८ में उन्हे मैसूर दरबार से “आफताब-ए-मौसिकी” (संगीत के सूर्य) की उपाधि से नवाजा गया।

उस्ताद की गायकी में जवारीदार स्वर, राग दरबारी का गान्धार, राग श्री का ऋषभ और अनूठी लयकारी श्रोताओं को सम्मोहित करती थी। बोलतान में गीत की पंक्तियों का चमत्कारिक प्रदर्शन किया करते थे। वे स्वर, भाषा, अर्थ, भाव, लय सभी का भरपूर आनन्द लेकर गाते थे। ध्रुवपद और खयाल गायकी में दक्ष होने के साथ-साथ ठुमरी-दादरा गायन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फ़ैयाज़ खाँ ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में भैया गनपत राव और मौजुद्दीन खाँ से ठुमरी-दादरा सुना था और संगीत की इस विधा से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। ठुमरी के दोनों दिग्गजों से प्रेरणा पाकर फ़ैयाज़ खाँ ने इस विधा में भी दक्षता प्राप्त की। खाँ साहब ठुमरी और दादरा के बीच उर्दू के शे’र जोड़ कर चार चाँद लगा देते थे। इसके साथ ही टप्पे की तानों को भी वे ठुमरी गाते समय जोड़ लिया करते थे। उनके द्वारा गायी गई उपशास्त्रीय रचनाओं में- “बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी....”, “पानी भरे री कौन अलबेली...” आदि आज भी संगीत प्रेमियों का बीच लोकप्रिय है। इस आलेख को विराम देने से पहले आइए आपको सुनवाते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में राग भैरवी में निबद्ध अत्यन्त लोकप्रिय दादरा। खाँ साहब का निधन ५ नवम्बर, १९५० को हुआ था। कल उनकी ६०वीं पुण्यतिथि थी, इस अवसर पर हम उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ को समस्त संगीत-प्रेमियों की ओर से श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए आज यहीं विराम लेते हैं।

उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ : ठुमरी (दादरा) – राग - भैरवी


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुर संगम 43 की पहेली : इस ऑडियो क्लिप को सुन कर संगीत वाद्य को पहचानिए। सही पहचान करने पर आपको मिलेंगे 5 अंक, और यदि आपने राग की पहचान भी कर ली तो आपको मिलेंगे 5 बोनस अंक।


पिछ्ली पहेली का परिणाम : सुर संगम के 40वें अंक में पूछे गए प्रश्न का सही उत्तर और विजेता के नाम की घोषणा पिछले अंक में गायक जगजीत सिंह पर विशेष श्रद्धांजलि अंक के कारण हम नहीं कर सके। 40वें अंक की पहेली की विजेता क्षिति तिवारी हैं, बधाई।

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम एक और संगीत-कलासाधक के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Saturday, November 5, 2011

कुछ एल पी गीतों की क्वालिटी तो आजकल के डिजिटल रेकॉर्डिंग् से भी उत्तम थी -विजय अकेला



ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 66 गीतकार विजय अकेला से बातचीत उन्हीं के द्वारा संकलित गीतकार जाँनिसार अख़्तर के गीतों की किताब 'निगाहों के साये' पर (भाग-२)
भाग ०१ यहाँ पढ़ें

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! 'शनिवार विशेषांक' मे पिछले सप्ताह हम आपकी मुलाकात करवा रहे थे गीतकार विजय अकेला से जिनसे हम उनके द्वारा सम्पादित जाँनिसार अख़्तर साहब के गीतों के संकलन की किताब 'निगाहों के साये' पर चर्चा कर रहे थे। आइए आज बातचीत को आगे बढ़ाते हुए आनन्द लेते हैं इस शृंखला की दूसरी और अन्तिम कड़ी।

सुजॉय - विजय जी, नमस्कार और एक बार फिर आपका स्वागत है 'आवाज़' के मंच पर।

विजय अकेला - धन्यवाद! नमस्कार!

सुजॉय - विजय जी, पिछले हफ़्ते आप से बातचीत करने के साथ साथ जाँनिसार साहब के लिखे आपकी पसन्द के तीन गीत भी हमनें सुने। क्यों न आज का यह अंक अख़्तर साहब के लिखे एक और बेमिसाल नग़मे से शुरु की जाये?

विजय अकेला - जी ज़रूर!

सुजॉय - तो फिर बताइए, आपकी पसन्द का ही कोई और गीत।

विजय अकेला - फ़िल्म 'नूरी' का शीर्षक गीत सुनवा दीजिए। ख़य्याम साहब की तर्ज़, लता जी और नितिन मुकेश की आवाज़ें।

गीत - आजा रे आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा (नूरी)


सुजॉय - विजय जी, पिछले हफ़्ते हमारी बातचीत आकर रुकी थी इस बात पर कि जाँनिसार साहब के गीतों के ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड्स तो आपको मिल गए, पर समस्या यह आन पड़ी कि इन्हें सूना कहाँ जाये क्योंकि ग्रामोफ़ोन प्लेयर तो आजकल मिलते नहीं हैं। तो किस तरह से समस्या का समाधान हुआ?

विजय अकेला - जी, ये रेकॉर्ड्स सुनना बहुत ज़रूरी था क्योंकि गानों को करेक्टली और शुद्धता के साथ छापना भी तो इस किताब को छापने की एक अहम वजह थी बिना किसी ग़लती के!

सुजॉय - बिल्कुल! ऑथेन्टिसिटी बहुत ज़रूरी है।

विजय अकेला - जी!

सुजॉय - तो फिर रेकॉर्ड प्लेयर का इंतज़ाम हुआ?

विजय अकेला - प्लेयर का इंतज़ाम करना ही पड़ा। महंगी क़ीमत देनी पड़ी।

सुजॉय - महंगी क़ीमत देनी पड़ी, मतलब ऐन्टिक की दुकान में मिली?

विजय अकेला - जी, ठीक समझे आप। मगर एक एक लफ़्ज़ को सौ सौ बार सुन कर पर्फ़ेक्ट होने के बाद ही किताब में लिखा।

सुजॉय - जी जी, क्योंकि ऑडियो क्वालिटी अच्छी नहीं होगी।
विजय अकेला - बिल्कुल सही। पर हमेशा नहीं, कुछ गीतों की क्वालिटी तो आजकल के डिजिटल रेकॉर्डिंग् से भी उत्तम थी।

सुजॉय - सही है! क्या है कि उन गीतों में गोलाई होती थी, आजकल के गीतों में शार्पनेस है पर राउण्डनेस ग़ायब हो गई है, इसलिए ज़्यादा तकनीकी लगते हैं और जज़्बाती कम। ख़ैर, विजय जी, यहाँ पर जाँनिसार साहब के लिखे एक और गीत की गुंजाइश बनती है। बताइए कौन सा गीत सुनवाया जाये?

विजय अकेला - "आँखों ही आँखों में इशारा हो गया", फ़िल्म 'सी.आई.डी' का गीत है।

सुजॉय - नय्यर साहब के संगीत में रफ़ी साहब और गीता दत्त की आवाज़ें।

गीत - आँखों ही आँखों में इशारा हो गया (सी.आई.डी)


सुजॉय - विजय जी, 'निगाहों के साये' किताब का विमोचन कहाँ और किनके हाथों हुआ?

विजय अकेला - जुहू के 'क्रॉसरोड' में गुलज़ार साहब के हाथों हुआ। जावेद अख़्तर साहब और ख़य्याम साहब भी वहाँ मौजूद थे।

सुजॉय - विजय जी, हम अपने पाठकों के लिए यहाँ पर पेश करना चाहेंगे वो शब्द जो गुलज़ार साहब और जावेद साहब नें आपके और आपके इस किताब के बारे में कहे हैं।

विजय अकेला - जी ज़रूर!

गुलज़ार - मुझे ख़ुशी इस बात की है कि यह रवायत अकेला नें बड़ी ख़ूबसूरत शुरु की है ताकि उन शायरों को, जिनके पीछे काम करने वाला कोई नहीं था, या जिनका लोगों नें नेग्लेक्ट किया, या जिनपे राइटर्स ऐसोसिएशन काम करती या ऐसी कोई ऑरगेनाइज़ेशन काम करती, उन शायरों के कलाम को सम्भालने का एक सिलसिला शुरु किया, वरना फ़िल्मों में लिखा हुआ कलाम या फ़िल्मों में लिखी शायरी को ऐसा ही ग्रेड दिया जाता था कि जैसे ये किताबों के क़ाबिल नहीं है, ये तो सिर्फ़ फ़िल्मों में है, बाक़ी आपकी शायरी कहाँ है? ये हमेशा शायरों से पूछा जाता था। यह एक बड़ा ख़ूबसूरत क़दम अकेला नें उठाया है कि जिससे वो शायरी, जो कि वाक़ई अच्छी शायरी है, जो कभी ग़र्द के नीचे दब जाती या रह जाती, उसका एक सिलसिला शुरु हुआ है और उसका आग़ाज़ उन्होंने जाँनिसार अख़्तर साहब से, और बक्शी साहब से किया है, और भी कई शायर जिनका नाम उन्होंने लिया, जैसे राजेन्द्र कृष्ण है, और भी बहुत से हैं, ताकि उनका काम सम्भाला जा सके।


जावेद अख़्तर - सबसे पहले तो मैं विजय अकेला का ज़िक्र करना चाहूँगा, जिन्होंने इससे पहले ऐसे ही बक्शी साहब के गीतों को जमा करके एक किताब छापी थी और अब जाँनिसार अख़्तर साहब के १५१ गीत उन्होंने जमा किए हैं और उसे किताब की शक्ल में 'राजकमल' नें छापा है। ये बहुत अच्छा काम कर रहे हैं और हमारे जो पुराने गीत हैं और मैं उम्मीद करता हूँ कि इसके बाद जो दूसरे शायर हैं, राजेन्द्र कृष्ण हैं, राजा मेहन्दी अली हैं, शैलेन्द्र जी हैं, मजरूह साहब हैं, इनकी रचनाओं को भी वो संकलित करने का इरादा करेगें


सुजॉय - विजय जी, गुलज़ार साहब और जावेद साहब के विचार तो हमने जाने, और यह भी पता चला कि आगे आप किन गीतकारों पर काम करना चाहते हैं। फ़िल्हाल जाँनिसार साहब का लिखा कौन सा गीत सुनवाना चाहेंगे?


विजय अकेला - 'रज़िया सुल्तान' का "ऐ दिल-ए-नादान"

गीत - ऐ दिल-ए-नादान (रज़िया सुल्तान)


सुजॉय - विजय जी, बहुत अच्छा लगा आपसे बातचीत कर, आपकी इस किताब के लिए और इस साहसी प्रयास के लिए हम आपको बधाई देते हैं, पर एक शिकायत है आपसे।

विजय अकेला - वह क्या?

सुजॉय - आप फ़िल्मों में बहुत कम गीत लिखते हैं, ऐसा क्यों?

विजय अकेला - अब ज़्यादा लिखूंगा। सुजॉय - हा हा, चलिए इसी उम्मीद के साथ आज आपसे विदा लेते हैं, बहुत बहुत धन्यवाद और शुभकामनाएँ।

विजय अकेला - शुक्रिया बहुत बहुत!

तो ये थी बातचीत गीतकार विजय अकेला से उनके द्वारा सम्पादित जाँनिसार अख़्तर के गीतों के संकलन की किताब 'निगाहों के साये' पर। अगले सप्ताह फिर किसी विशेष प्रस्तुति के साथ उपस्थित होंगे, तब तक के लिए अनुमति दीजिये, पर आप बने रहिये 'आवाज़' के साथ! नमस्कार!

गिरिजेश राव की कहानी "श्राप"



'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने प्रेमचंद की संस्मरणात्मक कहानी "निर्वासन" का पॉडकास्ट अर्चना चावजी और अनुराग शर्मा की आवाज़ में सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं गिरिजेश राव की कहानी "श्राप", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। कहानी "श्राप" का कुल प्रसारण समय 8 मिनट 2 सेकंड है।

सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा का टेक्स्ट एक आलसी का चिठ्ठा पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

"पास बैठो कि मेरी बकबक में नायाब बातें होती हैं। तफसील पूछोगे तो कह दूँगा,मुझे कुछ नहीं पता "
~ गिरिजेश राव

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

"आज की रात चाँद कौन सी कला में था? था भी या रोते भांजे को बहलाने किसी और लोक की वासी बहन के घर गया था?"
(गिरिजेश राव की कहानी 'श्राप' से एक अंश)

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#151st Story, Shraap: Girijesh Rao/Hindi Audio Book/2011/32. Voice: Anurag Sharma

Thursday, November 3, 2011

कहाँ तुम चले गए ...बस यही दोहराते रह गए जगजीत के दीवाने



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 780/2011/220

गजीत सिंह को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'जहाँ तुम चले गए' की अंतिम कड़ी में आप सभी का स्वागत है। दोस्तों, जगजीत सिंह का पंजाबी भाषा और पंजाबी काव्य को लोकप्रिय बनाने और दूर दूर तक फैलाने में भी उल्लेखनीय योगदान रहा है। शिव कुमार बटालवी की कविताओं को जनसाधारण तक पहुँचाने में उनका ऐल्बम 'बिरहा दा सुल्तान' उल्लेखनीय है। "माय नी माय मैं इक शिकरा यार बनाइया", "रोग बन के रह गिया है पियार तेरे शहर दा", "यारियां राब करके मैनुं पाएं बिरहन दे पीड़े वे", "एह मेरा गीत किसी नी गाना" इसी ऐल्बम के कुछ लोकप्रिय गीत हैं। १० मई २००७ को संसद के युग्म अधिवेषन में ऐतिहासिक केन्द्रीय हॉल में जगजीत सिंह नें बहादुर शाह ज़फ़र की ग़ज़ल "लगता नहीं है दिल मेरा" गा कर भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (१८५७) के १५० वर्ष पूर्ति पर आयोजित कार्यक्रम को चार चाँद लगाया। राष्ट्रपति अब्दुल कलाम, प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह, उप-राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत, लोक-सभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी वहाँ मौजूद थीं। सन् २००३ में जगजीत सिंह को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

२००७ के आसपास जगजीत सिंह की सेहत बिगड़ने लगी थी। ब्लड सर्कुलेशन की समस्या के चलते उन्हें २००७ के अक्टूबर में अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। इससे पहले १९९८ के जनवरी में उन्हें दिल का दौरा पड़ा था जिसके बाद उन्होंने सिगरेट पीना छोड़ दिया था। अभी हाल में ब्रेन हैमरेज से आक्रान्त जगजीत को अस्पताल ले जाया गया, पर वो वापस घर न लौट सके। उनका दिया अंतिम कॉनसर्ट था १६ सितंबर २०११ को नेहरू साइन्स सेन्टर मुंबई में, १७ सितंबर को सिरि फ़ोर्ट ऑडिटोरियम नई दिल्ली में और २० सितंबर को देहरादून के इण्डियन पब्लिक स्कूल में। और फिर ख़ामोश हो गई यह आवाज़ हमेशा हमेशा के लिए। जैसे उन्हीं का गाया गीत साकार हो उठा - "चिट्ठी न कोई संदेस, जाने वो कौन सा देस, जहाँ तुम चले गए"। आइए जगजीत सिंह को समर्पित इस शृंखला का समापन भी हम इसी गीत से करें। उत्तम सिंह के संगीत में यह है गीतकार आनन्द बक्शी की रचना १९९८ की फ़िल्म 'दुश्मन' के लिए। यूं तो यह पुराने फ़िल्म का गीत नहीं है, और इसलिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शामिल होने के काबिल भी नहीं, पर इसके बोल कुछ ऐसे हैं कि जगजीत जी के जाने की परिस्थिति में बहुत ही ज़्यादा सार्थक बन पड़ा है। आइए इस गीत को सुनें और इस शृंखला को यहीं सम्पन्न करें। पूरे 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से स्वर्गीय जगजीत सिंह को भावभीनी श्रद्धांजली और उनकी पत्नी चित्रा जी के लिए समवेदना और सहानुभूति। अनुमति दीजिए, नमस्कार!



चलिए आज कुछ बातें जगजीत की ही की जाये, हमें बताएं उनके गाये अपने सबसे पसंदीदा ५ गीत...

पिछले अंक में
अनाम बंधू अपना नाम तो बताएं, मेरे ख़याल से तो वो दिल्ली में ही हैं कृपया इन नंबर पर संपर्क करें ९८७३७३४०४६
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, November 2, 2011

ये तेरा घर ये मेरा घर....आम आदमी की संकल्पनाओं को शब्द दिए जावेद अख्तर ने



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 779/2011/219

गजीत सिंह को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'जहाँ तुम चले गए' में एक बार फिर से मैं, सुजॉय चटर्जी, आपका स्वागत करता हूँ। कल की कड़ी में हमनें आपको जगजीत और चित्रा सिंह के कुछ ऐल्बमों के बारे में बताया। उनके बाद जगजीत जी के कई एकल ऐल्बम आये जिनमें शामिल थे Hope, In Search, Insight, Mirage, Visions, कहकशाँ, Love Is Blind, चिराग, और सजदा। मिर्ज़ा ग़ालिब, फ़िराक़ गोरखपुरी, कतील शिफ़ई, शाहीद कबीर, अमीर मीनाई, कफ़ील आज़ेर, सुदर्शन फ़ाकिर, निदा फ़ाज़ली, ज़का सिद्दीक़ी, नाज़िर बकरी, फ़ैज़ रतलामी और राजेश रेड्डी जैसे शायरों के ग़ज़लों को उन्होंने अपनी आवाज़ दी। जगजीत जी के शुरुआती ग़ज़लें जहाँ हल्के-फुल्के और ख़ुशमिज़ाजी हुआ करते थे, बाद के सालों में उन्होंने संजीदे ग़ज़लें ज़्यादा गाई, शायद अपनी ज़िन्दगी के अनुभवों का यह असर था। ऐसे ऐल्बमों में शामिल थे Face To Face, आईना, Cry For Cry. जगजीत जी के ज़्यादातर ऐल्बमों के नाम अंग्रेज़ी होते रहे, और कईयों में उर्दू शब्दों का प्रयोग हुआ जैसे कि 'सजदा', 'सहर', 'मुन्तज़िर', 'मारासिम' और 'सोज़'। इस शृंखला में आप उनके फ़िल्मी गीत तो सुन ही रहे हैं, नए दौर के कई फ़िल्मों में भी उनके गाये गीत और ग़ज़लें रहे, जैसे कि 'दुश्मन', 'सरफ़रोश', 'तुम बिन', 'तरकीब', 'जॉगर्स पार्क', 'लीला' आदि। ग़ज़लों के अलावा जगजीत सिंह नें भजन और गुरुबानी भी बहुत गाये। उनके गाये ऐसे धार्मिक ऐल्बमों में शामिल हैं 'माँ', 'हरे कृष्णा', 'हे राम' हे राम', इच्छाबल', 'मन जीताई जगजीत' (पंजाबी)। इन ऐल्बमों के ज़रिये उन्होंने वो दर्जा हासिल कर लिया जो दर्जा अनुप जलोटा, हरिओम शरण जैसे भजन गायकों का था।

दोस्तों, अब तक इस शृंखला में शामिल आठ गीतों में प्रथम सात गीत ऐसे थे जिनका संगीत जगजीत सिंह नें तैयार किया था। लता मंगेशकर, आशा भोसले, दिलराज कौर, विनोद सहगल, चित्रा सिंह के एक एक गीत के अलावा दो गीत जगजीत सिंह के गाये हुए भी रहे। और आठवाँ गीत एक पारम्परिक ठुमरी थी जिसे जगजीत और चित्रा नें गाई। आज नवी कड़ी में प्रस्तुत है एक बड़ा ही हँस-मुख और ज़िन्दगी से भरपूर डुएट जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की ही आवाज़ों में। फ़िल्म 'साथ-साथ' का यह सदाबहार गीत है "ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर, तो पहले आके माँग ले, मेरी नज़र तेरी नज़र"। इस फ़िल्म में संगीत था कुलदीप सिंह का। जगजीत और चित्रा के गाये तमाम युगल ग़ज़लें तो हैं ही, इस जोड़ी नें कई फ़िल्मी गीत भी साथ में गाये हैं, जिनमें आज का यह गीत सब से ज़्यादा लोकप्रिय रहा और आज भी एवेरग्रीन डुएट्स में शुमार होता है।



चलिए अब खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
आनंद बख्शी का लिखा है ये गीत जगजीत की आवाज़ से महका

पिछले अंक में

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Tuesday, November 1, 2011

बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए...पारंपरिक बोलों पर जगजीत चित्रा के स्वरों की महक



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 778/2011/218

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों का स्वागत है इस स्तंभ में जारी शृंखला 'जहाँ तुम चले गए' की आठवीं कड़ी में। आपको याद दिला दें कि यह शृंखला समर्पित है ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह को जिनका हाल में निधन हो गया। ७० के दशक में ग़ज़ल गायकी पर जिन कलाकारों का दबदबा था वो थे नूरजहाँ, मल्लिका पुखराज, बेगम अख़्तर, तलत महमूद, और महदी हसन। इन महारथियों के होने के बावजूद जगजीत सिंह नें अपनी पहचान बना ही ली। १९७६ में उनका पहला एल.पी रेकॉर्ड बाज़ार में आया 'The Unforgetables' के शीर्षक से। इस ऐल्बम की ख़ास बात यह थी कि उन दिनों ग़ज़ल गायकी शास्त्रीय संगीत आधारित हुआ करता था, पर जगजीत सिंह नें हल्के-फुल्के अंदाज़ में ग़ज़लों को गाया और बहुत लोकप्रिय हुईं ये ग़ज़लें। ग़ज़ल के रेकॉर्डों की बिक्री के सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए उनकी गाई ग़ज़लों नें। १९६७ में जगजीत सिंह की मुलाक़ात चित्रा से हुई थी जो ख़ुद भी एक गायिका थीं। दो साल बाद दोनों नें शादी कर ली और उनकी यह जोड़ी पहली पति-पत्नी की जोड़ी थी जो गायक-गायिका के रूप में साथ में पर्फ़ॉर्म किया करते। ग़ज़ल जगत को समृद्ध करने में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन दोनों नें जिन ऐल्बमों में साथ में गाया है उनमें शामिल हैं 'Ecstasies', 'A Sound Affair', 'Passions', 'Beyond Time'.

२८ जुलाई १९९० को जगजीत-चित्रा का एकलौता बेटा विवेक एक सड़क दुर्घटना में चल बसा। इसके बाद जगजीत और चित्रा का साथ में बस एक ही ऐल्बम आया 'Someone Somewhere' और इसके बाद चित्रा सिंह नें गाना छोड़ दिया। जगजीत सिंह अक्सर "मिट्टी दा बावा" गीत गाया करते थे जो चित्रा नें किसी पंजाबी फ़िल्म में गाया था और यह गीत कहीं न कहीं उन दोनों की ही कहानी बयान करता, जिसमें कहानी थी अपने किसी प्यारे जन को बहुत ही कम उम्र में खोने की। दोस्तों, आज हम जिस गीत को सुनने जा रहे हैं, उसका संगीत जगजीत सिंह नें नहीं बनाई है, बल्कि यह एक पारम्परिक ठुमरी है, जिसे समय समय पर कई कलाकारों नें गाया है। "बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये", जी हाँ, जगजीत सिंह और चित्रा सिंह नें यह ठुमरी १९७४ की फ़िल्म 'आविष्कार' के लिए गाई थी। बासु भट्टाचार्य निर्देशित इस फ़िल्म में राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर मुख्य कलाकार थे और संगीत था कानु रॉय का। इस ठुमरी को एक पार्श्वसंगीत के रूप में फ़िल्म में ईस्तेमाल किया गया है। राग भैरवी में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की आवाज़ में यह ठुमरी एक अलग ही अहसास कराती है। आइए आनन्द लें।



चलिए अब खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
कुलदीप सिंह के संगीत में जगजीत चित्रा की जोड़ी थी इस युगल गीत में

पिछले अंक में
सही कहा अमित जी वाकई शानदार गाया है :)

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